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उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०

दोहा

बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान ।

मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान ॥१११ -क॥

क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ।

मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥१११ -ख॥

चौपाला

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें । तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥

परद्रोही की होहिं निसंका । कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ॥

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें । कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें ॥

काहू सुमति कि खल सँग जामी । सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी ॥

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक ॥

राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥

पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥

लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥

हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥

अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥

पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा । तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥

मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥

सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥

सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥

लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई ॥

दोहा

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ ।

सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥११२ -क॥

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥११२ -ख॥

चौपाला

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥

कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी । लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी ॥

मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥

रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥

मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥

बालकरूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥

सुंदर सुखद मिहि अति भावा । सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥

मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा । रामचरितमानस तब भाषा ॥

सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥

रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ॥

तोहि निज भगत राम कर जानी । ताते मैं सब कहेउँ बखानी ॥

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं ॥

मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा । मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा ॥

निज कर कमल परसि मम सीसा । हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा ॥

राम भगति अबिरल उर तोरें । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥

दोहा

सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान ।

कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान ॥११३ -क॥

जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत ।

ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत ॥११३ -ख॥

चौपाला

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥

राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ । नित नव नेह राम पद होऊ ॥

जो इच्छा करिहहु मन माहीं । हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं ॥

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा ॥

एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी । यह मम भगत कर्म मन बानी ॥

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ । प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥

करि बिनती मुनि आयसु पाई । पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥

हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥

इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कलप सात अरु बीसा ॥

करउँ सदा रघुपति गुन गाना । सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥

जब जब अवधपुरीं रघुबीरा । धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥

पुनि उर राखि राम सिसुरूपा । निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई । काग देह जेहिं कारन पाई ॥

कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी । राम भगति महिमा अति भारी ॥

दोहा

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह ।

निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह ॥११४ -क॥

मासपारायण , उन्तीसवाँ विश्राम

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप ।

मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥११४ -ख॥

चौपाला

जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥

सुनि भसुंडि के बचन भवानी । बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥

तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं । संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥

सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा । तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥

एक बात प्रभु पूँछउँ तोही । कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥

कहहिं संत मुनि बेद पुराना । नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥

सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं । नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥

सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥

नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥

ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥

पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥

दो० –पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥

न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥११५ -क॥

सोरठा

सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि ।

बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥११५ -ख॥

चौपाला

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ । बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥

मोह न नारि नारि कें रूपा । पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ । नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥

पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी । माया खलु नर्तकी बिचारी ॥

भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥

राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥

तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥

अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥

दोहा

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ ।

जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥११६ -क॥

औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन ।

जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥११६ -ख॥

चौपाला

सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥

ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ॥

सो मायाबस भयउ गोसाईं । बँध्यो कीर मरकट की नाई ॥

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥

तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥

जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी । ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥

अस संजोग ईस जब करई । तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥

जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥

तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥

परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बिहाई ॥

तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै ॥

मुदिताँ मथैं बिचार मथानी । दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥

तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥

दोहा

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ ।

बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥११७ -क॥

तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ ।

चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥११७ -ख॥

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि ।

तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥११७ग॥

सोरठा

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ॥

जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥११७घ॥

चौपाला

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥

प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई । तब यह जीव कृतारथ होई ॥

छोरत ग्रंथि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥

कल बल छल करि जाहिं समीपा । अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥

होइ बुद्धि जौं परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥

जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी । तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥

इंद्रीं द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥

आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देही कपाट उघारी ॥

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥

ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई । बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥

बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी । तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥

दोहा

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस ।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥११८ -क॥

कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक ।

होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥११८ -ख॥

चौपाला

ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद । संत पुरान निगम आगम बद ॥

राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ॥

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥

तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥

अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥

भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥

भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥

असि हरिभगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

दोहा

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥११९ -क॥

जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य ।

अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य ॥११९ -ख॥

चौपाला

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥

राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥

परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती ॥

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥

खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥

गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥

ब्यापहिं मानस रोग न भारी । जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥

राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ॥

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं । जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई । राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई ॥

सुगम उपाय पाइबे केरे । नर हतभाग्य देहिं भटमेरे ॥

पावन पर्बत बेद पुराना । राम कथा रुचिराकर नाना ॥

मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥

भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥

राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥

सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा । राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥

दोहा

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।

कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥१२० -क॥

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ।

जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि ॥१२० -ख॥

चौपाला

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥

नाथ मोहि निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न कहहु बखानी ॥

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥

बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥

संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥

कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥

मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ॥

तात सुनहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥

नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥

नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥

काँच किरिच बदलें ते लेही । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥

पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

संत सहहिं दुख परहित लागी । परदुख हेतु असंत अभागी ॥

भूर्ज तरू सम संत कृपाला । परहित निति सह बिपति बिसाला ॥

सन इव खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ॥

खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूषक इव सुनु उरगारी ॥

पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥

दुष्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ॥

संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

हर गुर निंदक दादुर होई । जन्म सहस्त्र पाव तन सोई ॥

द्विज निंदक बहु नरक भोग करि । जग जनमइ बायस सरीर धरि ॥

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी । रौरव नरक परहिं ते प्रानी ॥

होहिं उलूक संत निंदा रत । मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत ॥

सब के निंदा जे जड़ करहीं । ते चमगादुर होइ अवतरहीं ॥

सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ॥

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥

काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥

बिषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥

ममता दादु कंडु इरषाई । हरष बिषाद गरह बहुताई ॥

पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥

अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी ॥

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका । कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०