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पहला अनुभव

मेरे स्वदेश आने के पहले जो लोग फीनिक्स से वापस लौटने वाले थे, वे यहाँ आ पहुँचे थे। अनुमान यह था कि मैं उनसे पहले पहुँचूगा, लेकिन लड़ाई के कारण मुझे लंदन में रूकना पड़ा। अतएव मेरे सामने यह प्रश्न यह था कि फीनिक्सवासियों को कहाँ रखा जाय ? मेरी अभिलाषा यह थी कि सब एक साथ ही रह सके और आश्रम का जीवन बिता सके तो अच्छा हो। मैं किसी आश्रम-संचालक से परिचित नहीं था, जिससे साथियों को उनके यहाँ जाने के लिख सकूँ। अतएव मैंने उन्हें लिखा कि वे एण्ड्रूज से मिलें और वे जैसी सलाह दे वैसा करे।

पहले उन्हे कांगड़ी गुरूकुल में रखा गया , जहाँ स्वामी श्रद्धानन्द जी ने उनको अपने बच्चों की तरह रखा। इसके बाद उन्हें शान्तिनिकेतन में रखा गया। वहाँ कविवर ने और उनके समाज ने उन्हें वैसे ही प्रेम से नहलाया। इन दो स्थानों में उन्हें जो अनुभव प्राप्त हुआ, वह उनके लिए और मेरे लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। कविवर, श्रद्धानन्द जी और श्री सुशील रुद्र को मैं एण्ड्रूज की त्रिमूर्ति मानता था। दक्षिण अफ्रीका में वे इन तीनों की प्रशंसा करते कभी थकते ही न थे। दक्षिण अफ्रीका के हमारे स्नेह-सम्मेलन के अनेकानेक स्मरणों में यह तो मेरी आँखों के सामने तैरा ही करता हैं कि इन तीन महापुरुषों के मान उनके हृदय में और ओठों पर सदा बने ही रहते थे। एण्ड्रूज ने मेरे फीनिक्स कुटुम्ब को सुशील रुद्र के पास ही रख दिया था। रुद्र का अपना कोई आश्रम न था, केवल घर ही था। पर उस घर का कब्जा उन्होंने मेरे कुटुम्ब को सौंप दिया था। उनके लड़के-लड़की एक ही दिन में इनके साथ ऐसे धुलमिल गये थे कि ये लोग फीनिक्स की याद बिलकूल भूल गये।

मैं बम्बई के बन्दरगाह पर उतरा तभी मुझे पता चला कि उस समय यह परिवार शान्तिनिकेतन में था। इसलिए गोखले से मिलने के बाद मैं वहाँ जाने को अधीर हो गया।

बम्बई में सम्मान स्वीकार करते समय ही मुझे एक छोटा-सा सत्याग्रह करना पड़ा था। मेरे सम्मान में मिस्टर पिटिट के यहाँ एक सभा रखी गयी थी। उसमें तो मैं गुजराती मे जबाव देने की हिम्मत न कर सका। महल में और आँखों को चौधिया देने वाले ठाठबाट के बीच गिरमिटियों की सोहब्बत में रहा हुआ मैं अपने आपको देहाती जैसा लगा। आज की मेरी पोशाक की तुलना में उस समय पहना हुआ अंगरखा, साफा आदि अपेक्षाकृत सभ्य पो।ाक कही जा सकती हैं। फिर भी मैं उस अलंकृत समाज में अलग ही छिटका पड़ता था। लेकिन वहाँ तो जैसे-तैसे मैने अपना काम निबाहा और सर फिरोजशाह मेहता की गोद में आसरा लिया। गुजरातियों की सभा तो थी ही। स्व. उत्तमलाल त्रिवेदी ने इस सभा का आयोजन किया था। मैने इस सभा के बारे में पहले से ही कुछ बाते जान ली थी। मिस्टर जिन्ना भी गुजराती होने के नाते इस सभा में हाजिर थे। वे सभापति थे या मुख्य वक्ता, यह मैं भूल गया हूँ। पर उन्होंने अपना छोटा और मीठा भाषण अंग्रेजी में किया। मुझे धुंधला-सा स्मरण हैं कि दूसरे भाषँ भी अधिकतर अंग्रेजी में ही हुए। जब मेरे बोलने का समय आया, तो मैंने उत्तर गुजराती में दिया। और गुजराती तथा हिन्दुस्तानी के प्रति अपना पक्षपात कुछ ही शब्दों में व्यक्त करके मैने गुजरातियों की सभा में अंग्रेजी के उपयोग के विरुद्ध अपना नम्र विरोध प्रदर्शित किया। मेरे मन में अपने इस कार्य के लिए संकोच तो था ही। मेरे मन में शंका बनी रही कि लम्बी अवधि की अनुपस्थिति के बाद विदेश से वापय आया हुआ अनुभवहीन मनुष्य प्रचलित प्रवाह के विरुद्ध चले, इसमें अविवेक तो नहीं माना जायगा ? पर मैंने गुजराती में उत्तर देने की जो हिम्मत की, उसका किसी ने उलटा अर्थ नहीं लगाया और सबने मेरा विरोध सहन कर लिया। यह देखकर मुझे खुशी हुई और इस सभा के अनुभव से मैं इस परिणाम पर पहुँचा कि अपने नये जान पड़ने वाले दूसरे विचारों को जनता के सम्मुख रखने में मुझे कठिनाई नहीं पड़ेगी।

यो बम्बई में दो-एक दिन रहकर और आरम्भिक अनुभव लेकर मैं गोखले की आज्ञा से पूना गया।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति