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लज्जाशीलता मेरी ढाल

अन्नाहारी मण्डल की कार्यकारिणी में मुझे चुन तो लिया गया और उसमें मैं हर बार हाजिर भी रहता था , पर बोलने के लिए जीभ खुलती ही न थी। डॉ. औल्डफील्ड मुझसे कहते, 'मेरे साथ तो तुम काफी बाक कर लेते हो, पर समिति की बैठक में कभी जीभ ही नहीं खोलते हो। तुम्हे तो नर-मक्खी की उपमा दी जानी चाहिये।' मैं इस विनोद को समझ गया। मक्खियाँ निरन्तर उद्यमी रहती हो, पर नर-मक्खियाँ बराबर खाती-पीती रहती हैं और काम बिल्कुल नहीं करती। यह बड़ी अजीब बात थी कि जब दूसरे सब समिति में अपनी-अपनी सम्मति प्रकट करते , तब मैं गूंगा बनकर ही बैठा रहता था। मुझे बोलने की इच्छा न होती हो सो बात नहीं, पर बोलता क्या ? मुझे सब सदस्य अपने से अधिक जानकार मालूम होते थे। फिर किसी विषय में बोलने की जरुरत होती और मैं कुछ कहने की हिम्मत करने जाता, इतने में दूसरा विषय छिड़ जाता।

यह चीज बहुत समय तक चली। इस बीच समिति में एक गंभीर विषय उपस्थित हुआ। उसमे भाग न लेना मुझे अन्याय होने देने जैसा लगा। गूंगे की तरह मत देकर शान्त रहने में नामर्दगी मालूम हुई। 'टेम्स आयर्न वर्कस' के मालिक हिल्स मण्डल के सभापति थे। कहा जा सकता हैं कि मण्डल उनके पैसे से चल रहा था। समिति के कई सदस्य तो उनके आसरे निभ रहे था। समिति में डॉ. एलिन्सन भी थे। उन दिनों सन्तानोत्पत्ति पर कृमित्र उपायो से अंकुश रखने का आन्दोलन चल रहा था। डॉ. एलिन्सन उन उपायो के समर्थक थे और मजदूरो में उनका प्रचार करते थे। मि. हिल्स को ये उपाय नीति-नाशक प्रतीत हुए। उनके विचार में अन्नाहारी मण्डल केवल आहार के ही सुधार के लिए नही था, बल्कि वह एक नीति-वर्धक मण्डल भी था। इसलिए उनकी राय थी कि डॉ. एलिन्सन के समान धातक विचार रखने वाले लोग उस मण्डल में नहीं रहने चाहिये। इसलिए डॉ. एलिन्सन को समिति से हटाने का एक प्रस्ताव आया। मैं इस चर्चा में दिलचस्पी रखता था। डॉ. एलिन्सन के कृमित्र उपायों-सम्बन्धी विचार मुझे भयंकर मालूम हुए थे , उनके खिलाफ मि. हिल्स के विरोध को मैं शुद्ध नीति मानता था। मेरे मन में उनके प्रति बड़ा आदर था। उनकी उदारता के प्रति भी आदर भाव था। पर अन्नाहार-संवर्धक मण्डल में से शुद्ध नीति के नियमों को ने मानने वाले का उसकी अश्रद्धा के कारण बहिस्कार किया जाये , इसमें मुझे साफ अन्याय दिखायी दिया। मेरा ख्याल था कि अन्नाहारी मण्डल के स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक मि. हिल्स के विचार उनके अपने विचार थे। मण्डल के सिद्धान्त के साथ उनका कोई सम्बन्ध न था। मण्डल का उद्देश्य केवल अन्नाहार का प्रचार करना था। दूसरी नीति का नहीं। इसलिए मेरी राय लह थी कि दूसरी अनेक नीतियों का अनादर करनेवाले के लिए भी अन्नाहार मण्डल में स्थान हो सकता हैं।

समिति में मेरे विचार के दूसरे सदस्य भी थे। पर मुझे अपने विचार व्यक्त करने का जोश चढा था। उन्हें कैसे व्यक्त किया जाये, यह एक महान प्रश्न बन गया। मुझमे बोलने की हिम्मत नहीं थी , इसलिए मैने अपने विचार लिखकर सभापति के सम्मुख रखने का निश्चय किया। मैं अपना लेख ले गया। जैसा कि मुझे याद है, मैं उसे पढ़ जाने की हिम्मत भी नही कर सका। सभापति ने उसे दूसरे सदस्य से पढवाया। डॉ. एलिन्सन का पक्ष हार गया। अतएव इस प्रकार के अपने इस पहले युद्ध में मैं पराजित पक्ष में रहा। पर चूकिं मैं उस पक्ष को सच्चा मानता था , इसलिए मुझे सम्पूर्ण संतोष रहा। मेरा कुछ ऐसा ख्याल है कि उसके बाद मैने समिति से इस्तिफा दे दिया था।

मेरी लज्जाशीलता विलायत में अन्त तक बनी रही। किसी से मिलने जाने पर भी, जहाँ पाँच-सात मनुष्यो की मण्डली इक्ट्ठा होती वहाँ मैं गूंगा बन जाता था।

एक बार मैं वेंटनर गया था। वहाँ मजमुदार भी थे। वहाँ के एक अन्नाहार घर में हम दोनो रहते थे। 'एथिक्स ऑफ डायेट' ते लेखक इसी बन्दरगाह में रहते थे। हम उनसे मिले। वहाँ अन्नाहार को प्रोत्साहन देने के लिए एक सभा की गयी। उसमे हम दोनो को बोलने का निमंत्रण मिला। दोनो ने उसे स्वीकार किया। मैने जान लिया था कि लिखा हुआ भाषण पढने में कोई दोष नहीं माना जाता। मैं देखता था कि अपने विचारों को सिलसिले से और संक्षेप में प्रकट करने के लिए बहुत से लोग लिखा हुआ पढ़ते थे। मैने अपना भाषण लिख लिया। बोलने की हिम्मत नहीं थी। जब मैं पढ़ने के लिए खड़ा हुआ, तो पढ़ न सका। आँखो के सामने अंधेरा छा गया और मेरे हाथ-पैर काँपने लगे। मेरा भाषण मुश्किल से फुलस्केप का एक पृष्ठ रहा होगा। मजमुदार ने उसे पढ़कर सुनाया। मजमुदार का भाषण तो अच्छा हुआ। श्रोतागण उनकी बातो का स्वागत तालियों की गड़गडाहट से करते थे। मैं शरमाया और बोलने की अपनी असमर्थता के लिए दुःखी हुआ।

विलायत में सार्वजनिक रुप से बोलने का अंतिम प्रयत्न करना पड़ा था। विलायत छोड़ने से पहले मैने अन्नाहारी मित्रों को हॉबर्न भोजन-गृह में भोज के लिए निमंत्रित किया था। मैने सोचा कि अन्नाहारी भोजन-गृहों में तो अन्नाहार मिलता ही हैं , पर जिस भोजन-गृह में माँसाहार बनता हो वहाँ अन्नाहार का प्रवेश हो तो अच्छा। यह विचार करके मैने इस गृह के व्यवस्थापक के साथ विशेष प्रबन्ध करके वहाँ भोज दिया। यह नया प्रयोग अन्नाहारियों में प्रसिद्धि पा गया। पर मेरी तो फजीहत ही हुई। भोजमात्र भोग के लिए ही होते हैं। पर पश्चिम में इनका विकास एक कला के रुप में किया गया हैं। भोज के समय विशेष आडम्बर की व्यवस्था रहती है। बाजे बजते हैं, भाषण किये जाते हैं। इस छोटे से भोज में भी यह सारा आडम्बर था ही। मेरे भाषण का समय आया। मैं खड़ा हुआ। खूब सोचकर बोलने की तैयारी की थी। मैने कुछ ही वाक्यो की रचना की थी, पर पहले वाक्य से आगे न बढ़ सका। एडीसन के विषय में पढ़ते हुए मैंने उसके लज्जाशील स्वभाव के बारे में पढ़ा था। लोकसभा हाइस ऑफ कॉमन्स) के उसके पहले भाषण के बारे में यह कहा जाता है कि उसने 'मेरी धारणा है', 'मेरी धारणा है', 'मेरी धारणा है', यो तीन वार कहां, पर बाद में आगे न बढ़ सका। जिस अंग्रेजी शब्द का अर्थ 'धारणा हैं', उसका अर्थ 'गर्भ धारण करना' भी हैं। इसलिए जब एडीसन आगे न बढ़ सका तो लोकसभा का एक मखसरा सदस्य कह बैठा कि 'इन सज्जन ने तीन बार गर्भ धारण किया, पर ये कुछ पैदा तो कर ही सके !' मैने यह कहानी सोच रखी थी और एक छोटा-सा विनोदपूर्ण भाषण करने का मेरा इरादा था। इसलिए मैने अपने भाषण का आरंभ इस कहानी से किया, पर गाड़ी वही अटक गयी। सोचा हुआ सब भूल गया और विनोदपूर्ण तथा गूढ़ार्थभरा भाषण करने की कोशिश मे मैं स्वयं विनोद का पात्र बन गया। अन्त मे 'सज्जनो, आपने मेरा निमंत्रण स्वीकार किया, इसके लिए मैं आपका आभार मानता हूँ ,' इतना कहकर मुझे बैठ जाना पड़ा !

