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बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०

दोहा

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।

तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥३१॥

चौपाला

राम चरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ॥

जग मंगल गुन ग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥

सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥

जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥

समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥

सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥

काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥

अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥

सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥

सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥

सेवक मन मानस मराल से । पावक गंग तंरग माल से ॥

दोहा

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।

दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड ॥३२ (क )॥

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।

सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥३२ (ख )॥

चौपाला

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥

सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथाप्रबंध बिचित्र बनाई ॥

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करैं सुनि सोई ॥

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥

नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥

कलपभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए ॥

करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सारद रति मानी ॥

दोहा

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार ।

सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार ॥३३॥

चौपाला

एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥

पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥

सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥

संबत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥

नौमी भौम बार मधु मासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥

असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥

जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥

दोहा

मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर ।

जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर ॥३४॥

चौपाला

दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥

नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारद बिमलमति ॥

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥

चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजे तनु नहि संसारा ॥

सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥

बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥

रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥

मन करि विषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौ एहिं सर परई ॥

रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥

त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥

रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥

तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनहु सुजन मन लाई ॥

दोहा

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु ।

अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु ॥३५॥

चौपाला

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कबि तुलसी ॥

करइ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू ॥

बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥

लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥

सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥

मेधा महि गत सो जल पावन । सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥

भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥

दोहा

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ।

तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ॥३६॥

चौपाला

सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥

रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥

राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥

पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥

छंद सोरठा सुंदर दोहा । सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥

अरथ अनूप सुमाव सुभासा । सोइ पराग मकरंद सुबासा ॥

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥

धुनि अवरेब कबित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥

अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥

नव रस जप तप जोग बिरागा । ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥

सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जल बिहग समाना ॥

संतसभा चहुँ दिसि अवँराई । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥

भगति निरुपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पत रति रस बेद बखाना ॥

औरउ कथा अनेक प्रसंगा । तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा ॥

दोहा

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु ।

माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु ॥३७॥

चौपाला

जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥

सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरबर मानस अधिकारी ॥

अति खल जे बिषई बग कागा । एहिं सर निकट न जाहिं अभागा ॥

संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥

तेहि कारन आवत हियँ हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥

आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु आइ न जाई ॥

कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥

गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥

बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥

दोहा

जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ ।

तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥३८॥

चौपाला

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई । जातहिं नींद जुड़ाई होई ॥

जड़ता जाड़ बिषम उर लागा । गएहुँ न मज्जन पाव अभागा ॥

करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥

जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥

सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही । राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही ॥

सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥

ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह के राम चरन भल भाऊ ॥

जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥

अस मानस मानस चख चाही । भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥

भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू ॥

चली सुभग कबिता सरिता सो । राम बिमल जस जल भरिता सो ॥

सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ॥

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि । कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि ॥

