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स्वस्थिति

श्वान अथवा शूकर हो का मार्जार । परि वैष्णवाचें घर देईं देवा ॥१॥

तेणे समाधान होय माझ्या जीवा । न भाकीं कींव आणिकासी ॥२॥

उच्छिष्‍ट प्रसाद सेवीन धणिवरी । लोळेन परवरी कवतुकें ॥३॥

चोखा म्हणे कोणी जातां पंढरीसी । दंडवत त्यासी घालीन सुखे ॥४॥

संत चोखामेळा - अभंग संग्रह २

संत चोखामेळा
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लावणीक ११६ वी फुढिल भाग