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गर्भधारण के बाद सावधानियां

परिचय-

          शास्त्रों में लिखा है कि किसी भी स्त्री को जब गर्भ ठहर जाता है तो इसके बाद उसके साथ संभोग नहीं करना चाहिए। लेकिन बहुत से शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि गर्भधारण के बाद बिल्कुल संभोग न करें यह बात सही नहीं है। लेकिन इस तरह संभोग करते समय बहुत सी सावधानियों को नजर में रखकर ही इस क्रिया को करना पड़ता है। संभोग करते समय उत्तेजना में आकर एक बात को न भूले कि स्त्री गर्भवती है इसलिए संभोग क्रिया के समय बल का प्रयोग न करें। इस समय पुरुष को अपनी मर्दानगी दिखाने की जरूरत नहीं है औऱ न ही यह सोचने की, की स्त्री को काम-संतुष्टि हुई है या नहीं। आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार गर्भवती स्त्री का स्खलित होना सही नहीं माना गया है। वैसे तो हर पुरुष को इस समय अपने पर काबू रखना चाहिए लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता तो उसे अपने लिंग द्वारा योनि में बलपूर्वक घर्षण नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भ में पल रहे बच्चे पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा वीर्य स्खलन के बाद तुरंत ही लिंग को स्त्री की योनि से बाहर निकाल लेना चाहिए।

          कुदरत ने इस तरह का नियम बनाया है कि स्त्री के गर्भधारण करने के 9 महीने बाद ही बच्चे का जन्म होता है। इसी वजह से इतने लंबे समय तक पुरुष का अपने आप पर काबू रख पाना मुश्किल हो जाता है और वह स्त्री को संभोग के लिए प्रेरित करता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए काम-शास्त्रियों नें गर्भावस्था में संभोग करने की समय सीमा तय कर दी है। संभोग क्रिया के समय पुरुष की काम-उत्तेजना वीर्य का स्खलन होते ही शांत हो जाती है और वह ठंडा हो जाता है। संभोग के समय गर्भवती स्त्री के साथ हल्का-फुल्का घर्षण ही करना चाहिए और उसके पेट पर किसी तरह का भार आदि नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए अच्छा तरीका ये है कि संभोग करते समय स्त्री की जांघों को लंबा करके और उसकी जांघों पर बैठकर संभोग करें। इस तरह से करने से स्त्री के गर्भाशय पर किसी तरह का भार नहीं पड़ता।

गर्भावस्था में संभोग करने की समय-सीमा-

गर्भ ठहरने के पहले महीने में        हफ्ते में एक या दो बार

दूसरा महीना                                हफ्ते में एक या दो बार

तीसरा महीना                                हफ्ते में एक या दो बार

चौथा महीना                                हफ्ते में एक बार

पांचवें महीना                                हफ्ते में एक बार

छठे महीना                                हफ्ते में एक बार

सातवां महीना                            15 दिन में एक बार

आठवां महीना                            पूरे महीने में एक बार

नौंवा महीना                            इस महीने में गर्भवती स्त्री के साथ संभोग बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता।

अन्य सावधानियां-

          स्त्री के गर्भधारण करने के बाद संभोग क्रिया में सावधानी रखने के साथ-साथ और भी बहुत सी चीजें है जिनमें की सावधानी रखना बहुत ही जरूरी है जैसे-

गर्भधारण करने का पहला महीना-

          स्त्री जब गर्भधारण करती है तो पहले महीनें में वह घर के हर तरह के काम करने में सक्षम होती है। इस महीनें में स्त्री को उसी तरह काम-काज करने चाहिए जैसे की वह पहले करती थी

गर्भधारण करने का दूसरा महीना-

          इस महीने में अपने रोज के काम पहले महीने की तरह ही करने चाहिए लेकिन इस महीने से भारी सामान आदि को उठाना थोड़ा कम कर दें। इस महीने से स्त्री को उछल-कूद करने वाले काम बिल्कुल ही बंद कर देने चाहिए। स्त्री को न तो ज्यादा ही पैदल चलना चाहिए और न ही ज्यादा बार सीढ़ियां आदि चढ़नी चाहिए।

