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गर्भावस्था में भोजन

परिचय-

          गर्भावस्था में स्त्री का भोजन सामान्यतः दो प्राणियों का हो जाता है। लेकिन गर्भवती स्त्री के लिए या फिर किसी के लिए भी दो प्राणियों के बराबर भोजन करना सम्भव नहीं होता है परन्तु स्त्रियों को दिया जाने वाला सन्तुलित भोजन तथा विटामिन और खनिज पदार्थों से भरपूर होना चाहिए। गर्भावस्था में केवल पेट भरने के लिए कुछ भी खाना मां और बच्चे दोनों के लिए हानिकारक होता है। भोजन वही करना चाहिए जो संतुलित हो और जिसे गर्भवती स्त्री अच्छी तरह से पचा सके।

          गर्भावस्था में पलने वाले बच्चे के शरीर का विकास पूरी तरह से मां के भोजन पर निर्भर करता है। बच्चे में रक्त और हड्डियों का बनना भी मां पर ही निर्भर करता है। गर्भावस्था में प्रथम तीन महीनों में मां को लौह वस्तुओं की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। इससे बच्चे के शरीर में रक्त की कमी नहीं होती है। कैल्शियम बच्चे के शरीर में हडि्डयों आदि को स्वस्थ बनाता है। गर्भावस्था के दौरान यदि स्त्रियों को कैल्शियम और लौह युक्त खाद्य-पदार्थ नहीं मिलता है तो गर्भ में पल रहे बच्चे के शरीर में रक्त की कमी तथा उनकी हडि्डयां कमजोर होती हैं।

          इसी कारण गर्भावस्था के दौरान स्त्री के भोजन में कैल्शियम, प्रोटीन तथा विटामिन का अधिक मात्रा में होना बहुत ही जरूरी होता है।

लौह पदार्थ-

          हरी तथा पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक, बन्दगोभी, गांठगोभी और अन्य पत्तेदार सब्जियों में लौह तत्व अधिक मात्रा में पाया जाता है। लौह तत्व का अच्छी प्रकार से पाचन करने के लिए विटामिन ’सी’ जैसे नींबू और आंवला की भी अच्छी मात्रा का होना अनिवार्य होता है।

          पोदीना और धनिया में भी लौह तत्व अधिक मात्रा में पाया जाता है। पुराने समय में लोग पुदीने और धनिये की चटनी का सेवन ज्यादा करते थे। इस चटनी में गुड़ और नींबू का प्रयोग भी अधिक मात्रा में होता था। इस तरह की चटनी की आधा-आधा चम्मच मात्रा दोनों समय खाने से शरीर की दिन भर की लौह तत्व की आवश्यकता पूरी हो जाती है। इस चटनी का सेवन रोटी या डबलरोटी के साथ किया जाता है। भुनी मछली में भी कैल्शियम और लौह तत्व अधिक मात्रा में पाया जाता है जिसका गर्भावस्था में अधिक उपयोग किया जाता है। दालों में हरे मूंग की दाल, काबुली चना, काला चना, लाल लोबिया, राजमा, सफेद लोबिया और सोयाबीन में लौह तत्व अधिक मात्रा में पाया जाता है।

          किशमिश में भी लौह तत्व पाया जाता है। नियमित रूप से पांच किशमिश खाने से शरीर में लौह तत्व की आवश्यकता पूरी होती रहती है।

          यदि दूध को लोहे की कड़ाही में उबाला जाए तो उसमें लौह तत्व स्वयं ही आ जाते हैं। ऐसा दूध स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक होता है। लोहे के बर्तन में पका हुआ भोजन कसैला और हानिकारक भी हो सकता है। वर्तमान समय में पुराने विचार रखने वाले लोग आटे को लोहे के बर्तन में रखते थे।

          गर्भावस्था में शरीर में लौह तत्व की कमी से रक्त की कमी हो जाती है। ऐसी स्त्रियों में कमजोरी, सांस का फूलना, दिल का अधिक धड़कना आदि विभिन्न प्रकार की शिकायतें हो जाती हैं। स्त्री को प्रतिदिन 40 से 60 मिलीग्राम लौह तत्व की जरूरत होती है।

कैल्शियम-

          दूध तथा दूध से बने सभी खाद्य-पदार्थों में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। 200 से 250 ग्राम दूध दिन में तीन बार पीना चाहिए। जैसे-जैसे गर्भावस्था के दिन पूरे होते जाएं तो दूध की मात्रा को बढ़ा देना चाहिए तथा दिन में 1 किलोग्राम दूध का सेवन करना चाहिए।

