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गुण और प्रधान

सत, रज, तम को गुण नाम क्यों दिया गया यह भी मजेदार बात है। जब यही सृष्टि के मूल में है तब तो यही प्रधान ठहरे, मुख्य ठहरे, असल ठहरे, अग्रणी ठहरे। लेकिन इन्हें गुण कहते हैं! गुण या गौण का अर्थ है अप्रधान, जो मुख्य न हो, अग्रणी न हो। और प्रधान किसे कहा है? प्रकृति को, जो इन तीनों गुणों के मिल जाने से बन जाती है। जब ये तीनों गुण अपनी विषमता छोड़ के सम रूप से मिल जाते हैं, जब इनकी साम्यावस्था हो जाती है तो उसे ही प्रकृति और प्रधान कहते हैं; हालाँकि वह पीछे की चीज होने से गुण या गौण ठहरी। साम्यावस्था ही प्रलय की अवस्था है। उस दशा में सृष्टि का काम कुछ भी नहीं हो पाता - सब कुछ खत्म हो जाता है।

यद्यपि चौदहवें अध्यााय के 5वें से 25वें तक के श्लोकों में इन गुणों की बात विशेष रूप से कही गई है, तथापि 5-18 तक के 14 श्लोकों के पढ़ने से, अभी जो शंका उठी है, उसका उत्तर मिल जाता है। दूसरी भी बातें विदित हो जाती हैं। इसीलिए इस अध्याकय का विशेष महत्त्व हमने माना है। इन्हें गुण क्यों कहते हैं, इस संबंध में पाँचवाँ श्लोक खास महत्त्व रखता है। मगर उसका अर्थ करने या और भी विचार करने के पूर्व हमें सृष्टि की एक बात जान लेने की है जो उससे पहले के 3, 4 श्लोकों में कही गई है। हम तो हमेशा सृष्टि के ही संबंध में सोचते हैं कि यह कैसे बनी, इसका विकास या पसारा कैसे हुआ। दर्शनों का श्रीगणेश तो इसी बात को लेके होता ही है, यह पहले ही कहा जा चुका है। प्रलय या सृष्टि न रहने की दशा को तो हम पहले सोचते नहीं। वह तो हमारे सामने की चीज है नहीं। विचार के ही सिलसिले में जब उसकी बात पीछे आ जाती है, तो उस पर भी सोचते हैं। मगर उस दशा में भी वह महज ख्यांली और दिमागी चीज होती है। वह सामने की या ठोस वस्तु तो होती नहीं। फिर पहले उधर खयाल जाए तो कैसे ?

एक बात और है। सृष्टि का अर्थ ही है अनेकता, विभिन्नता (Diversity, Heterogeniety)। इसी विभिन्नता को लेके हम शुरू करते हैं और अंवेषण चालू होता है। प्रलय तो इससे उलटी चीज है। उसमें तो एकता और अभिन्नता है, एकरूपता और समता (Uniformily & Homogeneity) है। जैसा कि गीता ने चौदहवें अध्यारय के 6-18 श्लोकों में बताया है, गुणों में तो परस्परविरोध है - वे ऐसे हैं कि एक दूसरे को खा जाएँ। यदि हम तीनों के प्रतिनिधि के रूप में पित्त, वात और कफ को मान लें तो इनकी बात कुछ समझ में आ जाए। क्रमश: सत, रज, तम की जगह स्थूल शरीर में पित्त, वात, कफ माने जाते भी हैं। पित्तादि में सत्त्वादि की ही यों भी प्रधानता रहती है। सत में प्रकाश, उजाला, हल्कापन आदि माने जाते हैं। पित्त में भी यही चीजें हैं। पित्त आग या गर्म है। और उसी में ये बातें होती हैं। रज में क्रिया होती है और वायु तो सतत क्रियाशील है। तम भारी है और कफ भी जकड़ने वाली चीज है। शरीर के लिए जैसे पित्तादि तीनों की जरूरत है, वैसे ही संसार के लिए सत्त्वादि की आवश्यकता है। हाँ, पित्त आदि की मात्रा निश्चित रहे तो ठीक हो, नहीं तो गड़बड़, बेचैनी, बीमारी हो। यही बात सत्त्वादि की भी है। उनकी भी निश्चित मात्रा है और जहाँ वह बिगड़ी कि गड़बड़ शुरू हुई। जैसे शरीर में एक समय एक ही पित्त या वायु या कफ प्रधान हो के रहता है, वैसी ही बात इन गुणों की भी है। एक समय एक ही प्रधान रहेगा; बाकी उसी के मातहत। यही बात गीता ने 'रजस्तमश्चाभिभूय' (14। 10) श्लोक में साफ कही है।

