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अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०

दोहा

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि ॥८१॥

चौपाला

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई । सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥
जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥
पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा । फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥
नाहिं त मोर मरनु परिनामा । कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥

दोहा

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥८ ॥

चौपाला

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए । करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥
चलत रामु लखि अवध अनाथा । बिकल लोग सब लागे साथा ॥
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं । फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥
लागति अवध भयावनि भारी । मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥
घोर जंतु सम पुर नर नारी । डरपहिं एकहि एक निहारी ॥
घर मसान परिजन जनु भूता । सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं । सरित सरोवर देखि न जाहीं ॥

दोहा

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥८३॥

चौपाला

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥
नगरु सफल बनु गहबर भारी । खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥
बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही । जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥
सहि न सके रघुबर बिरहागी । चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥
सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं । राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं ॥
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू ॥
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई । सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही । बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही ॥

दोहा

बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥८४॥

चौपाला

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी । सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥
करुनामय रघुनाथ गोसाँई । बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए । बहुबिधि राम लोग समुझाए ॥
किए धरम उपदेस घनेरे । लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे ॥
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई । असमंजस बस भे रघुराई ॥
लोग सोग श्रम बस गए सोई । कछुक देवमायाँ मति मोई ॥
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती । राम सचिव सन कहेउ सप्रीती ॥
खोज मारि रथु हाँकहु ताता । आन उपायँ बनिहि नहिं बाता ॥

दोहा

राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ॥
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ॥८५॥

चौपाला

जागे सकल लोग भएँ भोरू । गे रघुनाथ भयउ अति सोरू ॥
रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं । राम राम कहि चहु दिसि धावहिं ॥
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू । भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू ॥
एकहि एक देंहिं उपदेसू । तजे राम हम जानि कलेसू ॥
निंदहिं आपु सराहहिं मीना । धिग जीवनु रघुबीर बिहीना ॥
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा । तौ कस मरनु न मागें दीन्हा ॥
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा । आए अवध भरे परितापा ॥
बिषम बियोगु न जाइ बखाना । अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥

दोहा

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥८६॥

चौपाला

सीता सचिव सहित दोउ भाई । सृंगबेरपुर पहुँचे जाई ॥
उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा । सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा । रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥

दोहा

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥८७॥

चौपाला

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई । मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई ॥
लिए फल मूल भेंट भरि भारा । मिलन चलेउ हिँयँ हरषु अपारा ॥
करि दंडवत भेंट धरि आगें । प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें ॥
सहज सनेह बिबस रघुराई । पूँछी कुसल निकट बैठाई ॥
नाथ कुसल पद पंकज देखें । भयउँ भागभाजन जन लेखें ॥
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा । मैं जनु नीचु सहित परिवारा ॥
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ । थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ ॥
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना । मोहि दीन्ह पितु आयसु आना ॥

दोहा

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु ॥८८॥

चौपाला

राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा । लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा ॥
तब निषादपति उर अनुमाना । तरु सिंसुपा मनोहर जाना ॥
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा । कहेउ राम सब भाँति सुहावा ॥
पुरजन करि जोहारु घर आए । रघुबर संध्या करन सिधाए ॥
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई । कुस किसलयमय मृदुल सुहाई ॥
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी । दोना भरि भरि राखेसि पानी ॥

दोहा

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ ॥८९॥

चौपाला

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी । कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी ॥
कछुक दूर सजि बान सरासन । जागन लगे बैठि बीरासन ॥
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती । ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती ॥
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई । कटि भाथी सर चाप चढ़ाई ॥
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू । भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू ॥
तनु पुलकित जलु लोचन बहई । बचन सप्रेम लखन सन कहई ॥
भूपति भवन सुभायँ सुहावा । सुरपति सदनु न पटतर पावा ॥
मनिमय रचित चारु चौबारे । जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ॥

दोहा

सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।
पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास ॥९०॥

चौपाला

बिबिध बसन उपधान तुराई । छीर फेन मृदु बिसद सुहाई ॥
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं । निज छबि रति मनोज मदु हरहीं ॥
ते सिय रामु साथरीं सोए । श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए ॥
मातु पिता परिजन पुरबासी । सखा सुसील दास अरु दासी ॥
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई । महि सोवत तेइ राम गोसाईं ॥
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ । ससुर सुरेस सखा रघुराऊ ॥
रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ॥
सिय रघुबीर कि कानन जोगू । करम प्रधान सत्य कह लोगू ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०