          दूध से बनी सभी वस्तुएं जैसे- पनीर, दही, मक्खन, लस्सी आदि में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। अण्डे में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है जो प्रतिदिन प्रयोग किया जा सकता है। हरी पत्तेदार सब्जियों में भी कैल्शियम काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है। गर्भावस्था के समय महिलाओं के शरीर में कैल्शियम की कमी होने से मांसपेशियों में ऐंठन, नसों में दर्द, हडि्डयों की कमजोरी, कमर में दर्द, घबराहट और स्त्री कुछ चिड़चिड़ी स्वभाव की हो जाती है। शरीर के लिए प्रतिदिन 200 मिलीग्राम कैल्शियम की आवश्यकता होती है जो मां को दूध के सेवन से प्राप्त हो सकता है।

प्रोटीन-

          गर्भावस्था में बच्चे के शरीर की रचना के लिए प्रोटीन बहुत ही आवश्यक होता है। दालें, अण्डे आदि में प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है। मूंग की खड़ी दाल, मसूर, काले मसूर, बेसन, चना, सोयाबीन, गेहूं, दूध, दूध से बनी वस्तुएं जैसे दही और पनीर आदि मूंगफली, बादाम, काजू आदि में प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है।

          मांसाहारी व्यक्तियों को प्रोटीन मांस और मछली से अधिक मात्रा में प्राप्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति सप्ताह में तीन बार मांस का प्रयोग कर सकते हैं। शरीर को प्रतिदिन 60 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है जो कि तीन गिलास दूध और एक कटोरी दाल में होता है। अधिक मात्रा में प्रोटीन आदि का प्रयोग करने के लिए भोजन बनाने की विधि को बदला जा सकता है। गेहूं में बेसन मिलाकर खाने से या दोनों की मिश्रित रोटी बनाकर खाने से शरीर को अधिक मात्रा में प्रोटीन प्राप्त होता है। यह रोटी सुबह नाश्ते के समय दूध या दही के साथ खाई जा सकती है। यदि किसी को डोसा और इडली खाना प्रिय है तो इसमें भी प्रोटीन की मात्रा अधिक करने के लिए दाल, सोयाबीन आदि डाली जा सकती हैं।

          मूंग की दाल को अंकुरित करके खाने से शरीर को अधिक मात्रा में प्रोटीन प्राप्त होता है। मूंग को अंकुरित करने के बाद इसे सलाद, भोजन या अन्य सब्जियों के साथ खाया जा सकता है। इसमें नींबू डालकर कालीमिर्च, नमक तथा हरीमिर्च के साथ प्रयोग किया जा सकता है।  

          भुने हुए या उबले हुए आलू का भी सेवन करना चाहिए। आलू में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। यदि आलू को तलकर खाएं तो इसमें वसा की मात्रा अधिक हो जाती है। भुना या उबले आलू में प्याज, धनिया, नींबू आदि डालकर खाने से अधिक लाभ होता है।

          अमरूद, सन्तरा, केला, तरबूज और गाजर का सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। इन फलों में विटामिन अधिक मात्रा में पाया जाता है। .

          सोयाबीन को खाने में विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है। सोयाबीन की सब्जी या पीसकर आटा बनाकर भोजन के समय गेहूं के आटे में मिलाकर खाया जा सकता है। कुछ महिलाएं सोयाबीन के आटे को बेसन के साथ मिलाकर विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाकर सेवन करती हैं।

          गेहूं, चना और ज्वार का आटा मिलाकर भी पराठें बनाऐ जाते हैं जिन्हे नाश्ते में दही के साथ सेवन किया जाता है। यह स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभकारी होते हैं।

फोलिक एसिड-

          बच्चे के पैदा होने और शारीरिक विकास में यह फोलिक एसिड बहुत ही आवश्यक होता है। महिलाओं के शरीर में फोलिक एसिड की कमी के कारण मस्तिष्क और रीढ़ की हडि्डयों में तथा नसों आदि में कमजोरी आ जाती है। इस कारण गर्भावस्था में गर्भवती स्त्री को यह विटामिन पूर्ण रूप में मिलना आवश्यक होता है। फोलिक एसिड गहरे रंग वाली हरी सब्जियों, मक्का, मक्के का आटा, चावल तथा सन्तरे के आदि में पूर्ण रूप में पाया जाता है।

विटामिन डी-

          शरीर में कैल्शियम की मात्रा को पचाने के लिए विटामिन डी की जरूरत होती है। विटामिन डी के बिना कैल्शियम शरीर से बाहर निकल जाता है। वैसे तो विटामिन डी भोजन से प्राप्त होता है लेकिन प्राकृतिक रूप से विटामिन डी सुबह की धूप द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए आपको सुबह की पहली धूप में लगभग 15 से 20 मिनट तक बैठना चाहिए।

अन्य लवण-

          गर्भवती स्त्री के भोजन में फास्फोरस, कापर, आयोडीन, मैगनीज, कोबाल्ट तथा जिंक जैसे अन्य लवण भी जरूरी होते हैं जिनसे शरीर में रक्त बनता है तथा शरीर की मांसपेशियां भी मजबूत होती हैं।

फास्फोरस समुद्री भोजन, अण्डे, दूध, मीट, प्याज और रोटी में भी पाया जाता है।

          आयोडीन मछली तथा आयोडीन युक्त नमक में पाया जाता है। आयोडीन, मीट, चीज तथा बीज वाली दालों में पाया जाता है। भोजन में नमक ऊपर से डालना चाहिए क्योंकि भोजन पकाते समय नमक डालने से नमक का आयोडीन नष्ट हो जाता है।  

          मैंगनीज हरी सब्जियों, फलियों वाली सब्जियों तथा गेहूं आदि खाद्य-पदार्थों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

          शरीर को पानी और द्रव की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। पानी जीवन ही नहीं बल्कि त्वचा को भी ठीक रखता है। अधिक मात्रा में द्रव का सेवन करने से व्यक्ति कब्ज आदि रोगों से दूर रहता है तथा उसे बवासीर की शिकायत भी नहीं होती हैं।

          अधिक मात्रा में चाय, कॉफी या फिर कोला का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है क्योंकि इसमें कैफीन होती है। चाय और काफी में टेनिक एसिड भी अधिक मात्रा में होता है। यह दोनों ही पदार्थ शरीर की पाचन शक्ति के लिए हानिकारक होते हैं। इनसे शरीर के प्रयोग में आने वाले लाभदायक पदार्थ ऐसे ही मल के साथ निकल जाते हैं। इन पदार्थों के प्रयोग से पेशाब भी अधिक मात्रा में होता है। पेशाब के अधिक होने से शरीर में कमजोरी आती है। लोहे और कैल्शियम की कमी शरीर को कमजोर बना देती है। इसलिए चाय, कॉफी और बोतलों के पदार्थों का कम से कम मात्रा में उपयोग करना चाहिए।

          हमारे शरीर के लिए अधिक मात्रा में मीठे पदार्थों का सेवन भी हानिकारक होता है। इसी तरह अधिक नमकीन पदार्थ भी शरीर के हानिकारक होते हैं। इसलिए मीठे और नमकीन पदार्थों का सेवन कम से कम मात्रा में करना चाहिए। अधिक मात्रा में मीठे फल, खजूर या सिंथेटिक फलों का रस, जिनमें सिर्फ फलों की खुशबू होती है, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। इस कारण इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। मौसमी फल स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी होते हैं। आम, चीकू, मौसमी, अंगूर आदि थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाए जा सकते हैं परन्तु इसके साथ कोको चाकलेट तथा विभिन्न प्रकार की सिन्थेटिक खुशबू वाली आइसक्रीम, कोक, पेस्ट्री का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गर्भवती स्त्री के लिए हरा सलाद जैसे- गाजर, मूली, टमाटर, चुकन्दर, बन्दगोभी, शिमलामिर्च और अंकुरित मूंग का सेवन करना अच्छा रहता है। इससे शरीर में सभी प्रकार के विटामिन, कैल्शियम तथा अन्य खनिज पदार्थों आदि की कमी पूरी हो जाती है।

          गर्भावस्था में कच्चे नारियल का सेवन करने से होने वाला बच्चे का रंग गोरा होता है। कच्चे नारियल और खीरे का सेवन गर्भावस्था में अधिक लाभकारी होता है। स्त्रियों को गर्भावस्था में इनका सेवन अवश्य ही करना चाहिए। कुछ स्त्रियां गर्भावस्था में अपने वजन को कम करने के लिए भोजन कम कर देती हैं जो कि गर्भावस्था के लिए हानिकारक संकेत होता है।

          गर्भावस्था के समय में समोसे, कचौड़ी, पकौडे़ आदि का प्रयोग हानिकारक होता है। इस कारण इन वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। घी, क्रीम आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। हल्का सूप का सेवन गर्भावस्था में लाभकारी होता है। अधिक गाढ़े और चिकनाईयुक्त सूप का सेवन करना भी गर्भावस्था में हानिकारक होता है।

