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कार्य-पद्धति

चम्पारन की जाँच का विवरण देने का अर्थ है, चम्पारन के किसानो का इतिहास देना। ऐसा विवरण इन प्रकरणों मे नही दिया जा सकता। फिर, चम्पारन की जाँच का अर्थ है , अहिंसा और सत्य का एक बड़ा प्रयोग। इसके सम्बन्ध की जितनी बाते मुझे प्रति सप्ताह सूझती है उतनी देता रहता हूँ। उसका विशेष विवरण तो पाठको को बाबू राजेन्द्रप्रसाद द्वारा लिखित इस सत्याग्रह के इतिहास और 'युगधर्म' प्रेस द्वारा प्रकाशित उसके (गुजराती) अनुवाद में ही मिल सकता है।

अब मै इस प्रकरण के विषय पर आता हूँ। यदि गोरखबाबू के घर रहकर यह जाँच चलायी जाती , तो उन्हें अपना घर खाली करना पड़ता। मोतीहारी मे अभी लोग इतने निर्भय नही हुए थे कि माँगने पर कोई तुरन्त अपना मकान किराये पर दे दे। किन्तु चतुर ब्रजकिशोरबाबू ने एक लम्बे चौड़े अहाते वाला मकान किराये पर लिया और हम उसमे रहने गये।

स्थिति ऐसी नही थी कि हम बिल्कुल बिना पैसे के अपना काम चला सके। आज तक की प्रथा सार्वजनिक काम के लिए जनता से धन प्राप्त करने की नही थी। ब्रजकिशोरबाबू का मंडल मुख्यतः वकीलो का मंडल था। अतएव वे जरूरत पड़ने पर अपनी जेब से खर्च कर लेते थे और कुछ मित्रो से भी माँग लेते थे। उनकी भावना यह थी कि जो लोग स्वयं पैसे-टके से सुखी हो , वे लोगो से द्रव्य की भिक्षा क्यो माँगे ? मेरा यह ढृढ निश्चय था कि चम्पारन की रैयत से एक कौड़ी भी न ली जाय। यदि ली जाती तो उसका गलत अर्थ लगाये जाते। यह भी निश्चय था कि इस जाँच के लिए हिन्दुस्तान मे सार्वजनिक चन्दा न किया जा। वैसा करने पर यह जाँच राष्ट्रीय और राजनीतिक रूप धारण कर लेती। बम्बई से मित्रो मे 15 हजार रुपये की मदद का तार भेजा। उनकी यह मदद सधन्यबाद अस्वीकार की गयी। निश्चय यह हुआ कि ब्रजकिशोरबाबू का मंडल चम्पारन के बाहर से , लेकिन बिहार के ही खुशहाल लोगो से जितनी मदद ले सके और कम पड़ने वाली रकम मै डॉ. प्राणजीवनदास मेहता से प्राप्त कर लूँ। डॉ. मेहता ने लिखा कि जिनते रूपयो की जरूरत हो, मंगा लीजिये। अतएव द्रव्य के विषय मे हम निश्चिन्त हो गये। गरीबी-से , कम-से कम से खर्च करते हुए , लड़ाई चलानी थी , अतएव अधिक द्रव्य की आवश्यकता पड़ने की संभावना न थी। असल मे पड़ी भी नही। मेरा ख्याल है कि कुल मिलाकर दो या तीन हजार से अधिक खर्च नही हुआ था। जो द्रव्य इकट्ठा किया गया था उसमे से पाँच सौ या एक हजार रुपये बच गये थे , ऐसा मुझे याद है।

शुरू-शुरू के दिनो मे हमारी रहन-सहन विचित्र थी और मेरे लिए वह रोज के विनोद का विषय बन गयी थी। वकील-मंडल मे हर एक का अपना रसोइयो था और हरएक के लिए अलग अलग रसोई बनती थी। वे रात बारह बजे तक भी भोजन करते थे। ये सब महाशय रहते तो अपने खर्च से ही थे। परन्तु मेरे लिए अनकी यह रहन-सहन उपाधि रूप थी। मेरे और साथियो के बीच इतनी मजबूत प्रेमगांठ बंध गयी थी कि हममे कभी गलतफहमी हो ही नही सकती थी। वे मेरे शब्दबाणो को प्रेम-पूर्वक सहते थे। आखिर यह तय हुआ कि नौकरो को छुट्टी दे दी जाय। सब एक साथ भोजन करे और भोजन के नियमो का पालन करे। सब निरामिषाहारी नही थे और दो रसोईघर चलाने से खर्च बढता था। अतएव निश्चय हुआ कि निरामिष भोजन ही बनाया जाये और एक ही रसोईघर रखा जाये। भोजन भी सादा रखने का आग्रह था। इससे खर्च मे बहुत बहुत हुई , काम करने की शक्ति बढ़ी और समय भी बचा।

