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षष्ठ सर्ग : भाग 1

षष्ठ सर्ग

कुछ ही दिन व्यतीत होने पर श्याल तथा दो रक्षक और
पीछे बॉंधे हुए पुरुष को आये राजमहल की ओर,
बॉंधें हुए व्यक्ति को पथ में दे दे कर ताड़ना कठोर
दोनों रक्षक पूँछ रहे थे ‘शीघ्र हमें बतला, हे चोर!
कि जिसके मणि के जड़ाव पर खुदा हुआ है नृप का नाम
कहॉं मिली यह तुझे अॅंगूठी?, करता है चोरी का काम?’
कहा सभीत पुरुष ने उससे ‘क्षमा करें हे महानुभाव!
जैसा समझ रहे हैं वैसा नहीं हमारा कर्म स्वभाव’
कहा प्रथम रक्षक ने इस पर ‘तो क्या करने को सत्कार
शोभन ब्राह्मण तुझे जानकर दिया अधिप ने यह उपहार?
कहा पुरुष ने उस रक्षक से ‘अब सुनिए मेरी इस पर,
मैं वासी शक्रावतार का, जाना जाता हूँ धीवर’
तभी अन्य रक्षक ने उससे कहा तीव्र स्वर में इस भॉंति
‘अरे चोर! क्या हम लोगों ने पूँछा तुझसे तेरी जाति?’
कहा श्याल ने ‘सूचक! अब तुम कहने दो अनुक्रम इसको
जब तक कि यह सब बतलाये इसे बीच में मत टोंको’
दोनों रक्षाकर्मी बोले ‘श्रीयुत्! जैसी आज्ञा हो’
मुड़कर तभी पुरुष से बोले ‘तो तुम अपनी बात कहो’
बतलाने की आज्ञा पाकर वह बोला वृत्तान्त सारा
‘मत्स्य पकड़ने की कटिया वा जाल उपायों के द्वारा

महानुभावों! मैं स्वकर्मवश निहित इसी व्यवसाय शरण
प्रतिदिन अपने इसी कर्म से करता हूँ परिवार भरण’
सुनकर श्याल पुरुष से ऐसा क्रोध त्यागकर हुए अक्रुद्ध
कहे विहॅंसकर ‘तब तो है यह तेरी आजीविका विशुद्ध’
ऐसा सुनकर किया पुरुष ने धर्म नीतिगत तर्क अकाट्य
‘सहज कर्म निन्दित हो तो भी होता नहीं कभी भी त्याज्य,
यज्ञ कार्य विधि के निमित्त में पशुओं के बलि में निष्ठुर
वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण भी होता ही है दया-मधुर’
सुनकर ऐसा भाव पुरुष से उत्सुक श्याल हुए कुछ शान्त
उससे धीमे स्वर में बोले ‘और कहो आगे वृत्तान्त’
कहा पुरुष ने ‘एक दिवस जब मैंने कुछ मछली पकड़े
उसमें से रोहित मछली के ज्यों ही किए स्वयं टुकड़े
तभी उदर के अन्दर उसके फैलाती आभा रेखा
रत्नजड़ित अत्यन्त मनोहर इसी अॅंगूठी को देखा,
तदनन्तर मैं इसे बेचने दिखलाया जब तुम सब को
उसी समय ही महानुभावों पकड़ लिए तत्क्षण मुझको,
अब चाहो मुझको छोड़ो या फिर कर दो मेरा प्राणान्त
इसे प्राप्त करने का केवल इतना सा ही है वृत्तान्त’
कहा श्याल ने ‘जानुक! इससे मॉंस गन्ध हो रही उदय
अतः गोहभक्षी मछुआ है यह इस कारण निःशंसय,
इसका करना प्राप्त अॅंगूठी है विमर्श योग्य प्रकरण
चलें राजकुल ही अब हम सब करने इसका निराकरण’
यह सुनकर रक्षकद्वय बोले ‘अच्छा, अरे चोर! ते चल’
ऐसा कहते हुए वहॉं से गमन किए सब राजमहल,