दोहा

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल ।

संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल ॥३९॥

चौपाला

रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ॥

सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥

जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥

त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरुप सिंधु समुहानी ॥

मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥

बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥

उमा महेस बिबाह बराती । ते जलचर अगनित बहुभाँती ॥

रघुबर जनम अनंद बधाई । भवँर तरंग मनोहरताई ॥

दोहा

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग ।

नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग ॥४०॥

चौपाला

सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥

नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उतर सबिबेका ॥

सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥

घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥

सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥

कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥

राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥

काई कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥

रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास
Chapters
बालकाण्ड श्लोक
बालकाण्ड दोहा १ से १०
बालकाण्ड दोहा ११ से २०
बालकाण्ड दोहा २१ से ३०
बालकाण्ड दोहा ३१ से ४०
बालकाण्ड दोहा ४१ से ५०
बालकाण्ड दोहा ५१ से ६०
बालकाण्ड दोहा ६१ से ७०
बालकाण्ड दोहा ७१ से ८०
बालकाण्ड दोहा ८१ से ९०
बालकाण्ड दोहा ९१ से १००
बालकाण्ड दोहा १०१ से ११०
बालकाण्ड दोहा १११ से १२०
बालकाण्ड दोहा १२१ से १३०
बालकाण्ड दोहा १३१ से १४०
बालकाण्ड दोहा १४१ से १५०
बालकाण्ड दोहा १५१ से १६०
बालकाण्ड दोहा १६१ से १७०
बालकाण्ड दोहा १७१ से १८०
बालकाण्ड दोहा १८१ से १९०
बालकाण्ड दोहा १९१ से २००
बालकाण्ड दोहा २०१ से २१०
बालकाण्ड दोहा २११ से २२०
बालकाण्ड दोहा २२१ से २३०
बालकाण्ड दोहा २३१ से २४०
बालकाण्ड दोहा २४१ से २५०
बालकाण्ड दोहा २५१ से २६०
बालकाण्ड दोहा २६१ से २७०
बालकाण्ड दोहा २७१ से २८०
बालकाण्ड दोहा २८१ से २९०
बालकाण्ड दोहा २९१ से ३००
बालकाण्ड दोहा ३०१ से ३१०
बालकाण्ड दोहा ३११ से ३२०
बालकाण्ड दोहा ३२१ से ३३०
बालकाण्ड दोहा ३३१ से ३४०
बालकाण्ड दोहा ३४१ से ३५०
बालकाण्ड दोहा ३५१ से ३६०
अयोध्या काण्ड श्लोक
अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०
अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०
अयोध्या काण्ड दोहा २१ से ३०
अयोध्या काण्ड दोहा ३१ से ४०
अयोध्या काण्ड दोहा ४१ से ५०
अयोध्या काण्ड दोहा ५१ से ६०
अयोध्या काण्ड दोहा ६१ से ७०
अयोध्या काण्ड दोहा ७१ से ८०
अयोध्या काण्ड दोहा ८१ से ९०
अयोध्या काण्ड दोहा ९१ से १००
अयोध्या काण्ड दोहा १०१ से ११०
अयोध्या काण्ड दोहा १११ से १२०
अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०
अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०
अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०
अयोध्या काण्ड दोहा १५१ से १६०
अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०
अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०
अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०
अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००
अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०
अयोध्या काण्ड दोहा २११ से २२०
अयोध्या काण्ड दोहा २२१ से २३०
अयोध्या काण्ड दोहा २३१ से २४०
अयोध्या काण्ड दोहा २४१ से २५०
अयोध्या काण्ड दोहा २५१ से २६०
अयोध्या काण्ड दोहा २६१ से २७०
अयोध्या काण्ड दोहा २७१ से २८०
अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०
अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००
अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०
अयोध्या काण्ड दोहा ३११ से ३२६
अरण्यकाण्ड श्लोक
अरण्यकाण्ड दोहा १ से १०
अरण्यकाण्ड दोहा ११ से २०
अरण्यकाण्ड दोहा २१ से ३०
अरण्यकाण्ड दोहा ३१ से ४०
अरण्यकाण्ड दोहा ४१ से ४६
किष्किन्धाकाण्ड श्लोक
किष्किन्धाकाण्ड दोहा १ से १०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा ११ से २०
किष्किन्धाकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड श्लोक
सुन्दरकाण्ड दोहा १ से १०
सुन्दरकाण्ड दोहा ११ से २०
सुन्दरकाण्ड दोहा २१ से ३०
सुन्दरकाण्ड दोहा ३१ से ४०
सुन्दरकाण्ड दोहा ४१ से ५०
सुन्दरकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड श्लोक
लंकाकाण्ड दोहा १ से १०
लंकाकाण्ड दोहा ११ से २०
लंकाकाण्ड दोहा २१ से ३०
लंकाकाण्ड दोहा ३१ से ४०
लंकाकाण्ड दोहा ४१ से ५०
लंकाकाण्ड दोहा ५१ से ६०
लंकाकाण्ड दोहा ६१ से ७०
लंकाकाण्ड दोहा ७१ से ८०
लंकाकाण्ड दोहा ८१ से ९०
लंकाकाण्ड दोहा ९१ से १००
लंकाकाण्ड दोहा १०१ से ११०
लंकाकाण्ड दोहा १११ से १२१
उत्तरकाण्ड - श्लोक
उत्तरकाण्ड - दोहा १ से १०
उत्तरकाण्ड - दोहा ११ से २०
उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०
उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०
उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०
उत्तरकाण्ड - दोहा ५१ से ६०
उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०
उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०
उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०
उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००
उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०
उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०
उत्तरकाण्ड - दोहा १२१ से १३०