मै कह सकता हूँ मेरा यह शरमीला स्वभाव दक्षिण अफ्रीका पहुँचने पर ही दूर हुआ। बिल्कुल दूर हो गया , ऐसा तो आज भी नही कहा जा सकता। बोलते समय सोचना तो पड़ता ही हैं। नये समाज के सामने बोलते हुए मैं सकुचाता हूँ। बोलने से बचा जा सके , तो जरुर बच जाता हूँ। और यह स्थिति तो आज नहीं हैं कि मित्र-मण्डली के बीच बैठा होने पर कोई खास बात कर ही सकूँ अथवा बात करने की इच्छा होती हो। अपने इस शरमीले स्वभाव के कारण मेरी फजीहत तो हुई पर मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ; बल्कि अब तो मैं देख सकता हूँ कि मुझे फायदा हुआ है। पहले बोलने का यह संकोच मेरे लिए दुःखकर था, अब वह सुखकर हो गया हैं। एक बड़ा फायदा तो यह हुआ कि मैं शब्दों का मितव्यय करना सीखा।

मुझे अपने विचारो पर काबू रखने की आदत सहज ही पड़ गयी। मैं अपने आपको यह प्रमाण-पत्र दे सकता हूँ कि मेरी जबान या कलम से बिना तौले शायद ही कोई शब्द कभी निकलता हैं। याद नहीं पड़ती कि अपने किसी भाषण या लेख के किसी अंश के लिए मुझे कभी शरमाना या पछताना पड़ा हो। मैं अनेक संकटों से बच गया हूँ और मुझे अपना बहुत-सा समय बचा लेने का लाभ मिला हैं।

अनुभव ने मुझे यह भी सिखाया है कि सत्य के प्रत्येक पुजारी के लिए मौन का सेवन इष्ट हैं। मनुष्य जाने-अनजाने भी प्रायः अतिशयोक्ति करता हैं , अथवा जो कहने योग्य हैं उसे छिपाता हैं, या दूसरे ढंग से कहता हैं। ऐसे संकटों से बचने के लिए भी मितभाषी होना आवश्यक हैं। कम बोलने वाला बिना विचारे नहीं बोलेगा ; वह अपने प्रत्येक शब्द को तौलेगा। अक्सर मनुष्य बोलने के लिए अधीर हो जाता हैं। 'मै भी बोलना चाहता हूँ,' इस आशय की चिट्ठी किस सभापति को नही मिलती होगी ? फिस उसे जो समय दिया जाता हैं वह उसके लिए पर्याप्त नहीं होता। वह अधिक बोलने देने की माँग करता है और अन्त में बिना अनुमति के भी बोलता रहता हैं। इन सब लोगो के बोलने से दुनिया को लाभ होता हैं, ऐसा क्वचित ही पाया जाता हैं। पर उतने समय की बरबादी तो स्पष्ट ही देखी जा सकती हैं। इसलिए यद्यपि आरम्भ मे मुझे अपनी लज्जाशीलता दुःख देती थी , लेकिन आज उसके स्मरण से मुझे आनन्द होता हैं। यह लज्जाशीलता मेरी ढ़ाल थी। उससे मुझे परिपक्व बनने का लाभ मिला। सत्य की अपनी पूजा में मुझे उससे सहायता मिली।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति