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सप्तम सर्ग : भाग 5

 

राजन बोले ‘शकुन्तले! तुम बनो पुत्र का अवलम्बन
तुमको आगे कर भगवन का करना चाहूँगा दर्शन’
वह बोली ‘अह! आर्यपुत्र सॅंग जाना मुझे नहीं संभव
यों गुरु के समीप जाने में करती हूँ लज्जा अनुभव’
नृप बोले ‘अभ्युदय काल में है ऐसा आचरण उचित,
आओ, आओ’ ऐसा कहकर हुए सभी तत्क्षण प्रस्थित
तदनन्तर ये सब जा पहुँचे उस आश्रम प्रागंण के बीच
देवि अदिति के साथ जहॉं थे आसनस्थ भगवन मारीच
कर पायें ये सब अभिवादन इसके पहले ही ऋषिमणि
राजन का अवलोकन करके कहा अदिति से ‘दाक्षायणि!
यह, दुष्यन्त नाम से अभिहित इस भूमण्डल का पालक,
तेरे पुत्र इन्द्र के रण में रहता है सेनानायक,
इसके धनुषबाण से सारा कार्य हुआ पूरा जिसका
वही इन्द्र का व्रजायुध है बना मात्र भूषण उसका’
भगवन से महिमा स्वर सुनकर उनसे बोलीं देवित अदिति
‘समझ गयी इसके प्रभाव को अवलोकन करके आकृति’
तत्पश्चात कहा राजन से मातलि ने समीप जाकर
देवि अदिति मारीच ऋषी का एक साथ परिचय देकर
‘आयुष्मन्! ये देवगणों के माता और पिता, तुमको
पुत्र प्रीति से देख रहे हैं बढ़कर करें नमन इनको’
इस प्रकार सुनने पर ज्ञानी नृप बोले ‘मातलि! मुनिगण
कहें जिसे द्वादश रूपों में स्थित तेजस का कारण
जिसने तीन लोक के स्वामी इन्द्रदेव को जन्म दिया
जन्म ग्रहण करने हरि ने भी जिनका आश्रय ग्रहण किया

दक्ष एवं मरीचि से उत्पन्न ब्रह्मा की पीढ़ी के बाद
यह उत्पन्न हुआ जोड़ा है’ मातलि सुकृत किए संवाद,
यह कहकर समीप जाकर तब नृप ने उनको किया प्रणाम
‘यह दुष्यन्त, इन्द्र का सेवक, दोनों को कर रहा प्रणाम’
शुभ बोले गुरु ‘चिरजीवी हो, करो धरा की रक्षा वत्स!’
देवि अदिति की मंगलवाणी ‘अप्रतिम महारथी हो वत्स!’
पुत्र सहित अब शकुन्तला यों किया मिथुन का अभिवादन
‘दारक सहित कर रही हूँ मैं पूज्यजनों का पद-वन्दन’
भगवन बोले ‘पुत्री! तेरा स्वामी है देवेन्द्र समान
पुत्र तुम्हारा है जयन्त सम, हो जाओ तुम शची समान,
और नहीं है योग्य तुम्हारे कोई भी आशीर्वचन’
कहा अदिति ने भी तब उनसे निज मंगल परिपूर्ण कथन
‘पुत्री! तुम अपने स्वामी की बनी रहो प्रिय आजीवन
चिरंजीव बालक यह निश्चय हो दोनों कुल का नन्दन,
बैठो’ निकट प्रजापति के सब सविनय ग्रहण किए आसन
एक एक को निर्देशित कर इस प्रकार बोले भगवन
‘गुणी पुत्र, साध्वी शकुन्तला और आप भी हैं यह, अस्तु
दैवयोग से धन, श्रद्धा, विधि यहॉं प्राप्त है तीनों वस्तु’
ऐसे सुखद वचन को सुनकर राजन भी बोले ‘भगवन्!
प्रथम सिद्धि अभिप्रेत वस्तु की, तत्पश्चात हुआ दर्शन
अतः आपका किया अनुग्रह है अपूर्व, क्योंकि हे तात!
प्रथम पुष्प आता है तब फल, वर्षा बादल के पश्चात
कारण और कार्य का क्रम है, निष्फल है इस पर आपत्ति
किन्तु आपकी कृपादृष्टि से पहले मिलती है सम्पत्ति’

