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बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०

सोरठा

तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत ॥१५१॥
चौपाला
इच्छामय नरबेष सँवारें । होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे ॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता । करिहउँ चरित भगत सुखदाता ॥
जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा । सत्य सत्य पन सत्य हमारा ॥
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना । अंतरधान भए भगवाना ॥
दंपति उर धरि भगत कृपाला । तेहिं आश्रम निवसे कछु काला ॥
समय पाइ तनु तजि अनयासा । जाइ कीन्ह अमरावति बासा ॥

दोहा

यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु ॥१५२॥

मासपारायण ,पाँचवाँ विश्राम

चौपाला
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी । जो गिरिजा प्रति संभु बखानी ॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू । सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू ॥
धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥
राज धनी जो जेठ सुत आही । नाम प्रतापभानु अस ताही ॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा । भुजबल अतुल अचल संग्रामा ॥
भाइहि भाइहि परम समीती । सकल दोष छल बरजित प्रीती ॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा । हरि हित आपु गवन बन कीन्हा ॥

दोहा

जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस ॥१५३॥

चौपाला
नृप हितकारक सचिव सयाना । नाम धरमरुचि सुक्र समाना ॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा । आपु प्रतापपुंज रनधीरा ॥
सेन संग चतुरंग अपारा । अमित सुभट सब समर जुझारा ॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना । अरु बाजे गहगहे निसाना ॥
बिजय हेतु कटकई बनाई । सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई ॥
जँह तहँ परीं अनेक लराईं । जीते सकल भूप बरिआई ॥
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे । लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें ॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला । एक प्रतापभानु महिपाला ॥

दोहा

स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु ॥१५४॥

चौपाला
भूप प्रतापभानु बल पाई । कामधेनु भै भूमि सुहाई ॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । धरमसील सुंदर नर नारी ॥
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती । नृप हित हेतु सिखव नित नीती ॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा । करइ सदा नृप सब कै सेवा ॥
भूप धरम जे बेद बखाने । सकल करइ सादर सुख माने ॥
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना । सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना ॥
नाना बापीं कूप तड़ागा । सुमन बाटिका सुंदर बागा ॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए । सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए ॥

दोहा

जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग ॥१५५॥

चौपाला
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥
करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा । मृगया कर सब साजि समाजा ॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू ॥
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं । मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं ॥
कोल कराल दसन छबि गाई । तनु बिसाल पीवर अधिकाई ॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ । चकित बिलोकत कान उठाएँ ॥

दोहा

नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु ॥१५६॥

चौपाला
आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भाजी ॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना । महि मिलि गयउ बिलोकत बाना ॥
तकि तकि तीर महीस चलावा । करि छल सुअर सरीर बचावा ॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ संग लागा ॥
गयउ दूरि घन गहन बराहू । जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू ॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू । तदपि न मृग मग तजइ नरेसू ॥
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा । भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा ॥
अगम देखि नृप अति पछिताई । फिरेउ महाबन परेउ भुलाई ॥

दोहा

खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत ॥१५७॥

चौपाला
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा । तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा ॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई । समर सेन तजि गयउ पराई ॥
समय प्रतापभानु कर जानी । आपन अति असमय अनुमानी ॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी । मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥
रिस उर मारि रंक जिमि राजा । बिपिन बसइ तापस कें साजा ॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा । यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा ॥
राउ तृषित नहि सो पहिचाना । देखि सुबेष महामुनि जाना ॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥
दोहा

भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ ॥१५८॥

चौपाला
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ । निज आश्रम तापस लै गयऊ ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी । पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी ॥
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुंदर जुबा जीव परहेलें ॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागि अति मोरें ॥
नाम प्रतापभानु अवनीसा । तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा ॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई । बडे भाग देखउँ पद आई ॥
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा । जानत हौं कछु भल होनिहारा ॥
कह मुनि तात भयउ अँधियारा । जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा ॥

दोहा

निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान ॥१५९ (क )॥
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ ॥१५९ (ख )॥

चौपाला
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा । बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा ॥
नृप बहु भाति प्रसंसेउ ताही । चरन बंदि निज भाग्य सराही ॥
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई । जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई ॥
मोहि मुनिस सुत सेवक जानी । नाथ नाम निज कहहु बखानी ॥
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना । भूप सुह्रद सो कपट सयाना ॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा ॥
समुझि राजसुख दुखित अराती । अवाँ अनल इव सुलगइ छाती ॥
सरल बचन नृप के सुनि काना । बयर सँभारि हृदयँ हरषाना ॥

दोहा

कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति ॥१६०॥

चौपाला
कह नृप जे बिग्यान निधाना । तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना ॥
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ । सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ ॥
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥
जोसि सोसि तव चरन नमामी । मो पर कृपा करिअ अब स्वामी ॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी । आपु बिषय बिस्वास बिसेषी ॥
सब प्रकार राजहि अपनाई । बोलेउ अधिक सनेह जनाई ॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला । इहाँ बसत बीते बहु काला ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०