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अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?

मुझे तो किसानो की हालत की जाँच करनी थी। नील के मालिको के विरुद्ध जो शिकायते थी, उनमे कितनी सचाई है यह देखना था। इस काम के लिए हजारो किसानो से मिलने की जरूरत थी। किन्तु उनके संपर्क मे आने से पहले मुझे यह आवश्यक मालूम हुआ कि मै नील के मालिको की बात सुन लूँ और कमिश्नर से मिल लूँ। मुझे दोनो को चिट्ठी लिखी।

मालिको के मंत्री के साथ मेरी जो मुलाकात हुई , उसमे उसने साफ कह दिया कि आपकी गिनती परदेशी मे होती है। आपको हमारे और किसानो के बीच दखल नही देना चाहिये। फिर भी अगर आपको कुछ कहना हो, तो मुझे लिखकर सूचित कीजिये। मैने मत्री से नम्रतापूर्वक कहा कि मै अपने को परदेशी नही मानता और किसान चाहे तो उनकी स्थिति की जाँच करने का मुझे पूरा अधिकार है। मै कमिश्नर साहब से मिला। उन्होंने मुझे धमकाना शुरु कर दिया और मुझे सलाह दी कि मै आगे बढ़े बिना तिरहुत छोड़ दूँ।

मैने सारी बाते साथियो को सुनाकर कहा कि संभव है सरकार मुझे जाँच करने से रोके और जेल जाने का समय मेरी अपेक्षा से भी पहले आ जाये। अगर गिरफ्तारी होनी ही है , तो मुझे मोतीहारी मे और संभव हो तो बेतिया मे गिरफ्तार होना चाहिये और इसके लिए वहाँ जल्दी से जल्दी पहुँच जाना चाहिये।

चम्पारन तिरहुत विभाग का एक जिला है और मोतीहारी इसका मुख्य शहर। बेतिया के आसपास राजकुमार शुक्ल का घर था और उसके आसपास की कोठियो के किसान ज्यादा-से-ज्यादा कंगाल थे। राजकुमार शुक्ल को उनकी दशा दिखाने का लोभ था और मुझे अब उसे देखने की इच्छा थी।

अतएव मै उसी दिन साथियो को लेकर मोतीहारी के लिए रवाना हो गया। मोतीहारी मे गोरखबाबू ने आश्रय दिया और उनका घर धर्मशाला बन गया। हम सब मुश्किल से उसमे समा सकते थे। जिस दिन हम पहुँचे उसी दिन सुना कि मोतीहारी से कोई पाँच मील दूर रहने वाले एक किसान पर अत्याचार किया गया है। मैने निश्चय किया कि धरणीधरप्रसाद वकील को साथ लेकर मै दूसरे दिन सबेरे उसे देखने जाऊँगा। सवेरे हाथी पर सवार होकर हम चल पड़े। चम्पारन मे हाथी का उपयोग लगभग उसी तरह होता है , जिस तरह गुजरात मे बैलगाड़ियो का। आधे रास्ते पहुँचे होंगे कि इतने मे पुलिस सुपरिंटेंडेंट का आदमी आ पहुँचा और मुझे से बोला, ' सुपरिंटेंडेंट ने आपको सलाम भेजा है।' मै समझ गया। धरणीधरबाबू से मैने आगे जाने को कहा। मै उस जासूस के साथ उसकी भाड़े की गाड़ी मे सवार हुआ।

उसने मुझे चम्पारन छोड़कर चले जाने की नोटिस दी। वह मुझे घर ले गया और मेरी सही माँगी। मैने जवाब दिया कि मै चम्पारन छोड़ना नही चाहता, मुझे तो आगे बढ़ना है और जाँच करनी है। निर्वासन की आज्ञा का अनादर करने के लिए मुझे दूसरे ही दिन कोर्ट मे हाजिर रहने का समन मिला।

मैने सारी रात जागकर जो पत्र मुझे लिखने थे लिखे और ब्रजकिशोरबाबू को सब प्रकार की आवश्यकता सूचनाये दी।