अधिक शक्ति की बहुत आवश्यकता थी , क्योकि किसानो के दल-के-दल अपनी कहानी लिखाने के लिए आने लगे थे। कहानी लिखाने वालो के साथ भीड़ तो रहती ही थी। इससे मकान का आहाता और बगीचा सहज ही भर जाता था। मुझे दर्शानार्थियो से सुरक्षित रखने के लिए साथी भारी प्रयत्न करते और विफल हो जाते। एक निश्चित समय पर मुझे दर्शन देने के बाहर निकाने सिवा कोई चारा न रह जाता था। कहानी लिखनेवाले भी पाँच-सात बराबर बने ही रहते थे, तो भी दिन के अन्त मे सबके बयान पूरे न हो पाते थे। इतने सारे बयानो की आवश्यकता नही थी , फिर भी बयान लेने से लोगो को संतोष होता था और मुझे उनकी भावना का पता चलता था।

कहानी लिखनेवालो को कुछ नियमो का पालन करना पड़ता था। जैसे , हरएक किसान से जिरह की जाय। जिरह मे जो उखड़ जाये , उसका बयान न लिया जाय। जिसकी बात मूल मे ही बेबुनियाद मालूम हो , उसके बयान न लिखे जाये। इस तरह के नियमो के पालन से यद्यपि थोड़ा अधिक समय खर्च होता था , फिर भी बयान बहुत सच्चे और साबित हो सकने वाले मिलते थे।

इन बयानो के लेते समय खुफिया पुलिस का कोई-न-कोई अधिकारी हाजिर रहता ही था। इन अधिकारियो को आने से रोका जा सकता था। पर हमने शुरू से ही निश्चय कर लिया था कि उन्हें न सिर्फ हम आने से नही रोकेंगे , बल्कि उनके प्रति विनय का बरताव करेंगे और दे सकने योग्य खबरे भी उन्हें देते रहेंगे। उनके सुनते और देखतो ही सारे बयान लिये जाते थे। उसका लाभ यह हुआ कि लोगो मे अधिक निर्भयता आयी। खुफिया पुलिस से लोग बहुत डरते थे। ऐसा करने से वह डर चला गया और उनकी आँखो के सामने दिये जानेवाले बयानो मे अतिशयोक्ति का डर कम रहता था। इस डर से कि झूठ बोलने पर अधिकारी कही उन्हे फांद न ले, उन्हें सावधानी से बोलना पड़ता था।

मै निलहो को खिझाना नही चाहता था, बल्कि मुझे तो उन्हें विनय द्वारा जीतने का प्रयत्न करना था। इसलिए जिसके विरूद्ध विशेष शिकायते आती , उसे मै पत्र लिखता और उससे मिलनेका प्रयत्न भी करता था। निलहो के मंडल से भी मै मिला और रैयत की शिकायते उनके सामने रखकर मैने उनकी बातें भी सुन ली थी। उनमें से कुछ तिरस्कार करते थे , कुछ उदासीन रहते थे और कोई-कोई मेरे साथ सभ्यता और नम्रता का व्यवहार करते थे।

सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी
Chapters
बाल-विवाह
बचपन
जन्म
प्रस्तावना
पतित्व
हाईस्कूल में
दुखद प्रसंग-1
दुखद प्रसंग-2
चोरी और प्रायश्चित
पिता की मृत्यु और मेरी दोहरी शरम
धर्म की झांकी
विलायत की तैयारी
जाति से बाहर
आखिर विलायत पहुँचा
मेरी पसंद
'सभ्य' पोशाक में
फेरफार
खुराक के प्रयोग
लज्जाशीलता मेरी ढाल
असत्यरुपी विष
धर्मों का परिचय
निर्बल के बल राम
नारायण हेमचंद्र
महाप्रदर्शनी
बैरिस्टर तो बने लेकिन आगे क्या?
मेरी परेशानी
रायचंदभाई
संसार-प्रवेश
पहला मुकदमा
पहला आघात
दक्षिण अफ्रीका की तैयारी
नेटाल पहुँचा
अनुभवों की बानगी
प्रिटोरिया जाते हुए
अधिक परेशानी
प्रिटोरिया में पहला दिन
ईसाइयों से संपर्क
हिन्दुस्तानियों से परिचय
कुलीनपन का अनुभव
मुकदमे की तैयारी
धार्मिक मन्थन
को जाने कल की
नेटाल में बस गया
रंग-भेद
नेटाल इंडियन कांग्रेस
बालासुंदरम्
तीन पाउंड का कर
धर्म-निरीक्षण
घर की व्यवस्था
देश की ओर
हिन्दुस्तान में
राजनिष्ठा और शुश्रूषा
बम्बई में सभा
पूना में
जल्दी लौटिए
तूफ़ान की आगाही
तूफ़ान
कसौटी
शान्ति
बच्चों की सेवा
सेवावृत्ति
ब्रह्मचर्य-1
ब्रह्मचर्य-2
सादगी
बोअर-युद्ध
सफाई आन्दोलन और अकाल-कोष
देश-गमन
देश में
क्लर्क और बैरा
कांग्रेस में
लार्ड कर्जन का दरबार
गोखले के साथ एक महीना-1
गोखले के साथ एक महीना-2
गोखले के साथ एक महीना-3
काशी में
बम्बई में स्थिर हुआ?
धर्म-संकट
फिर दक्षिण अफ्रीका में
किया-कराया चौपट?
एशियाई विभाग की नवाबशाही
कड़वा घूंट पिया
बढ़ती हुई त्यागवृति
निरीक्षण का परिणाम
निरामिषाहार के लिए बलिदान
मिट्टी और पानी के प्रयोग
एक सावधानी
बलवान से भिड़ंत
एक पुण्यस्मरण और प्रायश्चित
अंग्रेजों का गाढ़ परिचय
अंग्रेजों से परिचय
इंडियन ओपीनियन
कुली-लोकेशन अर्थात् भंगी-बस्ती?
महामारी-1
महामारी-2
लोकेशन की होली
एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव
फीनिक्स की स्थापना
पहली रात
पोलाक कूद पड़े
जाको राखे साइयां
घर में परिवर्तन और बालशिक्षा
जुलू-विद्रोह
हृदय-मंथन
सत्याग्रह की उत्पत्ति
आहार के अधिक प्रयोग
पत्नी की दृढ़ता
घर में सत्याग्रह
संयम की ओर
उपवास
शिक्षक के रुप में
अक्षर-ज्ञान
आत्मिक शिक्षा
भले-बुरे का मिश्रण
प्रायश्चित-रुप उपवास
गोखले से मिलन
लड़ाई में हिस्सा
धर्म की समस्या
छोटा-सा सत्याग्रह
गोखले की उदारता
दर्द के लिए क्या किया ?
रवानगी
वकालत के कुछ स्मरण
चालाकी?
मुवक्किल साथी बन गये
मुवक्किल जेल से कैसे बचा ?
पहला अनुभव
गोखले के साथ पूना में
क्या वह धमकी थी?
शान्तिनिकेतन
तीसरे दर्जे की विडम्बना
मेरा प्रयत्न
कुंभमेला
लक्षमण झूला
आश्रम की स्थापना
कसौटी पर चढ़े
गिरमिट की प्रथा
नील का दाग
बिहारी की सरलता
अंहिसा देवी का साक्षात्कार ?
मुकदमा वापस लिया गया
कार्य-पद्धति
साथी
ग्राम-प्रवेश
उजला पहलू
मजदूरों के सम्पर्क में
आश्रम की झांकी
उपवास (भाग-५ का अध्याय)
खेड़ा-सत्याग्रह
'प्याज़चोर'
खेड़ा की लड़ाई का अंत
एकता की रट
रंगरूटों की भरती
मृत्यु-शय्या पर
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
वह अद्भूत दृश्य!
वह सप्ताह!-1
वह सप्ताह!-2
'पहाड़-जैसी भूल'
'नवजीवन' और 'यंग इंडिया'
पंजाब में
खिलाफ़त के बदले गोरक्षा?
अमृतसर की कांग्रेस
कांग्रेस में प्रवेश
खादी का जन्म
चरखा मिला!
एक संवाद
असहयोग का प्रवाह
नागपुर में पूर्णाहुति