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अभिज्ञानशाकुन्तल | पंचम सर्ग : भाग 3 | Marathi stories | Hindi Stories | Gujarati Stories

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पंचम सर्ग : भाग 3

क्योंकि गुरु से इसके द्वारा नहीं ली गई थी अनुमति,
और आपने नहीं प्राप्त की बन्धुजनों से भी सम्मति,
दोनों के परिणय प्रसंग पर निश्चय नहीं उचित है रोष
किसी एक को ही क्या बोलूँ जब तुम दोनों का है दोष’
शकुन्तला ने स्वगत प्रश्न की ‘क्या कहते हैं अब राजन?’
मूढ़मना नृप बोले ‘यह क्या आप लोग कर रहे कथन?’
शकुन्तला मन में ही बोली सुनकर व्यक्त भाव दाहक
वाणी उपन्यास इनका तो निश्चय है जैसे पावक’
शारंगरव राजन से बोले ‘‘यह कैसे कहते हैं आप?
सतत लोक व्यवहार कार्य में हैं प्रवीण हे राजन आप,
पितृ सदन में रहने वाली पतिव्रता नारी पर भी
भिन्न भिन्न बहुवृत शंकायें करते ही हैं लोग सभी,
पति की वह प्रिय हो या अप्रिय प्रमदा हो पति गृह प्रेषित
बन्धु बान्धवों के द्वारा यह होती है निश्चय इच्छित’
नृप पूँछे ‘क्या इस देवी से मैंने किया पूर्व परिणय?’
दुःखी शकुन्तला मन में बोली ‘आशंका है सत्य, हृदय!’
नृप के प्रश्न वाक्य पर बोले शारंगरव कटु वाक्य विशेष
‘अपने किए कार्य के प्रति क्या है उत्पन्न हो रहा द्वेष?’
या, कर्तव्य विमुख होते हो इस प्रकार बनकर अनजान,
अथवा पूर्व कृत्य परिणय का आप कर रहे हैं अपमान’
नृप बोले ‘परिणय प्रसंग की जब अनुचित कल्पना यहॉं
ऐसे इन असत्य बातों का होता ही है प्रश्न कहॉं?’
शारंगरव बोले राजन से ‘प्रायः ही ऐश्वर्य प्रमत्त
हो जाते हैं मेरे वर्णित इन्हीं विकारों से आसक्त’

शारंगरव के इन वचनों से होकर अतिशय उद्वेलित
राजन बोले ‘यह सुनकर मैं हुआ बहुत हूँ अपमानित’
बोली तभी गौतमी ‘पुत्री! कुछ पल कर लज्जा का त्याग
खोल रही हूँ घूँघट तेरा तुझे ज्ञात कर सके सुहाग’
ऐसा कहते हुए गौतमी उठा दिया तब अवगुण्ठन
शकुन्तला का अवलोकन कर राजन सोचे मन ही मन
‘बिना यत्न के निकट उपस्थित, जिसकी ऐसी कोमल कान्ति
इस स्वरूप से परिणय मैने किया, नहीं या, ऐसी भ्रान्ति,
निश्चय करता हुआ यही मैं हूँ उपभोग, त्याग में कृश
प्रातः में तुषार से गीले कुन्द पुष्प को भ्रमर सदृश’
इन्हीं विचारों में डूबे जब बैठे थे धर्माचारी
उनका अवलोकन कर, मन में ऐसा बोली प्रतिहारी
‘ओह! धर्मनिष्ठा राजन की, स्वयं उपस्थित इस अनुहार
रूप देखकर कोई कैसे कर सकता है अन्य विचार?’
शारंगरव बोले तदनन्दतर ‘हे राजन्! बोलें कुछ आप,
किंकर्तव्यविमूढ़मना सा क्यों बैठे हैं अब चुपचाप?’
राजन बोले ‘हे तपस्वियों! किया बहुत चिन्तन-विचरण
किन्तु नहीं स्मरण हो रहा इसके सॅंग परिणय प्रकरण,
तब मुझको यह किस प्रकार से व्यक्त गर्भ लक्षण से युक्त
इसको, पति की आशंका में, अंगीकृत करना उपयुक्त?’
एक ओर मुख कर शकुन्तला बोली देख प्रयत्न विफल
‘परिणय है सन्देह आर्य को अब मेरी आशा निष्फल’
इस परिणति से आशाओं पर मानों हुआ कुठार प्रहार
तब क्रोधित होकर शारंगरव बोले ‘नहीं करो स्वीकार’

