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सुत्तनिपात 108

पाली भाषेतः-
३३
[७. सेलसुत्तं]


एवं मे सुतं। एकं समयं भगवा अंगुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसंघेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि येन आपणं नाम अंगुत्तरापानं निगमो तदवसरि। अस्सोसि खो केणियो जटिलो-समणो खलु भो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो अंगुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसंघेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि आपण अनुप्पत्तो; तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो-इतिऽपि सो भगवा अरहं सम्मासंबुद्धो विज्जाचरणसंपन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा। सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति, सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति, साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती ति।

अथ खो केणियो जटिलो येन भगवा तेनुपसंकमि, उपसंकमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि, सम्मोदनीयं कथं साराणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नं खो केणियं जटिलं भगवा धम्मिया कथाय संदस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि संपहंसेसि। अथ खो केणियो जटिलो भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सितो समादपितो समुत्तेजितो संपहंसितो भगवन्तं एतदवोच—अधिवासेतु मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसंघेना ति। एवं वुत्ते भगवा केणियं जटिलं एतदवोच—महा खो केणिय भिक्खुसंघो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, त्वं च खो ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो ति। दुतियंऽपि खो केणियो जटिलो भगवन्तं एतदवोच-किंचापि भो गोतम महाभिक्खुसंघो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, अहं च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो, अधिवासेतु मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसंघेना ति। दुतियंऽपि खो भगवा केणियं जटिलं एतदवोच-महा खो केणिय भिक्खुसंघो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, त्वं च खो ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो ति। ततियं पि खो केणियो जटिलो भगवन्तं एतदवोच-किंचापि भो गोतम महाभिक्खुसंघो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, अहं च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो, अधिवासेत्वेव मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसंघेना ति। अधिवासेसि भगवा तुण्हिभावेन। अथ खो केणियो जटिलो भगवतो अधिवासनं विदित्वा उट्ठायासना येन सको अस्समो तेनुपसंकमि। उपसंकमित्वा मित्तामच्चे ञातिसालोहिते आमन्तेसि—सुणन्तु मे भोन्तो१(१ म. –भवन्तो.) मित्तमच्चा ञातिसालोहिता, समणो मे गोतमो निमन्तितो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसंघेन, येन मे कायवेय्यवटिकं करेय्याथा ति। एवं भो ति खो केणियस्स जटिलस्स मित्तमच्चा ञातिसालोहिता केणियस्स जटिलस्स पटिस्सुत्वा अप्पेकच्चे उद्धनानि खणन्ति, अप्पेकच्चे कट्ठनि फालेन्ति, अप्पेकच्चे भाजनानि धोवन्ति, अप्पेकच्चे उदकमणिकं पतिट्ठापेन्ति, अप्पेकच्चे आसनानि पञ्ञापेन्ति; केणियो पन जटिलो सामं येव मण्डलमालं पटियादेति।

तेन खो पन समयेन सेलो ब्राह्मणो आपणे पटिवसति, तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्टुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपंचमानं पदको वेय्याकरणो लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अन्वयो तीणि माणवकसतानि मन्ते वाचेति। तेन खो पन समयेन केणियो जटिलो सेले ब्राह्मणे अभिप्पसन्नो होति। अथ खो सेलो ब्राह्मणो तीहि माणवकसतेहि परिवुतो जंघाविहारं अनुचंकममानो अनुविचरमानो येन केणियस्स जटिलस्स अस्समो तेनुपसंकमि। अद्दसा खो सेलो ब्राह्मणो केणियस्समिये१(१ म.-केणियस्स जटिलस्स अस्समे.) जटिले अप्पेकच्चे उद्धनानि खणन्ते....पे...अप्पेकच्चे आसनानि पञ्ञापेन्ते, केणियं पन जटिलं सामं येव मण्डलमालं पटियादेन्तं। दिस्वान केणियं जटिलं एतदवोच-किन्नु भोतो केणियस्स आवाहो वा भविस्सति, विवाहो वा भविस्सति, महायञ्ञो वा पच्चुपट्ठितो, राजा वा मागधो सेनियो बिंबिसारो निमन्तितो स्वातनाय सद्धिं बलकायेना ति। न मे सेल आवाहो भविस्सति, नऽपि विवाहो भविस्सति, नऽपि राजा मागधो सेनियो बिंबिसारो निमन्तितो स्वातनाय सद्धिं बलकायेन, अपि च खो मे महायञ्ञो पट्टुपट्ठितो अत्थि। समणो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो अंगुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसंघेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि आपणं अनुप्पत्तो। तं खो पन भवन्तं गोतमं....पे...बुद्धो भगवा ति। सो मे निमन्तितो स्वातनाय सद्धिं भिक्खुसंघेना ति।

सुत्तनिपात

धर्मानंद कोसंबी
Chapters
प्रास्ताविक चार शब्द 1
प्रास्ताविक चार शब्द 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 1
भाषातरकारांची प्रस्तावना 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 3
ग्रंथपरिचय 1
ग्रंथपरिचय 2
ग्रंथपरिचय 3
ग्रंथपरिचय 4
ग्रंथपरिचय 5
ग्रंथपरिचय 6
ग्रंथपरिचय 7
ग्रंथपरिचय 8
ग्रंथपरिचय 9
ग्रंथपरिचय 10
ग्रंथपरिचय 11
ग्रंथपरिचय 12
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