फिर मातलि बोले ‘करते हैं कृपा विधाता इसी प्रकार’
अब नृप व्यक्त किए भगवन से पूर्व कथा का सुखद विचार
‘देव! आपकी आज्ञाकारिणि शकुन्तला के सॅंग सुखकर
गान्धर्व परिणय करने के ही थोड़ा समय बीतने पर
मेरे पास बन्धुओं द्वारा इसको लाये जाने पर
शिथिल हुई स्मृति के कारण ज्ञान नहीं हो पाने पर
उस क्षण प्रबल अमंगलवश ही करके परित्याग इसका
मैं अपराधी हुआ आपके वंशज, पूज्य कण्व ऋषि का,
कालान्तर मुद्रिका देखकर हो आया फिर मुझको ज्ञात
पूर्व हुए उनकी पुत्री से मेरे परिणय का वृत्तान्त
मेरी स्मृति में अंकित इस पूर्व कथा का भ्रमित चरित्र
मुझको तो प्रतीत होता है निश्चय ही अत्यन्त विचित्र,
मेरे मन का यह विचार तो उस प्रकार ही था जैसे
यद्यपि हो समक्ष, पर, समझे ‘‘नहीं है यह गज’’ दृढ़ता से
उसके जाने पर मन में कुछ शंसय हो कि ‘‘वह गज था’’
पदचिह्नों के अवलोकन पर हो प्रतीत ‘‘वह गज ही था’
‘वत्स! आत्म अपराधबोध की शंका नहीं करो उत्पन्न
कोई चित्त विकार कभी भी तुमसे हुई नहीं उत्पन्न,
सुनो’ इन्हीं वचनों से नृप को समझाकर बोले भगवन
नृप से ‘सावधान हूँ’ सुनकर ऋषि ने आगे किया कथन
‘जैसे ही अप्सरातीर्थ के तट से, अतिशय घबराई-
शकुन्तला को लिए मेनका दाक्षायणी निकट आई
तभी ध्यान के द्वारा यह सब ज्ञात कर लिया था मैंने
कि तपस्विनी औ’ सहधर्मिणि इस शकुन्तला का तुमने

दुर्वासा के एक शापवश परित्याग कर डाला है
और मुद्रिका दर्शन से वह श्राप छूटने वाला है’
सुनकर ऋषि मारीच कथन नृप इन शब्दों को किए प्रयुक्त
सोच्छ्वास बोले ‘अब जाकर मैं हूँ इस निन्दा से मुक्त’
शकुन्तला ने भाग्य सराहा यह सुनकर यों मन में ही
‘किया अकारण आर्यपुत्र ने मेरा प्रत्यादेश नहीं
दिया गया था शाप मुझे, यह नहीं हो रहा है स्मृत
या इस विरहशून्य हृदया को प्राप्त श्राप था नहीं विदित
इसीलिए सखियों का मुझसे आग्रहपूर्वक था कहना
कि निश्चय अपने स्वामी को अंगुलीयक दिखला देना’
ऋषि मारीच सुझाये ‘पुत्री! तेरा हुआ मनोरथ सिद्ध,
पति के प्रति मत करना अब तुम क्रोधपूर्वक कार्य निषिद्ध,
देख, शाप से तेरे पति की स्मृति बाधित होने से
उनकी निर्दयता से तुमने पाया तिरस्कार उनसे,
अब अज्ञानदशा उनकी जब प्राप्त कर लिया विनष्टता
अपने पति के ऊपर निश्चय होगी तेरी ही प्रभुता,
मल के कारण जिस दर्पण की होती है निर्मलता नष्ट
ऐसे दर्पण तल की छाया कभी नहीं होती स्पष्ट,
पर, दर्पण निर्मल होने पर स्वच्छ बनेगी छाया भी’
‘देव! आपका कथन सत्य है’ बोल यह सुनकर नृप भी
बोले ऋषि मारीच अधिप से ‘वत्स! धर्म विधि के अनुसार
हमने इस शकुन्तला सुत का किया जातकर्म संस्कार
क्या तेरे द्वारा भी इसका किया गया है अभिनन्दन?’
नृप ने कहा ‘इसी में मेरी वंशप्रतिष्ठा है भगवन’