          रसेदार सब्जियां, जो बहुत घी और मसाले में बनाई गई हो, गर्भवती स्त्री को उनका भी सेवन नहीं करना चाहिए। गर्भावस्था में अधिक मसालों का सेवन भी हानिकारक होता है। भोजन में खोए, काजू और बादाम की रसेदार सब्जी, खसखस के दाने, पनीर तथा खरबूजे के बीजों को पीसकर बनाया गया मसाला गर्भावस्था में हानिकारक होता है। जिस भोजन में पुराना मीट, मछली, अण्डे, ठण्डा मीट आदि हो, उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके सेवन से गर्भधारित महिला को कम हानि होती है लेकिन उसके होने वाले बच्चे को अधिक हानि होती है।

          फल और सब्जियां, जिस पर मिट्टी लगी हो या कीटाणु को मारने की दवाइयों का प्रयोग किया गया है, उन्हें खूब अच्छी तरह से धोकर प्रयोग करना चाहिए।

          महिलाएं कितना भी सन्तुलित और पौष्टिक भोजन करे यदि पारिवारिक माहौल में अशान्ति है तो अच्छा भोजन भी बेकार है। चिन्ता या पारिवारिक कलह गर्भावस्था में महिला और उसके बच्चे के लिए हानिकारक होता है। इस कारण स्त्रियों को अपना ध्यान पूजा-पाठ में लगाना चाहिए तथा अच्छी किताबों को पढ़ना चाहिए ताकि आने वाले बच्चे के शरीर पर बुरा असर न पडे़।  

गर्भाशय में मुख्य विटामिन और भोजन-

विटामिन `ए`-

          विटामिन `ए` मछली के तेल, दूध मक्खन अण्डा, मांस, सन्तरा गाजर और हरी सब्जियों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन शरीर को निरोगी रखता है तथा गर्भ में चल रहे बच्चे के दांतों, त्वचा, बाल, हाथ-पैरों, नाखून और थायराइड ग्रन्थि का विकास करता है।

विटामिन `बी` (बायटिन)-

          विटामिन `बी` मीट, अनाज, गेहूं चने की दाल तथा मूंगफली आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य गर्भावस्था में भोजन का पाचन, बच्चे के शरीर का विकास, महिलाओं के स्तनों में दूध का निर्माण करना और शारीरिक क्षमता को बढ़ाना होता है।

विटामिन `बी2` (राइयोफलेविन)-

          विटामिन `बी2` (राइयोफलेविन) मीट, अनाजों, अण्डों, गेहूं, हरी सब्जियों और दूध से प्राप्त होता है। गर्भावस्था में यह विटामिन मस्तिष्क का विकास और शरीर को रोगों लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है।

विटामिन `बी6` (पेन्टोथैनिला)-

          विटामिन `बी6 (पेन्टोथैनिला) मीट, गेहूं, अनाजों, अण्डा, पनीर तथा बीज वाली सब्जियों में पाया जाता है। गर्भावस्था के दौरान यह विटामिन महिलाओं के रक्त के लाल कणों को बनाये रखता है।

विटामिन `बी12`-

          मीट, लाल मीट, अण्डे, दूध, पनीर और मछली में यह विटामिन अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है। यह विटामिन रक्त में लाल कणों का निर्माण करता है। यह विटामिन शरीर को स्वस्थ रखता है तथा बच्चे की नसों का विकास करता है।

फोलिक एसिड-

          यह बी काम्पलेक्स का भाग है जिसे विटामिन `एम` कहा जाता है। फोलिक एसिड हरी पत्तेदार सब्जियों, जिगर और बीजदार सब्जियों आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन गर्भावस्था में बच्चे के शरीर और नसों को विकास करता है। इसकी कमी से रीढ़ की हडि्डयों के रोग और मस्तिष्क के विभिन्न रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

विटामिन `सी` (एस्कार्बिक अम्ल)-

          विटामिन `सी` (एस्कार्बिक अम्ल) खट्टे फलों, आंवला, रसभरी, हरी सब्जी, आलू तथा टमाटर आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। यह लौह पदार्थों को शरीर में शोषित करता है तथा अच्छे ओवल की स्थापना करता है।

विटामिन `डी`-

          विटामिन डी मछली, जिगर, मछली का तेल, दूध, अण्डे आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन शरीर में स्वस्थ कणों का निर्माण करता है।

विटामिन `ई`-

          विटामिन ई गेहूं, चना, हरी सब्जियों, मछली का तेल तथा दालों आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन शरीर की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।

विटामिन `के`-

          विटामिन `के` पत्तेदार सब्जियों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह विटामिन शरीर में चोट के कारण खून निकलते समय खून को जमा देता है जिससे अधिक मात्रा में खून नहीं बहता है।

