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स्वस्थिति

नाहीं देह शुद्ध याति अमंगळ । अवघे वोंगळ गुण दोष ॥१॥

करुं जातां विचार अवघा अनाचार । आणिक प्रकार काय बोलूं ॥२॥

वाणी नाहीं शुद्ध धड न ये वचन । धिःकारिती जन सर्व मज ॥३॥

अंगसंग कोणी जवळ न बैसे । चोखा म्हणे ऐसें जीवित माझें ॥४॥

संत चोखामेळा - अभंग संग्रह २

संत चोखामेळा
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लावणीक ११६ वी फुढिल भाग