गर्भधारण करने का तीसरा महीना-

          अगर स्त्री ने अपनी दिनचर्या में व्यायाम आदि शामिल कर रखे हो तो उन्हे गर्भधाऱण करने के इस महीने से बिल्कुल बंद कर देने चाहिए। न तो जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ें और न ही उतरें। वजनदार सामान तो किसी भी हालत में न उठाएं और अगर बैठी हुई अवस्था से उठना हो तो बहुत ही आराम से उठें। अपने शरीर को किसी भी प्रकार का झटका न दें।

गर्भधारण करने का चौथा महीना-

          इस महीने में स्त्री को रोजाना दोपहर में आराम करने के लिए समय निकालना चाहिए।

गर्भधारण करने का पांचवां महीना-

          इस महीने में गर्भवती स्त्री को खड़े रहकर किसी तरह का काम नहीं करना चाहिए। चलते समय ऊंची-नीची जगह का ध्यान रखकर चलें। इसके अलावा ज्यादा ऊंचाई पर चढ़ने की कोशिश न करें।

गर्भधारण करने का छठा महीना-

          गर्भधारण के इस महीने में स्त्री को चलते समय अपनी रफ्तार धीमी ही ऱखनी चाहिए। अगर लंबा सफर न करें तो बहुत अच्छा है। सर्दियों में जितना शरीर को सहन हो उतने ही ठंडे पानी सें नहाएं। सिर धोने के बाद उसे जल्दी से पोंछकर सुखा लें।

गर्भधारण करने का सातवां महीना-

          गर्भधारण करने के सातवें महीने में स्त्री को अपने आहार-विहार में बदलाव लाना चाहिए। ज्यादा चटपटे, मिर्च-मसालेदार और खट्टे पदार्थों का सेवन करना कम कर दें। भोजन में न तो ज्यादा गर्म और न ही ज्यादा ठंडी चीजों का सेवन करें। दोपहर के समय ज्यादा से ज्यादा आराम करने के लिए समय निकालें। भारी सामान को तो भूल से भी उठाने की भूल न करें और न ही झुककर किसी सामान आदि को उठाएं।

गर्भधारण करने का आठवां महीना-

          इस महीने से स्त्री को बहुत ज्यादा सावधानी रखनी पड़ती है। उसे हल्का-फुल्का घर का काम ही करना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा आराम करना चाहिए और गर्मी से बचकर रहना चाहिए।

गर्भधारण करने का नौंवां महीना-

          यह गर्भावस्था का आखिरी महीना होता है। इस महीने में ज्यादा काम न करें और न ही ज्यादा देर तक बैंठे रहें। जितना ज्यादा हो सके लेटकर ही अपना दिन गुजारें। इस महीने में गलती से भी झुकना और झुककर किसी सामान आदि को उठाना नुकसानदायक हो सकता है।

गर्भावस्था गाईड

Vātsyāyana
Chapters
गर्भावस्था की योजना
मनचाही संतान
भ्रूण और बच्चे का विकास
गर्भावस्था के लक्षण
गर्भधारण के बाद सावधानियां
गर्भावस्था में कामवासना
गर्भावस्था के दौरान होने वाले अन्य बदलाव
गर्भावस्था में स्त्री का वजन
गर्भावस्था की प्रारंभिक समस्याएं
गर्भावस्था के दौरान होने वाली सामान्य तकलीफें और समाधान
कुछ महत्वपूर्ण जांचे
गर्भावस्था में भोजन
गर्भावस्था में संतुलित भोजन
गर्भावस्था में व्यायाम
बच्चे का बढ़ना
गर्भावस्था के अन्तिम भाग की समस्याएं
प्रसव के लिए स्त्री को प्रेरित करना
प्रसव प्रक्रिया में सावधानियां
अचानक प्रसव होने की दशा में क्या करें
समय से पहले बच्चे का जन्म
प्रसव
जन्म
नवजात शिशु
प्रसव के बाद स्त्रियों के शरीर में हमेशा के लिए बदलाव
बच्चे के जन्म के बाद स्त्री के शरीर की समस्याएं
स्त्रियों के शारीरिक अंगों की मालिश
प्रसव के बाद व्यायाम
नवजात शिशु का भोजन
स्तनपान
बच्चे को बोतल से दूध पिलाना
शिशु के जीवन की क्रियाएं
स्त्री और पुरुषों के लिए गर्भ से संबंधित औषधि
परिवार नियोजन