बलपूर्वक उपभोग की गई पुत्री का अनुमोदन कर
तेरे द्वारा तिरस्कार के योग्य हो गये हैं मुनिवर-
वे ही, जिसने ऐसे अपने चोरी किए गये धन को
पुनः चोर को प्रत्यर्पित कर बना दिया सुपात्र तुमको’
शारद्वत बोला ‘शारंगरव! आगे कुछ मत और कहो
विफल हुआ अपना प्रयास सब अब तो तुम चुपचाप रहो,
शकुन्तले! हम बोल चुके हैं जो भी योग्य लगा हमको,
महाराज ऐसा कहते हैं, दो समुचित उत्तर इनको’
शकुन्तला तब मन में बोली ‘वह अनुराग प्राप्त कर जब
ऐसी दशा प्राप्त कर ली है, क्या स्मरण कराना तब,
वह अनुराग बन गया है अब मुझको जैसा प्रायश्चित,
शोक मुझे ही करना होगा अब यह है अकाट्य निश्चित’
कहा प्रकट से ‘आर्यपुत्र!’ फिर कुछ पल तक वह शान्त रही
कहा पुनः ‘शंसय होने पर कदाचार यह उचित नहीं,
हे पौरव! यह ठीक नहीं है, पूर्ण अशोभनीय तुमको
कि वैसा आश्रम में तब तो सरल हृदय वाली मुझको
किया प्रथम अनुराग दिखाकर शपथपूर्वक परिपीड़ित,
ऐसे शब्दों के द्वारा अब किया आपने अपमानित’
शकुन्तला के द्वारा वर्णित सुनकर कर्णतिक्त आलाप
अपने कर्णों को छूकर नृप बोले ‘अहो! शान्त हो पाप,
तो, तटभंगकारिणी एवं स्वच्छ नीर को कलुषितमान
और तोड़ती हुई तीर के वृक्षों को, उस नदी समान
क्या तुम देना चाह रही हो निज कुल को कलंक अनुचित
और मुझे भी चाह रही हो करना ऐसे अधोपतित?’

शकुन्तला लांक्षित सी होकर बोली अति कातर मन से
‘मुझे आप यदि यह कहते हैं पर-स्त्री की शंका से
तब इस अभिज्ञान के द्वारा दूर करूँगी शंकाभाव’
यह सुनकर दुष्यन्त ने कहा ‘है उपयुक्त यही प्रस्ताव’
अॅंगुली को छूकर शकुन्तला होती हुई प्रबल असहाय
बोली तत्क्षण ‘मेरी अॅंगुली है मुद्रिका शून्य, धिक् हाय’
ऐसा कहकर शोकपूर्वक किया गौतमी का दर्शन
और गौतमी ने तब उससे इस प्रकार से किया कथन
निश्चय ही शक्रावतार में, शची तीर्थ पावन जल से
करते हुए वन्दना, मुद्रा निकल गयी है अॅंगुली से’
मन्द विहॅंसकर राजन बोले ‘यह ही है वह किंवदन्ती
जिसमें कहते हैं - नारी है होती प्रत्युत्पन्नमती’
शकुन्तला ने कहा ‘भाग्य ने दिखा दिया है आत्म प्रभुत्व,
अब मैं अन्य बात कहती हूँ जिसका भी है यहॉं महत्व’
नृप बोले ‘इस समय बात यह मेरे द्वारा है श्रवणीय
आप कहें इस क्षण उसको भी जिस प्रकार से हो कथनीय’
नृप के सावधान होने पर पुनः प्राप्त करके साहस
शकुन्तला ने पूर्व वृत्त को बोली ऐसा ‘एक दिवस
नवमालिका पुष्प्प उपवन में नलिनी पत्रों से निर्मित
पात्र लिए थे आप हाथ में जो कि था जल से पूरित’
‘हूँ सुन रहा इसे मैं’ नृप का इसी मध्य ही स्वर निकला
इस वृत्तान्त को पूरा करने आगे बोली शकुन्तला
‘उसी समय में रहा उपस्थित आश्रम का ही मृग शावक
दीर्घापांड नाम से परिचित मेरा वह प्रिय पुत्रकृतक

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5

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