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खेड़ा-सत्याग्रह

मजदूरो की हड़ताल समाप्त होने के बाद दम लेने को भी समय न मिला और मुझे खेड़ा जिले के सत्याग्रह का काम हाथ मे लेना पड़ा। खेड़ा जिले मे अकाल की-सी स्थिति होने के कारण खेड़ा के पाटीदार लोग लगान माफ कराने की कोशिश कर रहे थे। इस विषय मे श्री अमृतलाल ठक्कर ने जाँच करके रिपोर्ट तैयार की थी। इस बारे मे कोई निश्चित सलाह देने से पहले मै कमिश्नर से मिला। श्री मोहनलाल पंड्या और श्री शंकरलाल परीख अथक परिश्रम कर रहे थे। वे स्व. गोकलदास कहानदास पारेख और विट्टलभाई पटेल के द्वारा धारासभा मे आन्दोलन कर रहे थे। सरकार के पास डेप्युटेशन भी गये थे।

इस समय मै गुजरात-सभा का सभापति था। सभा ने कमिश्नर और गवर्नर को प्रार्थना पत्र भेजे, तार भेजे , अपमान सहे। सभा उनकी धमकियों को पचा गयी। अधिकारियो का उस समय का ढंग आज तो हास्यजनक प्रतीत होता है। उन दिनो का उनका अत्यन्त हलका बरताव आज असंभव सा मालूम होता है।

लोगो की माँग इतनी साफ और इतनी साधारण थी कि उसके लिए लड़ाई लड़ने की जरूरत ही न होनी चाहिये थी। कानून यह था कि अगर फसल चार ही आना या उससे कम आवे , तो उस साल का लगान माफ किया जाना चाहिये। पर सरकारी अधिकारियों का अंदाज चार आने से अधिक था। लोगो द्वारा यह सिद्ध किया जा रहा था कि उपज चार आने से कम कूती जानी चाहिये , पर सरकार क्यो मानने लगी ? लोगो की ओर से पंच बैठाने की माँग की गयी। सरकार को वह असह्य मालूम हुई। जितना अनुनय-विनय हो सकता था, सो सब कर चुकने के बाद और साथियो से परामर्श करने के पश्चात मैने सत्याग्रह करने की सलाह दी।

साथियो मे खेड़ा जिले के सेवको के अतिरिक्त मुख्यतः श्री वल्लभभाई पटेल, श्री शंकरलाल बैकर, श्री अनसूयाबहन, श्री इन्दुलाल कन्हैया याज्ञिक, श्री महादेव देसाई आदि थे। श्री वल्लभभाई अपनी बड़ी और बढ़ती हुई वकालत की बलि देकर आये थे। ऐसा कहा जा सकता है कि इसके बाद वे निश्चिन्त होकर वकालत कर ही न सके।

हम नडियाद के अनाथाश्रम मे ठहरे थे। अनाथाश्रम मे ठहरने को कोई विशेषता न समझे। नड़ियाद मे उसके जैसा स्वतंत्र मकान नही था , जिसमे इतने सारे लोग समा सकें। अन्त मे नीचे लिखी प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर लिये गये :

'हम जानते है कि हमारे गाँवो की फसल चार आने से कम हुई है। इस कारण हमने सरकार से प्रार्थना की कि वह लगान वसूली का काम अगले वर्ष तक मुलतवी रखे। फिर भी वह मुलतवी नही किया। अतएव हम नीचे सही करने वाले लोग यह प्रतिज्ञा करते है कि हम सब इस साल का पूरा या बाकी रहा सरकारी लगान नहीं देंगे। पर उसे वसूल करने के लिए सरकार जो भी कानूनी कार्यवाई करना चाहेगी , हम करने देंगे और उससे होने वाले दुःख सहन करेगे। यदि हमारी जमीन खालसा की गयी , तो हम उसे खालसा भी होने देगे। पर अपने हाथो पैसे जमा करके हम झूठे नही ठहरेंगे और स्वाभिमान नहीं खोयेंगे। अगर सरकार बाकी बची हुई सब जगहों मे दूसरी किस्त की वसूली मुलतवी रखे तो हममे से जो लोग जमा करा सकते है वे पूरा अथवा बाकी रहा हुआ लगान जमा कराने को तैयार है। हममे से जो जमा करा सकते है, उनके लगान जमा न कराने का कारण यह है कि अगर समर्थ लोग जमा करा दे, तो असमर्थ लोग घबराहट मे पड़कर अपनी कोई भी चीज बेचकर या कर्ज लेकर लगान जमा करा देगे और दुःख उठायेंगे। हमारी मान्यता है कि ऐसी स्थिति मे गरीबो की रक्षा करना समर्थ लोगो का कर्तव्य है। '

इस लड़ाई के लिए मै अधिक प्रकरण नही दे सकता। अतएव अनेक मीठे स्मरण छोड़ देने पड़ेगे। जो इस महत्त्वपूर्ण लड़ाई का गहरा अध्ययन करना चाहे, उन्हें श्री शंकरलाल परीख द्वारा लिखित खेड़ा की लड़ाई का विस्तृत प्रामाणिक इतिहास पढ़ जाने की मै शिफारिश करता हूँ।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति