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सप्तम सर्ग : भाग 3

तभी सुव्रते ‘यही ठीक है’ चली गयी ऐसा कहकर
‘तब तक इससे ही खेलूँगा’ वह बालक बोला हठ कर,
हुई अधिप के मन में फिर से तनय स्नेह भावना उदय
‘इस दुर्ललित वीर बालक को बहुत चाहता हूँ निश्चय,
बिना निमित्त हास के जिसके दन्त मुकुल हैं आलक्षित,
तुतलाने के कारण जिसकी बोली है रमणीय प्रवृत,
धारणकर्ता भाग्यवान ही अंक-आश्रय के स्नेहिल
ऐसे पुत्रों के अंगों के रज से होते हैं धूमिल’
तपस्विनी ने कहा ‘ठीक है, मुझे नहीं गिनता है यह’
आस पास अवलोकन करके फिर से ऐसा बोली वह
‘ऋषिकुमार में यहॉं कौन है?’ किन्तु न कोई दिखा वहॉं
नृप की ओर देखकर बोली ‘श्रीमन्! आयें आप यहॉं,
जिसके कठिन पकड़ से मोचन अति दुष्कर है, इस ऐसे,
छुड़वा दें शिशु क्रीड़ा पीड़ित बाल सिंह को, बालक से’
निकट पहुँचकर मन्द विहॅंसकर यों बोले दुष्यन्त प्रबुद्ध
‘अरे महर्षिपुत्र! ऐसे ही आश्रम की वृत्ति के विरुद्ध,
जन्मकाल से ही जीवों के आश्रय-सुखकर-संयम को
दूषित क्यों करते हो जैसे कृष्ण सर्प शिशु चन्दन को’
तपस्विनी ने कहा ‘महाशय! कहें न इसे महर्षिकुमार’
यह सुनकर संकोचभाव में राजन करने लगे विचार
‘आकृति सदृश चेष्टा ही यह बता रही है बालक की
पर, तपस्थली के कारण यह उपज उठी मेरे मन की’
जैसा कि उस तपस्विनी ने किया निवेदन था, अनुरत
बालक को छूकर अधिपति ने प्राप्त किया अनुभूति स्वगत

‘अहो! किसी भी कुल के अंकुर, बालक को छूने से
जब मेरे अंगों को अतिशय प्राप्त हो रहा सुख ऐसे
तब तो यह जिस भाग्यवान की गोदी से है हुआ प्रसूत
उसके चित्तवृत्ति में कैसा सुख होता होगा अनुभूत’
बालक और अधिप दोनों को निरख निरख कर तपस्विनी
‘आश्चर्य! यह, आश्चर्य!’ यों कहले लगी भ्रान्ति अपनी
स्वर सुनते ही उधर देखकर अधिपति उससे बोले ‘आर्य!
विस्मय स्वर में भाव व्यक्त की, इस प्रकार क्या है आश्चर्य?’
‘इस बालक की और आप की है मिलती जुलती आकृति
इसीलिए मेरे अन्तर में है यह विस्मय की स्थिति,
नहीं आपसे परिचित तब भी है यह अप्रतिलोम संवृत्त’
अपने विस्मय को यों कहकर हुई तापसी शान्त प्रवृत्त
उसके विस्मय को सुनकर नृप उत्कंठा को स्वर देकर
किया प्रश्न यह तपस्विनी से उस बालक को दुलराकर
‘मुनिकुमार यदि नहीं, कौन सा है तब इस बालक का वंश?’
उत्कंठा के समाधान में तपस्विनी बोली ‘पुरुवंश’
धारण करने लगे स्वगत नृप विविध विचारों से अनुमान
‘इसका, मेरा, दोनों को है सन्तति कैसे एक समान?
अतः तापसी समझ रही है बालक को मेरे अनुहार
है बालक पौरव सन्तति का अन्तिम कुलव्रत इस अनुसार
जो पौरव राजा यौवन में रत पृथ्वी की रक्षा में
रखते है निवास की इच्छा भोगपूण प्रासादों में
तत्पश्चात् जिन्हें करना है यतिव्रत जीवन को अनुकूल
उनके ही गृह हो जाती है ऐसे ही वृक्षों की मूल’

इस प्रकार चिन्तनरत राजन बोले मन की आशंका
‘अपनी आत्म शक्ति से यह थल विषय नहीं है मानव का’
इस विचार पर तपस्विनी ने किया सत्यता को मुखरित
‘जैसा आप कह रहे हैं यह है निश्चय सर्वथा उचित,
पर, इसकी माता ने, जो है एक अप्सरा की तनया
यहॉं देवगुरु के आश्रम में आकर इसको जन्म दिया’
दुःख से एक ओर मुख करके नृप ने मन में सोचा ‘अह!
तब तो मेरे लिए दूसरी आशाजनक बात है यह’
और अधिक आश्वस्त हो सकें, चिन्तित नृप इससे पहले
‘किस राजर्षि महोदय ही है पत्नी यह देवी?’ बोले
कहने लगी तापसी ‘जिसने किया धर्मपत्नी का त्याग
कहो उसी के नाम धाम का कौन करेगा मंडन राग’
आकुल अधिप स्वगत चिन्तन कर ढूँढ रहे थे चिन्तन डोर
‘निश्चय, है इस करुण कथा का लक्ष्य भाव मेरी ही ओर,
अच्छा, पूछ रहा हूँ मैं इस शिशु की मॉं का नाम अभी
पर, पर-नारी से यों कहना नहीं शिष्ट व्यवहार कभी’
इसी समय पहली तपस्विनी मृण्मयूर सॅंग में लाकर
जहॉं सभी थे वहीं पहुँचकर उस शिशु के समीप आकर
उससे बोली ‘सर्वदमन! तू यह शकुन्तलावण्य निरख
इस स्वर को समझा उस शिशु ने यों ‘शकुन्तला वर्ण निरख’
ऐसा स्वर सुनते ही जैसे मातृभक्ति उसको घेरी
इधर उधर दृग का क्षेपण कर कहा ‘कहॉं है मॉ मेरी?’
इस पर दोनों तपस्विनी ने किय एक संग उच्चारण
‘मातृभक्त यह ठगा गया है नाम सदृशता के कारण’

‘वत्स!’ दूसरी बोली तत्क्षण निरख परख कर भावुकता
‘यह कहती है तुम देखो इस मृण्मयूर की सुन्दरता’
नृप सोचे ‘तो नाम शकुन्तला है क्या इसकी मॉं का भी?
ऐसा भी है किन्तु सदृशता होती है नामों में भी,
क्या यों उसके मात्र नाम का संप्रति किया गया प्रस्ताव
मृगतृष्णा से मेरे मन में कल्पित किया कष्ट का भाव’
शिशु बोला ‘मॉं! भद्र मोर यह रुचिकर लगता है मुझको’
ऐसा कहकर तपस्विनी से वह ले लिया खिलौने को,
तभी देखकर प्रथम तापसी घबराकर बोली चिन्ता
‘अरे! हाथ में इस बालक के रक्षासूत्र नहीं दिखता’
धैर्य बॅंधाते हुए अधिप ने कहा ‘नहीं, आवेग नहीं,
इसके सिंह-शिशु के संघर्ष में यह तो है गिर गया यहीं’
तपस्विनी से यह कहकर जब अधिप उठाने चले उसे
दोनों बोली ‘इसे छुएं मत, अरे इसे छू लेने से’
इतना ही वे कह पायी थीं कि नृप ने वह उठा लिया
इस पर बोलीं ‘अहो! इन्होंने इसको कैसे उठा लिया?’
इस प्रकार दोनों तपस्विनी यह कहकर विस्मय के साथ
लगी देखने उभय परस्पर अपने उर पर रखकर हाथ
विस्मय भाव कथन पर नृप के संशय गया हृदय में वेध
शीघ्र उन्होंने पूछा ‘मुझको किया गया था क्यों प्रतिषेध?’
नृप के ऐसे प्रश्न वाक्य पर इसका समाधान करने
पहली बोली ‘महाराज! मैं बतलाती हूँ यथा सुनें,
यह अपराजित नामक औषधि जातकर्म के अवसर पर
इस बालक को स्वयं दिए थे प्रभु मारीच महर्षिप्रवर

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5