गर्भावस्था में शूगरयुक्त स्त्री का भोजन-

    गर्भावस्था में शूगरयुक्त स्त्री को थोड़ा-थोड़ा 7 बार भोजन करना चाहिए।
    स्त्रियों को सुबह 6 बजे लगभग बिना चीनी की चाय और दो बिस्कुट खाने चाहिए।
    स्त्री को 7 से 8 बजे के बीच एक कप चाय पीनी चाहिए। दूध बिना चीनी के पीना चाहिए। बेसन की मिस्सी रोटी या दो टोस्ट थोडे़ से मक्खन के साथ खाने चाहिए। इसके अलावा थोड़ी सी सब्जी, अण्डे तथा अंकुरित दाल का सेवन करना चाहिए।
    दिन में लगभग 11 बजे एक मौसम का फल, सन्तरा, अमरूद और खीरे का सेवन करना चाहिए।
    दोपहर में 12-1 बजे के लगभग चावल, दो चपाती, एक कप दाल, हरी सब्जी, करेला, प्याज, गाजर, टमाटर (आलू नहीं होना चाहिए), सलाद चिकन, मछली और दही का सेवन महिलाएं कर सकती हैं।
    शाम को 6 बजे के आस-पास एक कप चाय या दूध बिना चीनी मिलाए हुए पीना चाहिए।
    रात्रि को 8 बजे तीन चपाती, एक कप दाल, हरी सब्जी, मछली या चिकन का सेवन करना चाहिए।
    गर्भावस्था में शूगरयुक्त स्त्री को सोते समय लगभग 10 बजे बिना चीनी का दूध दो बिस्कुट के साथ या केवल मछली का सेवन करना चाहिए।

गर्भावस्था में शूगरहीन स्त्री का भोजन-

    गर्भावस्था में शूगरहीन स्त्री को सुबह जागने के बाद एक कप चाय दो-चार बिस्कुट के साथ पीनी चाहिए।
    सुबह 7-8 बजे टोस्ट मक्खन सहित, अण्डा, उबली हुई सब्जियां या खीरा, एक कप अंकुरित दाल, एक गिलास दूध और एक फल का सेवन करना चाहिए।
    दोपहर का भोजन 11 बजे लेना चाहिए। इस समय भोजन में चावल या 4 चपाती, एक कप दाल, सब्जियां, दही, रसेदार सब्जी या मछली लेना चाहिए।
    4 से 5 बजे के बीच में एक कप चाय दो बिस्कुट के साथ मौसम का एक फल (अमरूद, पपीता, केला, सेब, सन्तरा, मौसमी) का सेवन करना चाहिए।
    शाम का भोजन 7 से 8 बजे के बीच, चावल 3 कप, 4-5 चपाती, एक कप दाल, हरी सब्जियां, चिकन या मछली का सेवन करना चाहिए।
    सोते समय 200 से 250 ग्राम की मात्रा में मीठा दूध पीना चाहिए।

गर्भावस्था गाईड

Vātsyāyana
Chapters
गर्भावस्था की योजना
मनचाही संतान
भ्रूण और बच्चे का विकास
गर्भावस्था के लक्षण
गर्भधारण के बाद सावधानियां
गर्भावस्था में कामवासना
गर्भावस्था के दौरान होने वाले अन्य बदलाव
गर्भावस्था में स्त्री का वजन
गर्भावस्था की प्रारंभिक समस्याएं
गर्भावस्था के दौरान होने वाली सामान्य तकलीफें और समाधान
कुछ महत्वपूर्ण जांचे
गर्भावस्था में भोजन
गर्भावस्था में संतुलित भोजन
गर्भावस्था में व्यायाम
बच्चे का बढ़ना
गर्भावस्था के अन्तिम भाग की समस्याएं
प्रसव के लिए स्त्री को प्रेरित करना
प्रसव प्रक्रिया में सावधानियां
अचानक प्रसव होने की दशा में क्या करें
समय से पहले बच्चे का जन्म
प्रसव
जन्म
नवजात शिशु
प्रसव के बाद स्त्रियों के शरीर में हमेशा के लिए बदलाव
बच्चे के जन्म के बाद स्त्री के शरीर की समस्याएं
स्त्रियों के शारीरिक अंगों की मालिश
प्रसव के बाद व्यायाम
नवजात शिशु का भोजन
स्तनपान
बच्चे को बोतल से दूध पिलाना
शिशु के जीवन की क्रियाएं
स्त्री और पुरुषों के लिए गर्भ से संबंधित औषधि
परिवार नियोजन