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पत्नी की दृढ़ता

कस्तूरबाई पर रोग के तीन घातक हमले हुए और तीनो वह केवल घरेलू उपचार से बच गयी। उनमे पहली घटना उस समय घटी जब सत्याग्रह का युद्ध चल रहा था। उसे बार बार रक्तस्राव हुआ करता था। एक डॉक्टर मित्र मे शल्यक्रिया करा लेने की सलाह दी थी। थोडी आनाकानी के बाद पत्नी ने शल्यक्रिया कराना स्वीकार किया। उसका शरीर बहुत क्षीण हो गया था। डॉक्टर ने बिना क्लोरोफार्म के शल्यक्रिया की। शल्यक्रिया के समय बहुत पीड़ा हो रही थी, पर जिस धीरज से कस्तूरबाई ने उसे सहन किया उससे मै आश्चर्यचकित हो गया। शल्यक्रिया निर्विध्न पूरी हो गयी। डॉक्टर ने और उसकी पत्नी ने कस्तूरबाई की अच्छी सार-संभल की।

यह घटना डरबन मे हुई थी। दो-तीन दिन के बाद डॉक्टर ने मुझे निश्चिन्त होकर जोहानिस्बर्ग जाने की अनुमति दे दी। मै चला गया। कुछ ही दिन बाद खबर मिली कि कस्तूरबाई का शरीर बिल्कुल सुधर नही रहा है और वह बिछौना छोड़कर उठ-बैठ भी नही सकती। एक बार बेहोश भी हो चुकी थी। डॉक्टर जानते थे कि मुझ से पूछे बिना औषधि या अन्न के रूप ने कस्तूरबाई को शराब अथवा माँस नही दिया जा सकता। डॉक्टर ने मुझे जोहानिस्बर्ग मे टेलिफोन किया , 'मै आपकी पत्नी को माँस का शोरवा अथवा बीफ-टी देने की जरूरत समझता हूँ। मुझे इजाजत मिलनी चाहिये। '

मैने उत्तर दिया , 'मै इजाजत नही दे सकता। किन्तु कस्तूरबाई स्वतंत्र है। उससे पूछने जैसी स्थिति हो ते पूछिये और वह लेना चाहे तो जरूर दीजिये।'


'ऐसे मामलो मे मै बीमार से कुछ पूछना पसंद नही करता। स्वय आपको यहाँ आना जरूरी है। यदि आप मै जो चाहूँ सो खिलाने की छूट मुझे न दे , तो मै आपकी स्त्री के लिए जिम्मेदार नही।'

मैने उसी दिन डरबन की ट्रेन पकड़ी। डरबन पहुँचा। डॉक्टर ने मुझे से कहा, ' मैने तो शोरवा पिलाने के बाद ही आपको टेलीफोन किया था !'

मैने कहा, 'डॉक्टर, मै इसे दगा समझता हूँ।'

डॉक्टर ने ढृढता पूर्वक उत्तर दिया, 'दवा करते समय मै दगा-वगा नही समझता। हम डॉक्टर लोग ऐसे समय रोगी को अथवा उसके सम्बन्धियो को धोखा देने मे पुण्य समझते है। हमारा धर्म तो किसी भी तरह रोगी को बचाना है।'

मुझे बहुत दुःख हुआ। पर मै शान्त रहा। डॉक्टर मित्र थे , सज्जन थे। उन्होंने और उनकी पत्नि ने मुझ पर उपकार किया था। पर मै उक्त व्यवहार सहन करने के लिए तैयार न था।

'डॉक्टर साहब, अब स्थिति स्पष्ट कर लीजिये। कहिये आप क्या करना चाहते है ? मै अपनी पत्नी को उसकी इच्छा के बिना माँस नही खिलाने दूँगा। माँस ने लेने के कारण उसकी मृत्यु हो जाय, तो मै उस सहने के लिए तैयार हूँ।'

'डॉक्टर बोले, आपकी फिलासफी मेरे घर मे को हरजित नही चलेगी। मै आपसे कहता हूँ कि जब तक अपनी पत्नी को आप मेरे घर मे रहने देंगे, तब तक मै उसे अवश्य ही माँस अथवा जो कुछ भी उचित होगा , दूँगा। यदि यह स्वीकार न हो तो आप अपनी पत्नी को ले जाइये। मै अपने ही घर मे जानबूझकर उसकी मृत्यु नही होने दूँगा।'

'तो क्या आप यह कहते है कि मै अपनी पत्नी को इसी समय ले जाऊँ ? '

'मै कब कहता हूँ कि ले जाइये ? मै तो यह कहता हूँ कि मुझ पर किसी प्रकार का अंकुश न रखिये। उस दशा मे हम दोनो उसकी सार-सम्भाल करेंगे और आप निश्चिन्त होकर जा सकेंगे। यदि यह सीधी-स बात आप न समझ सके, तो मुझे विवश होकर कहना होगा कि आप अपनी पत्नी को मेरे घर से ले जाइये।'

मेरा ख्याल हो कि उस समय मेरा एक लड़का मेरे साथ था। मैने उससे पूछा। उसने कहा , ' आपकी बात मुझे मंजूर है। बा को माँस तो दिया ही नही जा सकता।'

फिर मै कस्तूरबाई के पास गया। वह बहुत अशक्त थी। उससे कुछ भी पूछना मेरे लिए दुःखदायी था , किन्तु धर्म समझकर मैने उसे थोड़े मे ऊपर की बात कह सुनायी। उसने ढृढता-पूर्वक उत्तर दिया, 'मै माँस का शोरवा नही लूँगी। मनुष्य को देह बार-बार नही मिलती। चाहे आपकी गोद मे मै मर जाऊँ, पर अपनी इस देह को भ्रष्ट तो नही होने दूँगी।'