नगर द्वार पर आ पहुँचे जब कहा श्याल ने ‘हे सूचक!
देखभाल तुम करना इसका यहीं सावधानीपूर्वक,
जब तक मैं मुद्रिका प्राप्ति की कथा नराधिप से कहकर
और लौटकर यहीं द्वार पर आता हूँ आज्ञा लेकर’
इस पर दोनों रक्षक बोले ‘श्रीमन्! जैसा है आदेश,
स्वामी को प्रसन्न करने को आप नगर में करें प्रवेश’
जाकर श्याल नहीं लौटे जब उचित समय में यथाविधान
कहा प्रथम रक्षक ने ‘जानुक! हैं करते विलम्ब श्रीमान्’
तभी दूसरे ने समझाया ‘सूचक! तुझे नहीं क्या ज्ञात?
निःशंसय अवसर पाकर ही राजा से होती है बात’
शान्त हुआ सूचक बोला तब ‘इसके वध के अवसर पर
पुष्पमाल पहनाने को अब फड़क रहें हैं मेरे कर’
सूचक कहता हुआ शब्द यह किया पुरुष के प्रति संकेत
कहा निवेदन में उसने तब नीति वाक्य डर से अभिप्रेत
‘बिना किसी कारण के ही यह मुझे मारने का दुर्भाव
व्यक्त किया जो मुझे देखकर उचित नहीं है, महानुभाव!’
तदनन्तर द्वितीय रक्षक ने, अवलोकन करके अन्यत्र,
कहा ‘हमारे स्वामी तो यह, जिनके हाथ निहित है पत्र,
इसी ओर लेकर राजाज्ञा चले आ रहे हैं सम्मुख
तू होगा गिद्धों की बलि या देखेगा कुत्ते का मुख’
आकर श्याल कहा सूचक से ‘मछुए को कर दो मुन्चित
इसका करना प्राप्त अॅंगूठी है निश्चय सर्वथा उचित’
सूचक आज्ञा पाकर बोला ‘जैसा कहते हैं श्रीमन्’
जानुक बोला ‘वापस आया यह जाकर यमराज सदन’

ऐसा कहकर जानुक तत्क्षण मुक्ति कार्य में हुआ प्रयुक्त
करते हुए आज्ञा पालन किया पुरुष को बन्धन मुक्त,
धींवर मुक्ति प्राप्त करने पर किया श्याल का अभिवादन
बोला ‘आजीविका हमारी कैसी है?, बोलें स्वामिन्!’
कहा श्याल ने मछुआरे से ‘प्राप्त अॅंगूठी के समतुल्य
स्वामी ने दिलवाया भी है तुम्हें पारितोषिक बहुमूल्य’
पहले किया प्रणाम श्याल को तदनन्तर धन किया ग्रहीत
अति प्रसन्न मन कहा पुरुष ने ‘स्वामी! मैं हूँ अनुगृहीत’
सूचक बोला ‘अनुग्रह ही है कि शूली से वंचित कर
प्रतिष्ठापना किया गया है इसका गज के कन्धे पर’
फिर जानुक ने कहा श्याल से ‘मान्य! पारितोषिक कहिए,
उस मुद्रा से स्वामी अतिशय होंगे प्रियता प्राप्त किए’
सुनकर श्याल इन्हीं भावों को समझाया निज तर्क इन्हें
‘मुद्रा में बहुमूल्य रत्न के होने से प्रिय नहीं उन्हें,
जनपरिपालक महाराज को दर्शन करते ही उसका
हो आया है तीव्र स्मरण हृदयाकांक्षी प्रियजन का,
यद्यपि कि वे होने पर भी अति गंभीर प्रकृति वाले
क्षण विशेष के लिए हो उठे अति व्याकुल नयनों वाले
कहा कृतज्ञभाव में सूचक ‘मैं अभिप्राय कहूॅं किंवा
तब तो मान्य आपने की है अपने स्वामी की सेवा’
ईर्ष्या से जानुक ने तत्क्षण उसे देखकर व्यंग्य किया
ऐसा कहो कि इस मछुए के परिपालक के लिए किया’
धींवर बोला ‘स्वामी! इसमें आधे हिस्से का अधिकार-
सुमन मूल्य हो गया आपका’ जानुक बोला ‘उचित विचार’

कहा श्याल ने धींवर अब तुम हो हम लोगों के अति प्रिय
मदिरा की साक्षी में ही हो प्रथम मित्रता का अभिनय,
तो मदिरा के ही दुकान पर चलते हैं हम लोग अभी’
ऐसा कहते हुए वहॉं से गमन किए सब लोग तभी
राजमहल के ही परिसर में गगन मार्ग से सानुमती-
एक अप्सरा हुई अवतरित इस प्रकार चिन्तन करती
‘साधुजनों के स्नान काल तक उस अप्सरा तीर्थ तट पर
आत्म उपस्थिति का क्रम अपना किया पूर्ण मैंने रहकर,
अब तो इस राजर्षि श्रेष्ठ का समाचार अचिन्त होकर
अवलोकन प्रत्यक्ष करूँगी इसी प्रांगण में रहकर,
हुई मेनका के सम्बन्धित शकुन्तला मेरी तनया
पुत्री के निमित्त उसने ही पूर्व मुझे निर्दिष्ट किया,
यह किसलिए राजकुल लगता ऋतु उत्सव होने पर भी
उत्सव के आरम्भ कार्य में अति उत्साहविहीन अभी,
मुझ में है प्रणिधान शक्ति से परिज्ञात करने की शक्ति
किन्तु सखी का आदर करना मेरे मन की है अनुरक्ति,
अच्छा तो मैं तिरस्कारिणी विद्या के द्वारा छिपकर
इन उद्यान-पालिका द्वय के अब अत्यन्त निकट जाकर
सब कुछ पता लगाऊॅंगी ही’ सानुमती ऐसा कहकर
चिन्तन के अनुरूप भाव में गयी वहॉं पर तदनन्तर
इसी समय रसाल कोपल का अवलोकन करती दासी
आ पहुँची उद्यान-पालिका अनुगत किए अन्य दासी
कहने लगी प्रथम दासी तब कोपल का विलोककर रूप
‘ताम्र-हरित-पाण्डुर वसन्त के सत्यदर्श हे प्राणस्वरूप!

हे ऋतुमंगल, रसाल कोरक! किया तुम्हारा अवलोकन
तेरा शुभ आगमन प्राप्त कर मैं करती हूँ अभिनन्दन’
कहा अन्य चेटी ने उससे ‘हे परिभृतिके! बोल सही
यहॉं पहुँचकर एकाकी में तू क्या है गुनगुना रही?’
उसने कहा ‘अरी मधुकरिके! परिभृतिका स्वभाव आसक्त
आम्र-मंजरी को विलोककर हो ही जाती है उन्मत्त’
शीघ्र निकट जाकर हर्षित मन मधुकरिका की शंसय अन्त
उससे बोली ‘सखि परिभृतिके! तो क्या यह आ गया वसन्त?’
परिभृतिका मधुकरिका के सॅंग करने लगी हठात् विनय
‘अब तेरा मदमस्त गीत के गाने का है यही समय’
मधुकरिका के कहा ‘हे सखी! मुझे सहारा दे आकर
जब तक कि मैं अपने पद के अग्रभाग स्थित होकर
कामदेव की करूँ अर्चना आम्र-मंजरी अंजलि ले’
पहली बोली ‘यदि मुझको भी फल का आधा भाग मिले’
अपरा बोली ‘बिना कहे भी ऐसा होगा सम्पादित
हम दोनों का प्राण एक है दो शरीर ही है स्थित’
ऐसा कहती हुई सखी का विधिवत् अवलम्बन लेकर
आम्र मंजरी ग्रहण किया, फिर अग्रपाद उत्थित होकर
उसे ग्रहणकर कहा ‘अरे! यह आम्र मंजरी लघु विकसित
डण्ठल के तोड़े जाने पर होने लगती है सुरभित’
दोनों हाथ जोड़कर बोलीं ‘आम्र मंजरी! हो प्रार्थित
तुझे धनुर्धर कामदेव को अब मैं करती हूँ अर्पित,
पॉंचों बाणों में सर्वाधिक तू प्रभावशाली शर हो
और लक्ष्य पर जिसके वे सब पथिकजनो की युवती हो’

इस प्रकार कहकर मधुकरिका आम्र मंजरी की अर्पित,
इसी समय कंचुकी वहॉं पर आ पहुँचा अत्यन्त कुपित
मधुकरिका की ओर देखकर उस पर अति क्रोधित होकर
कहने लगा कंचुकी उससे ‘अनभिज्ञे! ऐसा मत कर,
राजन द्वारा वसन्तोत्सव प्रतिनिषिद्ध कर देने पर
आम्र मंजरी तोड़ रही हो क्यों ऐसा दुःसाहस कर?’
दोनों डरी हुई सी बोली ‘आर्य! कीजिए क्षमा प्रदान,
नहीं प्राप्त था हम दोनो को इस निषेध का किंचित् ज्ञान’
कहे कंचुकी ‘सुना नहीं है कि वासन्तिक तरुवर-सृष्टि
तदाश्रयी पक्षी भी नृप के आज्ञा की कर दी है पुष्टि,
क्योंकि दीर्घकाल से निर्गत आम्र-मंजरी इस कारण
स्वाभावित अपने पराग को नहीं कर रही है धारण,
जो प्रसून कुरबक-प्रसूत भी होने वाला था विकसित
वह भी है कोमल कलिका के उसी अवस्था में स्थित,
शिशिर विगत हो जाने पर भी पुरुष कोकिलो का रुत स्वर
अवरोधित हो गया अभी है उनके कंठों में आकर,
आज्ञा के पारित होने से ऐसा कुछ हो रहा प्रतीत
अर्धकृष्ट शर को मन्मथ फिर तर्कश में रख रहा सभीत’
दोनों ने तब स्वयं पुष्टि में ऐसा बोली ‘महानुभाव!
इसमें कुछ सन्देह नहीं है राजन का है महा प्रभाव’
तत्पश्चात् प्रथम दासी यह लघु वृत्तान्त लगी कहने
‘आर्य! कुछ दिवस के पहले ही राजश्याल मित्रावसु ने
किया स्वामिनी की सेवा में हम दोनों को अभिप्रेषित
और प्रमदवन की रक्षा का कार्य हुआ है आदेशित,

क्योंकि हम नव आगन्तुक हैं अतः कभी भी यह वृत्तान्त
हम दोनों ने नहीं सुना है, मानों मुझको सत्य नितान्त’
कहा कंचुकी ने दोनों से ‘चलो ठीक है, पर सुनना
अब इसके उपरान्त कभी फिर ऐसा कार्य नहीं करना’
दोनों ने फिर किया निवेदन मन में होती हुई विकल
‘आर्य! हो रहा है अब इस पर हम दोनों को कौतूहल,
यदि यह सुनने योग्य हमारे तो बोलें किस कारण, आर्य!
वसन्तोत्सव का निषेध कर बना दिया नृप ने परिहार्य?’
सानुमती ने सोचा ‘मानव होता तो है उत्सव प्रिय
इस निषेध का कोई बलवत् कारण होगा ही निश्चय’
कहा कंचुकी ने दासी से बहुतों को होने पर ज्ञात
भला तुम्हीं दोनों को फिर मैं क्यों ना बतलाऊॅं यह बात,
सुना नहीं क्या तुम दोनों ने अति संवेदनशील दुखान्त
शकुन्तला के परित्याग का यह लोकापवाद वृत्तान्त?’
कहा कंचुकी से दोनों ने ‘यह वृत्तान्त कष्टमूलक
राजश्याल ने बतलाया था अंगुलि मुद्रा दर्शन तक’
‘तब तो थोड़ा ही कहना है’ करके मन में यह चिन्तन
इसके बाद कंचुकी उससे आगे करने लगा कथन
‘जब से ही राजन ने अपनी अंगुलि-मुद्रा दर्शन से
किया अनुस्मरण ‘‘यह शकुन्तला पूर्व विवाहित है मुझसे
और मोहवश मैंने उसका परित्याग है किया हुआ’’
उसी समय से राजन को है पश्चाताप प्रभूत हुआ,
क्योंकि वे रमणीय वस्तु से रुचि विरुद्ध करते हैं द्वेष
तथा पूर्ववत् श्रेष्ठजनों से सेवन पाते नहीं विशेष,

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5