इन गुणों का परस्पर विरोध तो मानते ही हैं। वायु, कफ, पित्त की भी यही बात है। मगर जरा और भी देख लें। ज्ञान के लिए, हल्केपन के लिए और प्रकाश के लिए क्रिया नहीं चाहिए, भारीपन नहीं चाहिए। ज्यादा हलचल से प्रकाश रुक जाता है, ज्ञान नहीं हो पाता, मन की एकाग्रता नहीं हो पाती। भारीपन से या तो नींद आती है या बेचैनी होती है। ज्ञान है सत का काम। हल्कापन और प्रकाश भी उसी का काम है। उसकी विरोधी क्रिया है रज का काम और भारीपन है तम का। साफ ही देखते हैं कि ज्ञान होने से मन उसमें लगे तो क्रिया रुक जाए। निद्रा या भारीपन भी जाता रहे। हल्कापन उसका विरोधी जो है। भारीपन हो तो सारी चीजें दब के रह जाएँ, नींद आ जाए और क्रिया न हो सके। ज्ञान की तो बात ही मत पूछिए। 6 से 9 तथा 11 से 18 तक के श्लोकों में इसी बात का सुंदर विवरण है।

मगर खूबी यह है कि इन तीनों का आपस में समझौता है कि हम लोग मिल के रहेंगे; नहीं तो किसी की खैर नहीं! राजनीति में आज तो धर्मों और देशों का परस्पर विरोध है वह तो इनके सामने फीका पड़ जाता है - वह इनके विरोध के सामने कुछ नहीं है। मगर चाहे हमारी नादानी से धर्मविरोध और राजनीति का विरोध मिटे या न मिटे, भाई-भाई की लड़ाई खत्म हो या न हो। मगर इनने तो पारस्परिक विरोध मिटा लिया है, समझौता (Pact) कर लिया है। इन्हें दुनिया में सिर ऊँचा करके रहना जो है। और हमें? हमें तो गैरों के जूते सहने और गुलामी करनी है न? फिर हमारा मेल कैसे हो? हाँ, तो इनने यह समझौता कर लिया है कि एक वक्त में हममें एक ही प्रधान होगा, नेता होगा, मुखिया होगा; बाकी दो उसी के साथ, उसी के अनुकूल चलेंगे, उसी की मदद करेंगे, बावजूद इसके कि ये दोनों ही उसके सख्त दुश्मन हैं! फिर मौके पर जरूरत के अनुसार हममें दूसरा प्रधान तथा लीडर होगा और पहला उस जगह से हटेगा। उस समय भी बाकी दो उसी प्रधान के सहायक होंगे। आवश्यकतानुसार उसे हटा के जब तीसरा मुखिया बनेगा तो बाकी दो उसके ही सहायक और साथी बनेंगे। यही है इन तीनों का अलिखित समझौता (Convention)। पूर्वोक्त दसवें श्लोक का यही अभिप्राय है।