इस प्रकार कहकर राजन ने पकड़ लिया बालक का हाथ
निकट बुलाते हुए स्नेहवश उसे ले लिया अपने साथ
अब त्रिकालदर्शी ऋषि नृप से प्रकट किए निज ज्ञान विराट
‘आप इसे वैसा ही भावी ताने चक्रवर्ती सम्राट,
देखो, यह अप्रतिम महारथी अस्खलित और शान्ति गतियुक्त-
रथ से जलधि पार जीतेगा पृथ्वी सप्तद्वीप से युक्त,
जीवों को पीड़ित करने से सर्वदमन था इसका नाम
पुनः विश्व पालन करने से भरत पड़ेगा इसका नाम’
नृप बोले ‘भगवन के द्वारा जो भी संस्कार है पूर्ण
हम सब यह आशा करते हैं बालक में हैं वे सम्पूर्ण’
बोली अदिति ‘देव! पुत्री के पूर्ण मनोरथ का होना
कण्व को भी संदेश भेजकर है अब विदित करा देना,
यहीं दुहितृवत्सला मेनका सेवा करती है स्थित’
इस पर मन में लगी सोचने शकुन्तला होकर प्रमुदित
‘कहा गया भगवति के द्वारा निश्चय मेरे मन की बात’
ऋषिवर बोले ‘तप प्रभाव से माननीय को है सब ज्ञात’
तभी सहज अनुमान ज्ञान से बोल उठे दुष्यन्त प्रबृद्ध
‘मुझ पर निश्चय इसीलिए मुनि नहीं हुए थे अतिशय क्रुद्ध’
करके उचित विचार देव ने व्यक्त किया मर्यादा को
‘तो भी यह प्रिय समाचार है हमें सुनाना ही उनको,
यहॉं कौन है?’ सुनकर तत्क्षण करने आज्ञा का पालन
एक शिष्य आकर समक्ष तब बोला ‘यह मैं हूँ भगवन!
उसको ऋषि मारीच देखकर बोले ‘गालव! इसी समय
तुम आकाश मार्ग से जाकर मेरे वचनों को सविनय

आदरणीय कण्व से कहना इस प्रकार उनसे मिलकर
कि पुत्रवती शकुन्तला अपने श्राप मुक्त हो जाने पर
स्मृतियुक्त दुष्यन्त के द्वारा कर ली गई यहॉं स्वीकार’
चला गया वह शिष्य उसी क्षण ऋषि की आज्ञा के अनुसार
ऋषि पूर्णत्व देखकर नृप से बोले परसुखाय परहित
‘अहो वत्स! अब तुम भी अपने पुत्र और भार्या सहित
सखा इन्द्र के रथ पर चढ़कर करो राजधानी प्रस्थान’
अभिवादन कर राजन बोले ‘जैसी आज्ञा है भगवान’
बोले ऋषि कृतज्ञ नृप से अब अपना स्वस्ति क्षेम आचार
‘इससे अधिक, वत्स!, अब क्या मैं करूँ तुम्हारा प्रिय उपकार?’
नृप ने किया निवेदन ‘भगवन्! है इससे भी बढ़कर प्रिय
दें आशीर्वाद ऐसा अब करना चाह रहे यदि प्रिय
‘‘प्रजा हिताय प्रवृत हों प्रतिक्षण प्रजाजनों के पालनहार,
शास्त्र श्रवण से विद्वानों की वाणी प्राप्त करे सत्कार,
सर्वशक्तिसम्पन्न महाप्रभु महादेव जी- स्वयं प्रकाश
एक हमारे भी जीवन के पुनर्जन्म का कर दें नाश’
प्रवृत रहा निज निज कर्मों में जड़ चेतन भौतिक अध्यात्म
प्रकृति नियम के दो स्वरूप में जैसा योग रचा परमात्म

 

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5