समन की बात एकदम चारो ओर फैल गयी। लोग कहते थे कि उस दिन मोतीहारी मे जैसा दृश्य देखा गया वैसा पहले कभी न देखा गया था। गोरखबाबू के घर भीड़ उमड़ पड़ी। सौभाग्य से मैने अपना सारा काम रात को निबटा लिया था। इसलिए मै इन भीड़ को संभाल सका। साथियो का मूल्य मुझे पूरा-पूरा मालूम था। वे लोगो को संयत रखने मे जुट गये। कचहरी मे जहाँ जाता वहाँ दल के दल लोग मेरे पीछे आते। कलेक्टर , मेजिस्ट्रेट , सुपरिंटेंडेंट आदि के साथ भी मेरा एक प्रकार का संबन्ध स्थापति हो गया। सरकारी नोटिसो वगैरा के खिलाफ कानूनी विरोध करना चाहता , तो मै कर सकता था। इसके बदले मैने उनकी सब नोटिसो को स्वीकार कर लिया और अधिकारियो के साथ निजी व्यवहार मे मिठास से काम लिया। इसमे वे समझ गये कि मुझे उनका विरोध नही करना है, बल्कि उनकी आज्ञा का विनयपूर्वक विरोध करना है। इससे उनमे एक प्रकार की निर्भयता आ गयी। मुझे तंग करने के बदले उन्होंने लोगो को काबू मे रखने मे मेरी और मेरे साथियो की सहायता का प्रसन्न्ता पूर्वक उपयोग किया। किन्तु साथ ही वे समझ गये कि उनकी सत्ता आज से लुप्त हुई। लोग क्षणभर को दंड का भय छोड़कर अपने नये मित्र के प्रेम की सत्ता के अधीन हो गये।

याद रहे कि चम्पारन मे मुझे कोई पहचानता न था। किसान वर्ग बिल्कुल अनपढ़ था। चम्पारन गंगा के उस पार ठेठ हिमालय की तराई मे नेपाल का समीपवर्ती प्रदेश है , अर्थात् नई दुनिया है। वहाँ न कहीँ कांग्रेस का नाम सुनायी देता था, न कांग्रेस के कोई सदस्य दिखायी पड़ते थे। जिन्होने नाम सुना था वे कांग्रेस का नाम लेने मे अथवा उसमे सम्मिलित होने से डरते थे। आज कांग्रेस के नाम के बिना कांग्रेस के सवेको ने इस प्रदेश मे प्रवेश किया और कांग्रेस की दुहाई फिर गयी।

साथियो से परामर्श करके मैने निश्चय किया था कि कांग्रेस के नाम से कोई भी काम न किया जाय। हमे नाम से नही बल्कि काम से मतलब है। 'कथनी नही' 'करनी' की आवश्यकता है। कांग्रेस का नाम यहाँ अप्रिय है। इस प्रदेश मे कांग्रेस का अर्थ है , वकीलो की आपसी खींचातानी, कानूनी गलियो से सटक जाने की कोशिश। कांग्रेस यानी कथनी एक, करनी दूसरी। यह धारणा सरकार की और सरकार की निलहे गोरो की थी। हमे यह सिद्ध करना था कि कांग्रेस ऐसी नही है , कांग्रेस तो दूसरी चीज है। इसलिए हमने कही भी कांग्रेस का नाम तक न लेने और लोगो को कांग्रेस की भौतिक देह का परिचय न कराने का निश्चय किया था। हमने यह सोच लिया था कि वे उसके अक्षर को न जानकर उसकी आत्मा को जाने और उसका अनुकरण करे तो बस है। यही असल चीज है। अतएव कांग्रेस की ओर से किन्ही गुप्त या प्रकट दूतो द्वारा कोई भूमिका तैयार नही करायी गयी थी। राजकुमार शुक्ल में हजारो लोगो मे प्रवेश करने की शक्ति नही थी। उनके बीच किसी मे आज तक राजनीति का काम किया ही नही था। चम्पारन के बाहर की दुनिया को वे आज भी नही जानते थे। फिर भी उनका और मेरा मिलाप पुराने मित्रो जैसा लगा। अतएव यह करने मे अतिशयोक्ति नही बल्कि अक्षरशः सत्य है कि इस कारण मैने वहाँ ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया। जब मै इस साक्षात्कार के अपने अधिकार की जाँच करता हूँ, तो मुझे लोगो के प्रति अपने प्रेम के सिवा और कुछ भी नही मिलता। इस प्रेम का अर्थ है, प्रेम अर्थात अहिंसा के प्रति मेरी अविचल श्रद्धा।

चम्पारन का यह दिन मेरे जीवन मे कभी न भूलने जैसा था। मेरे लिए और किसानो के लिए यह एक उत्सव का दिन था। सरकारी कानून के अनुसार मुझ पर मुकदमा चलाया जानेवाला था। पर सच पूछा जाय तो मुकदमा सरकार के विरूद्ध था। कमिश्नर ने मेरे विरूद्ध जो जाल बिछाया था उसमे उसने सरकार को ही फँसा दिया।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति