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प्रथम सर्ग : भाग 3

ऐसा कहकर शकुन्तला तब लगी कलश से जल देने
और उधर नृप उसे देखते यह सन्देह लगे करने
‘सम्भव कश्चिद् यह शकुन्तला, जैसा मन का प्रतिपादन
कुलपति ऋषि के असमवर्ण की अन्य भार्या से उत्पन्न?,
मेरा यह सन्देह व्यर्थ है अनुपयुक्त है, यह संशय
क्षत्रिय द्वारा ग्रहण योग्य यह ऐसा मेरा दृढ़निश्चय,
क्योंकि मेरा श्रेष्ठ हृदय है इस कन्या में अभिलाषी
बरबस ही आकृष्ट हो रहा इस वपु-कंचन का भाषी,
क्योंकि संशयग्रस्त पदों में सत्पुरुषों की भाव प्रवृति
स्वयं हुआ करती प्रमाणवत्, है अकाट्य यह विधि संसृति’
और उधर घबराये स्वर में शकुन्तला कह उठी ‘अहो!,
जल सेंचन से घबराया सा, जल-बूँदों से आहत हो,
नवमालिका विरक्त यह मधुकर इधर आ रहा पंख प्रसार’
ऐसा कहती वय शकुन्तला करने लगी भ्रमर प्रतिकार
यह सब नृप अनुरक्त भाव से देख रहे थे प्रेम विभोर
पुलकित ईर्ष्यासिक्त हृदय से कहने लगे देख उस ओर
‘अरे भ्रमर! भय से कम्पित औ चंचल नेत्रों वाली का,
दुष्ट, छू रहा बार बार तू दृग मादक-दृग वाली का
किसी रहस्यपूर्ण गाथा के निश्चय ही तुम कािथक समान
इसके कर्णप्रान्त तक जाकर करते गुंजारन मृदु गान
दोनों हाथों से प्रयास कर दूर हटाती सी व्यवधान
उसके रति सर्वस्व अधर का बार बार करते हो पान’
भ्रमर रास से हुए तिरस्कृत क्षीण हुआ ज्यों नृप अधिपत्य
बोले ‘तत्व खोज में मधुकर मैं हतभागी तू कृतकृत्य’

पर, शकुन्तला के प्रयास पर रुकता था वह भ्रमर नहीं
बोली ‘दुष्ट! विराम न लेता चलती हूँ अन्यत्र कहीं,
ना जाने किस हेतु इधर भी पुनः आ रहा यह मधुकर
हे सखियों! इस दुष्ट भ्रमर से हॅूं अभिभूत, सुरक्षा कर’
चपलभाव से अरुचि दिखाती करती सहज व्यंग्य मुसकान
बोली सखियॉं, अयि! हम दोनों रक्षा करने वाली कौन?,
अपनी रक्षा हेतु बुलाओ आ जायें नृपपति दुष्यन्त
क्योंकि नृप द्वारा ही रक्षित होते हैं ये आश्रम प्रांत’
नृप ने देखा शकुन्तला को दुष्ट भ्रमर से अति भयभीत
सोचा तत्क्षण आत्म प्रकट का अवसर है यह परम पुनीत
मन में भय संकोच समाहित साहस कुछ कुछ हुआ शिथिल
‘नहीं चाहिए मुझको डरना’ कहकर साहस किया प्रबल
अर्धकथन कर नृप फिर सोचे ‘यह नृपत्व होगा अवगत,
इस प्रकार कुछ कथन करूँगा होगा जो परिचय अभिमत’
शकुन्तला अन्यत्र कहीं जा मधुकर से होकर अभिभूत
दृष्टि निक्षेपण कर वह बोली ‘अब भी क्यों अनुगत है धूर्त’
नृप अवसर का लाभ उठाकर पहुँचे शीघ्र वहॉं सम्मुख
बोले ‘पौरव शास्ति धरा पर कौन किसी को देगा दुःख,
पुरुवंशीक धरा पर करता कौन दुर्विनीत व्यभिचार?
सरल तपस्वी कन्याओं से किसका उच्छंृखल व्यवहार?
इस अवसर पर नृप से तत्क्षण अनुसूया बोली ‘हे आर्य!
जो भी घटित हुआ है उसमें नहीं हुआ अनहित का कार्य
मेरी प्रिय सखि शकुन्तला को मधुकर ने अभिभूत किया
अतः हुई व्याकुल यह सखि’ कह उसी ओर संकेत किया

