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उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०

सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ ।

दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ ॥११ -क॥

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।

देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥११ -ख॥

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद ।

चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥११ग॥

चौपाला

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा । तुरत दिब्य सिंघासन मागा ॥

रबि सम तेज सो बरनि न जाई । बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥

जनकसुता समेत रघुराई । पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥

बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे । नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा । पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥

सुत बिलोकि हरषीं महतारी । बार बार आरती उतारी ॥

बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे । जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥

सिंघासन पर त्रिभुअन साई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं ॥

छंद

नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं ।

नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥

भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते ।

गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥१॥

श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई ।

नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥

मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।

अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥२॥

दोहा

वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस ।

बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस ॥१२ -क॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम ।

बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम ॥१२ -ख॥

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान ।

लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥१२ग॥

छंद

जय सगुन निर्गुन रूप अनूप भूप सिरोमने ।

दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने ॥

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे ।

जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥१॥

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे ।

भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ॥

जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे ।

भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ॥२॥

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी ।

ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥

बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे ।

जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥३॥

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी ।

नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी ॥

ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे ।

पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥४॥

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने ।

षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥

फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे ।

पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥५॥

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं ।

ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥

करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं ।

मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥६॥

दोहा

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार ।

अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥१३ -क॥

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर ।

बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥१३ -ख॥

छंद

जय राम रमारमनं समनं । भव ताप भयाकुल पाहि जनं ॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥१॥

दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥

रजनीचर बृंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥२॥

महि मंडल मंडन चारुतरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ॥

मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥३॥

मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥

हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे ॥४॥

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥

भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥५॥

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥

अवलंब भवंत कथा जिन्ह के ॥प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥६॥

नहिं राग न लोभ न मान मदा ॥तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥

एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥७॥

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥

सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥८॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ॥

तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥९॥

गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ॥

रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥१०॥

दोहा

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।

पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥१४ -क॥

बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।

तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥१४ -ख॥

चौपाला

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥

महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥

सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥

खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥

नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

नित नइ प्रीति राम पद पंकज । सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥

मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥

दोहा

ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति ।

जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥१५॥

चौपाला

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं । जिमि परद्रोह संत मन माही ॥

तब रघुपति सब सखा बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥

परम प्रीति समीप बैठारे । भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥

तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई । मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई ॥

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे । मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥

अनुज राज संपति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही ॥

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना । मृषा न कहउँ मोर यह बाना ॥

सब के प्रिय सेवक यह नीती । मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥

दोहा

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।

सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ॥१६॥

चौपाला

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । को हम कहाँ बिसरि तन गए ॥

एकटक रहे जोरि कर आगे । सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा ॥

प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥

तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥

सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥

अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥

दोहा

जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।

हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ ॥१७ -क॥

तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि ।

अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥१७ -ख॥

चौपाला

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥

मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली ॥

असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥

मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥

बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥

अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥

दोहा

अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव ।

प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥१८ -क॥

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ।

बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥१८ -ख॥

चौपाला

भरत अनुज सौमित्र समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥

अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा ॥

बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥

अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥

तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥

दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥

अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनहु हनुमंता ॥

दोहा

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि ।

बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥१९ -क॥

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत ।

तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत ॥ !९ -ख॥

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि ।

चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥१९ -ग॥

चौपाला

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा । दीन्हे भूषन बसन प्रसादा ॥

जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥

बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥

चरन नलिन उर धरि गृह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥

रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥

राम राज बैंठें त्रेलोका । हरषित भए गए सब सोका ॥

बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥

दोहा

बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग ।

चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥२०॥

चौपाला

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥

चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥

राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०