यहीं पर इन्हें गुण कहने का एक कारण मिल जाता है। जैसा कि अभी कहा गया है, सृष्टि के रहते हुए इन तीन में दो या अधिकांश हमेशा एक के पीछे रहते हैं, उसी के सहायक और मददगार होते हैं; यहाँ तक कि अपना स्वभाव छोड़ के उसके विपरीत उसकी मदद करते हैं, जैसे बलपूर्वक किसी गुलाम से कोई काम कराया जाए। फर्क यही है कि इनके लिए बल प्रयोग नहीं है। दूरअंदेशी से खुद ही ये वैसा करते हैं। और इनमें जो एक कभी प्रधान होता है वही पीछे अप्रधान बन जाता है। इस प्रकार देखते हैं कि ये तीनों गुण सृष्टि के मूल कारण होते हुए यद्यपि प्रधान कहे जाने योग्य हैं, तथापि इनकी असली खूबी है दूसरों के अनुयायी बनना, उनकी सहायता करना, उनके अनुकूल होना। सृष्टि की दृष्टि से इनकी यह खूबी जरूरी है भी। इसी विशेषता के खयाल से, इसी ओर खयाल आकृष्ट करने के ही लिए इन्हें गुण कहा है। दसवें श्लोक से यही पता चलता है।

अब जरा दूसरा पहलू देखिए। यदि 5-9 श्लोकों को देखें तो पता चलता है कि ये तीनों ही गुण बाँधने का काम करते हैं। कोई ज्ञान, सुख आदि में मनुष्य को लिप्त करके, लिपटा के उन्हीं चीजों से उसे बाँध देते हैं; क्योंकि किसी चीज की ज्यादती ही ऐब है, बंधन है, तो कोई क्रिया और लोभ आदि में फँसा देते हैं। यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, यह काम शेष है, वह बाकी है इसी हाय-हाय में जिंदगी गुजरती है। जिस प्रकार सत गुण, ज्ञान आदि में फँसा के बाँध देता है, उसी प्रकार रज क्रिया और लोभ आदि में। जाल में फँसाने का काम करने में ज्ञान सुख, क्रिया, लोभ चारे की जगह प्रयुक्त होते हैं। तम का तो फँसाना काम प्रसिद्ध ही है। वह तो हमेशा का ही बदनाम है। मगर जो उससे अच्छा रज है और जो महान माने जानेवाला सत है वह भी फँसाने में किसी से पीछे नहीं है! 'छोटी बहू तो छोटी, बड़ी बहू शुभानल्ला !' और यह तो जानते ही हैं कि फाँसने और बाँधने का काम रस्सी करती है। फिर चाहे वह सूत की बारीक या मोटी हो, या, और चीज की हो। संस्कृत में रस्सी को गुण कहते हैं। इसी का अपभ्रंश हो के गोन शब्द हो गया। नाव खींचने की रस्सी को गोन कहते हैं। फलत: फँसाने और बाँधने की ताकत इन गुणों में होने के ही कारण इन्हें गुण कहा है; ताकि लोग इनसे सजग रहें। 5-9 श्लोकों से यह स्पष्ट है। 5वें के उत्तरार्द्ध में तो एक ही साथ तीनों को बाँधनेवाले कह दिया है - 'निबध्नन्ति महाबाहो।' इसीलिए अर्जुन को कहा गया है कि इन गुणों से ऊपर जाओ - 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन' (2। 45)। इसी चौदहवें अध्या य में भी कहा है कि इन गुणों से अलग ब्रह्मात्मा को जानने वाले की मुक्ति होती है - 'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' (14। 19), तथा इन गुणों से ऊपर उठने पर ही मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाता है - 'स गुणान्समतीयैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते' (14। 26)।

गुणों में यह परस्पर विरोध और मिल के काम करने की - दोनों - बात योगसूत्र - 'परिणामतापसंस्कारदु:खैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु:खमेव सर्वं विवेकिन:' (2। 15) - में और इसके भाष्य में भी अत्यंत विशद रूप से बताई गई है। वहीं पर यह भी कह दिया है कि तीनों गुण परस्पर मिल के ही हर चीज पैदा करते हैं। इसीलिए तो सभी पदार्थों में तीनों ही गुण पाए जाते हैं। ईश्वरकृष्ण ने सांख्यकारिकाओं में भी 'सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज:। गुरु वर्णकमेव तम: प्रदीवच्चार्थतो वृत्ति:' (13) के द्वारा इन तीनों गुणों को परस्पर विरोधी बता के बाद में तीनों के मिल के काम करने का बहुत ही सुंदर दृष्टांत दिया है। इनके परस्पर मिलने का कारण भी बताया है। वह कहता है कि जिस प्रकार दीपक में तेल, बत्तीर और तेज या अग्नि तीनों ही परस्पर विरोधी हैं तथापि तीनों को मिलाए बिना रोशनी होई नहीं सकती। आग बत्तीत और तेल दोनों को ही खत्म करने वाली है। तेल ज्यादा दे दिया जाए जलना बंद हो जाए, बुझ जाए। बत्तीं को भी भिगो के विकृत बना देता है। बत्ती भी तेल को सोखती है अगर सख्त बत्ती या कपड़े का बंडल डाल दें तो चिराग बुझ जाए। मगर प्रयोजनवश तीनों को हिसाब से रख के काम चलाते हैं। इस तरह परस्पर मेल से ही दीपक जलता है। इसी प्रकार संसार के कामों के चलाने और गुणों के अपने स्वतंत्र अस्तित्व के ही लिए तीनों का मिल के काम करना जरूरी हो जाता है।

गीताधर्म और मार्क्सवाद

स्वामी सहजानन्द सरस्वती
Chapters
गीताधर्म कर्म का पचड़ा श्रद्धा का स्थान धर्म व्यक्तिगत वस्तु है धर्म स्वभावसिद्ध है स्वाभाविक क्या है? मार्क्‍सवाद और धर्म द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और धर्म भौतिक द्वन्द्ववाद धर्म, सरकार और पार्टी दृष्ट और अदृष्ट अर्जुन की मानवीय कमजोरियाँ स्वधर्म और स्वकर्म योग और मार्क्‍सवाद गीता की शेष बातें गीता में ईश्वर ईश्वर हृदयग्राह्य हृदय की शक्ति आस्तिक-नास्तिक का भेद दैव तथा आसुर संपत्ति समाज का कल्याण कर्म और धर्म गीता का साम्यवाद नकाब और नकाबपोश रस का त्याग मस्ती और नशा ज्ञानी और पागल पुराने समाज की झाँकी तब और अब यज्ञचक्र अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ अन्य मतवाद अपना पक्ष कर्मवाद और अवतारवाद ईश्वरवाद कर्मवाद कर्मों के भेद और उनके काम अवतारवाद गुणवाद और अद्वैतवाद परमाणुवाद और आरंभवाद गुणवाद और विकासवाद गुण और प्रधान तीनों गुणों की जरूरत सृष्टि और प्रलय सृष्टि का क्रम अद्वैतवाद स्वप्न और मिथ्यात्ववाद अनिर्वचनीयतावाद प्रातिभासिक सत्ता मायावाद अनादिता का सिद्धांत निर्विकार में विकार गीता, न्याय और परमाणुवाद वेदांत, सांख्य और गीता गीता में मायावाद गीताधर्म और मार्क्सवाद असीम प्रेम का मार्ग प्रेम और अद्वैतवाद ज्ञान और अनन्य भक्ति सर्वत्र हमीं हम और लोकसंग्रह अपर्याप्तं तदस्माकम् जा य ते वर्णसंकर: ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव सर्व धर्मान्परित्यज्य शेष बातें उत्तरायण और दक्षिणायन गीता की अध्‍याय-संगति योग और योगशास्त्र सिद्धि और संसिद्धि गीता में पुनरुक्ति गीता की शैली पौराणिक गीतोपदेश ऐतिहासिक गीताधर्म का निष्कर्ष योगमाया समावृत