शकुन्तला के प्रति अभिमुख हो बोले नृप है तप की वृद्धि’
शकुन्तला भयभीत सलज्जित मौन रही ज्यों तप की सिद्धि
चंचल किन्तु विनीत भाव से नृप का कथन लक्ष्य करके
गर्भित शब्दों में अनुसूया बोली सब का हित रख के
‘इस अवसर पर अतिविशिष्ट इन आर्य अतिथि के दर्शन कर
तप तो बढ़ ही रहा आपके इस उपवन में आने पर,
सखि शकुन्तले! पादोदक है, अब तुम कुटिया में जाओ
अतिथि आर्य हेतु फल मिश्रित पूजन सामग्री लाओ’
अनुसूया की वाणी सुनकर नृप बोले हो अनुगृहीत
‘मधुर आपके वचनों से ही मेरा आतिथेय उपकृत’
सप्तपर्ण तरु की वेदी पर इस छाया में कुछ पल बैठ
आर्य करें श्रम विगत यहॉं तब’ प्रियंवदा ने की यह हठ
राजा बोले कन्याओं से ‘ऐसा मेरा मत निश्चित
इन कार्यों के सम्पादन में आप सभी हैं हुई थकित’
अनुसूया आवाहन करती बोली ‘हे सखि शकुन्तले!
अतिथि सुश्रूषा हमें उचित है आओ बैठें वृक्ष तले’
अनुसूया के सानुरोध प्रिय वचनों को सुन बैठ गई
पर, नृप के प्रति आकर्षण से शकुन्तला उद्विग्न हुई-
‘इसे देख मैं वन विरोध के विषय विकारों से आवृत?,
हुआ जा रहा है क्यों मेरा संवेदन अतिशय कुंठित’
बोले नृप सब को विलोककर ‘आप सभी का है सौहार्द्र
सम वय और रूप के कारण है रमणीय और प्रेमार्द्र’
प्रियंवदा चुपके से बोली अनुसूये! है विस्मय यह
चतुर और गंभीर भावयुत सुन्दर आकृति वाला यह

अतिथि कौन? जो चतुर और प्रिय वचनों से करता मुग्धित
है प्रभावशाली सा कोई हमें हो रहा परिलक्षित’
अनुसूया बोली ‘प्रियंवदे! मुझमें भी है कौतूहल
निराकरण के लिए इसी से परिचय लेती हूँ इस पल’
बोली नृप के प्रति अभिमुख हो उत्कंठा का करने ह्रास
‘आर्य अतिथि के मधुर वचन से उपजा है जो यह विश्वास
जिज्ञासा को अभिप्रेरित कर मुझसे कहलाता है कि-
आर्य कौन से राजवंश को किया सुशोभित है, या कि-
यहॉं आगमन से विरहाकुल हुआ कौन सा देशांचल
या, यह किस उद्देश्य तपोवन आकर पीड़ित तन कोमल’
शकुन्तला ने कहा आत्मगत ‘अरे हृदय! घबराना मत,
यह विस्मित अनुसूया भी तो कहती है तेरा की मत’
अनुसूया के प्रश्न तथ्य पर द्विविधा में थे नृप ऐसे-
मैं अपने बारे में सम्प्रति करूँ निवेदन तो कैसे?
या कैसे मैं छिपा रखूँ अब इस अपनेपन का वृतान्त?,
चलो ठीक है, तो इसको मैं यह कहकर करता हूँ शान्त-
पौरव राजा से नियुक्त जो हैं धर्माधिकार, वह मैं,
आश्रम में निर्विघ्न क्रिया के ज्ञान हेतु आया हूँ मैं’
आर्य अतिथि का परिचय सुनकर अनुसूया सोची विहॅसार्थ
‘धर्म आचरण करने वाले तपसीगण हो गये सनाथ’
यह परिचय सुनकर शकुन्तला थी श्रृंगार-शील लज्जित
रूपहले आभूषण पर ज्यों मोती माणिक हो सज्जित,
दोनों सखियों ने दोनों का आकृति भाव किया अभिज्ञात
चुपके बोली ‘सखि शकुन्तले! आज यहॉं यदि होते तात’

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5