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सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०

दोहा

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥१॥

चौपाला

जात पवनसुत देवन्ह देखा । जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता । पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥

दोहा

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥२॥

चौपाला

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥

नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥

सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें ॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥

गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥

अति उतंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा ॥

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना ।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥१॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥२ ॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥३॥

दोहा

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ॥३॥

चौपाला

मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

पुनि संभारि उठि सो लंका । जोरि पानि कर बिनय संसका ॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे ॥

तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

दोहा

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥४॥

चौपाला

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना । पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥

गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥

सयन किए देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥

भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥

दोहा

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ॥५॥

चौपाला

लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥

मन महुँ तरक करै कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ॥

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ॥

दोहा

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥६॥

चौपाला

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥

तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥

अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥

कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥

दोहा

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥७॥

चौपाला

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥

पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ॥

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥

कृस तन सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥

दोहा

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥८॥

चौपाला

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई ॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥

तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥

अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥

सठ सूने हरि आनेहि मोहि । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥

दोहा

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।

परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥९॥

चौपाला

सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥

नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥

स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥

सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥

चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥

सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥

सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥

मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥

दोहा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ॥१०॥

चौपाला

त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥

सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥

खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥

नगर फिरी रघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥

यह सपना में कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥

तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०