जितना मै समझा सकता था , मैने समझाया और कहा , 'तुम मेरे विचारों का अनुसरण करने के लिए बँधी हुई नही हो।'

हमारी जान-पहचान के कई हिन्दू दवा के लिए माँस और मद्य लेते थे, इसकी भी मैने बात की। पर वह टस-से-मस न हुई और बोली , 'मुझे यहाँ से ले चलिये।'

मै बहुत प्रसन्न हुआ। ले जाने के विचार से घबरा गया। पर मैने निश्चय कर लिया। डॉक्टर को पत्नी का निश्चय सुना दिया। डॉक्टर गुस्सा हुए और बोले , 'आप तो बड़े निर्दय पति मालूम पड़ते है। ऐसी बीमारी मे उस बेचारी से इस तरह की बाते करने मे आपको शरम भी नही आयी ? मैं आपसे कहता हूँ कि आपकी स्त्री यहाँ से ले जाने लायक नही है। उसका शरीर इस योग्य नही है कि वह थोडा भी धक्का सहन करे। रास्ते मे ही उसकी जान निकल जाय, तो मुझे आश्चर्य न होगा। फिर भी आप अपने हठ के कारण बिल्कुल न माने , तो आप ले जाने के लिए स्वतंत्र है। यदि मै उसे शोरवा न दे सकूँ तो अपने घर मे एक रात रखने का भी खतरा मै नहीं उठा सकता।'

रिमझिम-रिमझिम मेह बरस रहा था। स्टेशन दूर था। डगबन से फीनिक्स तक रेल का और फीनिक्स से लगभग मील का पैदल रास्ता था। खतरा काफी था, पर मैने माना कि भगवान मदद करेगा। एक आदमी को पहले से फीनिक्स भेज दिया। फीनिक्स मे हमारे पास 'हैमक' था। जालीदार कपड़े की झोली या पालने को हैमक कहते है। उसके सिरे बाँस से बाँध दिये जाये , तो बीमार उसमे आराम से झूलता रह सकता है। मैने वेस्ट को खबर भेजी कि वे हैमक , एक बोतल गरम दूध , एक बोतल गरम पानी और छह आदमियो को साथ लेकर स्टेशन पर आ जाये।

दूसरी ट्रेन के छूटने का समय होने पर मैने रिक्शा मँगवाया और उसमे , इस खतरनाक हालत मे, पत्नी को बैठाकर म रवाना हो गया।

मुझे पत्नी की हिम्मत नही बँधानी पड़ी, उलटे उसी ने मुझे हिम्मत बँधाते हुए कहा , 'मुझे कुछ नही होगा, आप चिन्ता न कीजिये।'

हड्डियो के इस ढाँचे मे वजन तो कुछ रह ही नही गया था। खाया बिल्कुल नही जाता था। ट्रेन के डिब्बे तक पहुँचाने मे स्टेशन के लंबे-चौड़े प्लेटफार्म पर दूर तक चल कर जाना पड़ता था। वहां तक रिक्शा नही जा सकता था। मै उसे उठाकर डिब्बे तक ले गया। फीनिक्स पहुँचने पर तो वह झोली आ गयी थी। उसमे बीमार को आराम से ले गये। वहाँ केवल पानी के उपचार से धीरे-धीरे कस्तूरबाई का शरीर पुष्ट होने लगा।

फीनिक्स पहुँचने के बाद दो-तीन दिन के अन्दर एक स्वामी पधारे हमारे 'हठ' की बात सुनकर उनके मन मे दया उपजी और वे हम दोनो को समझाने आये। जैसा कि मुझे याद है , स्वामी के आगमन के समय मणिलाल और रामदास भी वहाँ मौजूद थे। स्वामीजी ने माँसाहार की निर्दोषता पर व्याख्यान देना शुरू किया। मनुस्मृति के श्लोको का प्रमाण दिया। पत्नी के सामने इस तरह की चर्चा मुझे अच्छी नही लगी। पर शिष्टता के विचार से मैने उसे चलने दिया। माँसाहार के सर्मथन मे मुझे मनुस्मृति के प्रमाण की आवश्यकता नही थी। मै उसके श्लोको को जानता था। मै जानता था कि उन्हें प्रक्षिप्त माननेवाला भी एक पक्ष है। पर वे प्रक्षिप्त न होते तो भी अन्नाहार के विषय मे मेरे विचार तो स्वतंत्र रीति से पक्के हो चुके थे। कस्तूरबाई की श्रद्धा काम कर रही थी। वह बेचारी शास्त्र के प्रमाण को क्या जाने ? उसके लिए तो बाप-दादा की रूढि ही धर्म थी। लड़को को अपने पिता के धर्म पर विश्वास था। इसलिए वे स्वामीजी से मजाक कर रहे थे। अन्त मे कस्तूरबाई ने इस संवाद को यह कहकर बन्द किया , 'स्वामीजी, आप कुछ भी क्यों न कहे , पर मुझे माँस का शोरवा खाकर स्वस्थ नही होना है। अब आप मेरा सिर न पचाये , तो आपका मुझ पर बड़ा उपकार होगा। बाकी बाते आपको लड़को के पिताजी से करनी हो , तो कर लीजियेगा। मैने अपना निश्चय आपको बतला दिया।'

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति