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सुत्तनिपात 155

पाली भाषेतः-

७६४ भवरागपरेतेहि भवसोतानुसारिहि।
मारधेय्यानुपन्नेहि१(१ म.-मारधेय्यनुपन्नेभि.) नायं धम्मो सुसम्बुधो२।।४१।।(२ म.-सुसंबुद्धो.)

७६५ को नु अञ्ञत्रमरियेहि पदं सम्बुद्धुमरहति।
यं पदं सम्मदञ्ञाय परिनिब्बन्ति अनासवा ति।।४२।।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दु। इमस्मिं खो पन वेय्याकरणस्मिं भञ्ञमाने सट्ठिमत्तानं भिक्खूनं अनुपादाय आसवेहि चित्तानि विमुच्चिंसू ति।

द्वयतानुपस्सनासुत्तं निट्ठितं।

मराठी अनुवादः-


७६४ भवासक्तिपरायण, भवनदींत वाहणारे, व माराच्या तडाक्यांत सांपडलेले जे, त्यांना या धर्माचा बोध होणें सोपें नाहीं.(४१)

७६५ लोक सम्यक्-ज्ञानानें जें पद जाणून अनाश्रव होऊन परिनिर्वाण पावतात, त्या पदाचा आर्यांवाचून दुसर्‍या कोणास बोध होणें शक्य नाहीं.(४२)

असें भगवान् म्हणाला. मुदित मनानें त्या भिक्षूंनीं भगवन्ताच्या भाषणाचें अभिनन्दन केलें. हें व्याख्यान केलें जात असतां साठ भिक्षूंची अन्त:करणें उपादानरहित होऊन आश्रवांपासून मुक्त झालीं.

द्वयतानुपस्सनासुत्त समाप्त

पाली भाषेत :-

तस्सुद्दानं—

सच्चं उपधि अविज्जं च संखारा१(१ म.-संखारे विञ्ञाणं पञ्चमं.) विञ्ञाणपञ्चमं।
फस्सवेदनिया तण्हा उपादानारम्भा२(२ म.-रम्भ.) आहारा।
इञ्जिते३(३ म.-इञ्जितं.) फन्दितं रूपं सच्चदुक्खेन सोळसा ति।।

महावग्गो ततियो।

तस्सुद्दानं—


पब्बज्जं४ (४ म.-पब्बज्जा.) च पधानं५(५म.-पधाना.) च सुभ६...सुन्दरी (तथा)।(६ सी.-सुभासितं च सुन्दरि. म.-सुभा सुन्दरिका तथा.)
माघसुत्तं सभियो च सेलो सल्लं ७पवुच्चति।(७ म.-च वुञ्चति.)
वासेट्ठो चापि कोकालि नालको८(८ सी.-नाल.) द्वयतानुपस्सना।
द्वादसेतानि९(९ म.-द्वादस तानि.) सुत्तानि महावग्गो ति वुच्चती ति।

मराठी अनुवादः-

द्वयतानुपस्सनासुत्ताची अनुक्रमणिका—सत्य, उपाधि, अविद्या, संस्कार, पांचवें विज्ञान; स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, कर्मांची धडपड, आहार; प्रकंप, चलित रूपावचर, सत्य आणि दु:ख, मिळून सोळा.

महावग्ग तिसरा समाप्त

महावग्गाची अणुक्रमणिका-

पब्बजा, पधान, सुभासित, सुन्दरिक, माघ, सभिय, सेल, सल्ल, वासेट्ठ, कोकालिक, नालक व द्वयतानुपस्सना—या बारा सुत्तांचा महावग्ग म्हटला जातो.

सुत्तनिपात

धर्मानंद कोसंबी
Chapters
प्रास्ताविक चार शब्द 1
प्रास्ताविक चार शब्द 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 1
भाषातरकारांची प्रस्तावना 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 3
ग्रंथपरिचय 1
ग्रंथपरिचय 2
ग्रंथपरिचय 3
ग्रंथपरिचय 4
ग्रंथपरिचय 5
ग्रंथपरिचय 6
ग्रंथपरिचय 7
ग्रंथपरिचय 8
ग्रंथपरिचय 9
ग्रंथपरिचय 10
ग्रंथपरिचय 11
ग्रंथपरिचय 12
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