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अद्वैत

काळाचा विटाळ जीवशिवा अंगी । बांधलासे जगी दृढ गांठी ॥१॥

विटाळीं विटाळ चवदाही भुवनें । स्थावर जंगम व्यापुनी विटाळची ॥२॥

सुखासी विटाळ दुःखासी विटाळ । विटाळीं विटाळ वाढलासे ॥३॥

विटाळाचें अंगी विटाळाचे फळ । चोखा तो निर्मळ नाम गाय ॥४॥

संत चोखामेळा - अभंग संग्रह २

संत चोखामेळा
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लावणीक ११६ वी फुढिल भाग