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सुत्तनिपात 44

पाली भाषेत :-

२०८ यो जांतमुच्छिज्ज न रोपयेय्य। जायन्तमस्स नानुप्पवेच्छ।
तमाहु एकं मुनिनं चरन्तं। अद्दक्खि१ (१ म., सी.- अदक्खि.) सो सन्तिपदं महेसि२  (२ म.- महेसिं.) ।।२।।

२०९ संखाय वत्थूनि पहाय३ (३ रो., अ.- पमाय; म.-समाय.) बीजं। सिनेहमस्स नानुप्पवेच्छे।
स वे मुनी४ (४ म.- मुनि.) जातिखयन्तदस्सी। तक्कं पहाय न उपेति संखं।।३।।

२१० अञ्ञाय सब्बानि निवेसनानि। अनिकामयं अञ्ञतरंऽपि तेसं
स वे मुनी वीतगेधो अगिद्धो। नायूहति पारगतो हि होति।।४।।

२११ सब्बाभिभुं सब्बविदुं सुमेधं। सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तं।
सब्बंजहं तण्हक्खये विमुत्तं। तं वाऽपि धीरा मुनिं वेदयन्ति।।५।।

मराठी अनुवाद :-

२०८. जो उद्भवलेल्या (मनोदोषाचा) उच्छेद करून त्याला पुन: वाढूं देत नाहीं व उद्भवणार्‍यालाही कोणत्याही तर्‍हेनें उत्तेजन देत नाहीं, त्या एकाकी राहणार्‍याला मुनि म्हणतात; त्या महर्षीनें शान्तिपद पाहिलें आहे. (२)

२०९. पदार्थ जाणून व त्यांच्या बीजांचा त्याग करून जो त्यांना स्नेह (ओलावा) देत नाहीं, तो खरोखर जन्मक्षयान्तदर्शी मुनि होय. तो तर्क सोडून देऊन पुन: नामाभिधान (जन्म) पावत नाहीं. (३)

२१०. जो सर्व प्रकारचे भव१ (१. कामभवादि सर्व भव, ज्यांत मनुष्य प्रवेश करूं शकतो.) जाणतो व त्यांपैकीं एकाचीही इच्छा धरीत नाहीं; तो वीततृष्ण निर्लोभी मुनि भवोत्पादक कर्म करींत नाहीं; कारण तो पार जातो. (४)

२११. जो सर्व जिंकणारा, सर्व जाणणारा, सुबुद्धि, सर्व पदार्थींपासून अलिप्त राहणारा, सर्वांचा त्याग करणारा व तृष्णाक्षयानें मुक्त झालेला—त्याला सुज्ञ लोक मुनि म्हणतात. (५)

सुत्तनिपात

धर्मानंद कोसंबी
Chapters
प्रास्ताविक चार शब्द 1
प्रास्ताविक चार शब्द 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 1
भाषातरकारांची प्रस्तावना 2
भाषातरकारांची प्रस्तावना 3
ग्रंथपरिचय 1
ग्रंथपरिचय 2
ग्रंथपरिचय 3
ग्रंथपरिचय 4
ग्रंथपरिचय 5
ग्रंथपरिचय 6
ग्रंथपरिचय 7
ग्रंथपरिचय 8
ग्रंथपरिचय 9
ग्रंथपरिचय 10
ग्रंथपरिचय 11
ग्रंथपरिचय 12
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