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तीसरे दर्जे की विडम्बना

बर्दवान पहुँचकर हमें तीसरे दर्जे का टिकट लेना था। उसे लेने मे परेशानी हुई। जवाब मिला, 'तीसरे दर्जे के यात्री को टिकट पहले से नही दिया जाता।' मै स्टेशन मास्टर से मिलने गया। उनके पास मुझे कौन जाने देता ? किसी ने दया करके स्टेशन मास्टर को दिखा दिया। मै वहाँ पहुँचा। उनसे भी उपर्युक्त उत्तर मिला। खिड़की खुलने पर टिकट लेने गया। पर टिकट आसानी से मिलने वाला न था। बलबान यात्री एक के बाद एक घुसते जाते और मुझ जैसो को पीछे हटाते जाते। आखिर टिकट मिला।

गाड़ी आयी। उसमे भी जो बलबान थे वे घुस गये। बैठे हुओ और चढने वालो के बीच गाली गलौज और धक्का मुक्की शुरू हुई। इसमे हिस्सा लेना मेरे लिए सम्भव न था। हम तीनो इधर से उधर चक्कर काटते रहे। सब ओर से एक ही जवाब मिलता था, 'यहाँ जगह नही हैं।' मै गार्ड के पास गया। उसने कहा, 'जगह मिले तो बैठो, नही तो दूसरी ट्रेन मे जाना।'

मैने नम्रता पूर्वक कहा, 'लेकिन मुझे जरुरी काम है।' यह सुनने के लिए गार्ड के पास समय नही था। मै हारा। मगनलाल से कहा, 'जहाँ जगह मिले , बैठ जाओ।' पत्नी को लेकर मै तीसरे दर्जे के टिकट से ड्योढे दर्जे मे घुसा। गार्ड ने मुझे उसमे जाते देख लिया था।

आसनसोल स्टेशन पर गार्ड ज्यादा किराये के पैसे लेने आया। मैने कहा , 'मुझे जगह बताना आपका धर्म था। जगह न मिलने के कारण मै इसमे बैठा हूँ। आप मुझे तीसरे दर्जे मे जगह दिलाइये। मै उसमे जाने को तैयार हूँ।'

गार्ड साहब बोले, 'मुझ से बहस मत कीजिये। मेरे पास जगह नही है। पैसे न देने हो , तो गाड़ी से उतरना पड़ेगा।'

मुझे तो किसी भी तरह पूना पहुँचना था। गार्ड से लड़ने की मेरी हिम्मत न थी। मैने पैसे चुका दिये। उसने ठेठ पूना तक का डयोढ़ा भाड़ा लिया। यह अन्याय मुझे अखर गया।

सबेरे मुगलसराय स्टेशन आया। मगनलाल ने तीसरे दर्जे मे जगह कर ली थी। मुगलसराय मे मै तीसरे दर्जे मे गया। टिकट कलेक्टर को मैने वस्तुस्थिति की जानकारी दी औऱ उससे इस बात का प्रमाण पत्र माँगा कि मै तीसरे दर्ज मे चला आया हूँ। उसने देने से इनकार किया। मैने अधिक किराया वापस प्राप्त करने के लिए रेलवे के उच्च अधिकारी को पत्र लिखा।

उनकी ओर से इस आश्य का उत्तर मिला, 'प्रमाणपत्र के बिना अतिरिक्त किराया लौटाने का हमारे यहाँ रिवाज नही है। पर आपके मामले मे हम लौटाये दे रहे है। बर्दवान से मुगलसराय तक का डयोढ़ा किराया वापस नही किया जा सकता।'

इसके बाद के तीसरे दर्जे की यात्रा के मेरे अनुभव तो इतने है कि उनकी एक पुस्तक बन जाय। पर उनमे से कुछ की प्रांसगिक चर्चा करने के सिवा इन प्रकरणो मे उनका समावेश नही हो सकता। शारीरिक असमर्थता के कारण तीसरे दर्जे की मेरी यात्रा बन्द हो गयी। यह बात मुझे सदा खटकी है और आगे भी खटकती रहेगी। तीसरे दर्जे की यात्रा मे अधिकारियो की मनमानी से उत्पन्न होने वाली विडम्बना तो रहती ही है। पर तीसरे दर्जे मे बैठने वाले कई यात्रियो का उजड्पन, उनकी स्वार्थबुद्धि और उनका अज्ञान भी कुछ कम नही होता। दुःख तो यह है कि अकसर यात्री यह जानते ही नही कि वे अशिष्टता कर रहे है, अथवा गंदगी फैला रहे है अथवा अपना ही मतलब खोज रहे है। वे जो करते है , वह उन्हे स्वाभाविक मालूम होता है। हम सभ्य और पढ़े लिखे लोगो ने उनकी कभी चिन्ता ही नही की।

थके मांदे हम कल्याण जंकशन पहुँचे। नहाने की तैयारी की। मगनलाल और मैने स्टेशन के नल से पानी लेकर स्नान किया। पत्नी के लिए कुछ तजवीज कर रहा था कि इतने मे भारत समाज के भाई कौल ने हमे पहचान लिया। वे भी पूना जा रहे थे। उन्होने पत्नी को दूसरे दर्जे के स्नानग्रह मे स्नान कराने के लिए ले जाने की बात कही। इस सौजन्य को स्वीकार करने मे मुझे संकोच हुआ। पत्नी को दूसरे दर्जे के स्नानघर का उपयोग करने का अधिकार नही था , इसे मै जानता था। पर मैने उसे इस स्नानघर मे नहाने देने के अनौचित्य के प्रति आँखे मूँद ली। सत्य के पुजारी को यह भी शोभा नही देता। पत्नी का वहाँ जाने का कोई आग्रह नही था , पर पति के मोहरूपी सुवर्णपात्र ने सत्य को ढांक लिया।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति