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चतुर्थ सर्ग : भाग 1

चतुर्थ सर्ग

उपवन में थी पुष्प चुन रही प्रियंवदा अरु अनुसूया
वार्तालाप मध्य अनुसूया प्रियंवदा से कथन किया
‘प्रियंवदे! गान्धर्व रीति से सिद्ध मनोरथ शकुन्तला
पति अनुरूप प्राप्त की, इस पर यद्यपि है सन्तोष मिला
तो भी यह है चिन्तनीय सा, सोच रही हूँ मैं जैसे’
प्रियंवदा ने प्रश्न किया तब ‘मुझे बताओ यह कैसे?’
अनुसूया तब उससे बोली ‘सखी! आज राजन दुष्यन्त
यश्र कार्य की पूर्णाहुति पर ऋषि से प्राप्त विदा उपरान्त
अपने नगर धाम को जाकर, जाकर के अन्तःपुर प्रान्त
क्या स्मरण करेगा यह सब जो भी हुआ पूर्व वृत्तान्त?
प्रियंवदा ‘निश्चिन्त रहो सखि’ दी आश्वस्त भाव अनुभूति
गुण की नहीं विरोधी होती उन जैसी विशेष आकृति?
किन्तु तात सुन इस वृत्तान्त को ना जाने क्या सोचेंगे?
अनुसूया ने कहा ‘तात तो अपना अनुमोदन देंगे’
प्रियंवदा बोली ‘यह कैसे?’ अनुसूया ने कहा विकल्प
‘गुणी पुरुष को कन्या देना यह पहले से है संकल्प,
सखि उसका यदि दैवयोग ही कर देता है सम्पादन
तब निश्चय ही बिन प्रयास के हैं कृतार्थ अपने गुरुजन’
प्रियंवदा ने कहा देखकर पुष्प-पात्र पुष्पों से व्याप्त
‘सखि बलि कर्म हेतु पुष्पों को तोड़ लिया हमने पर्याप्त’

‘अब सखि के सौभाग्य देव की पूजा होगी सम्पादित’
अनुसूया के इस आग्रह पर प्रियंवदा ने कहा ‘उचित’
ऐसा कहकर उन दोनों ने किया कार्य जिस क्षण आरम्भ
‘भो! यह मैं हूँ’ पास कुटी से तभी सुना यह शब्द अदम्भ,
अनुसूया ने कहा सोचकर इस प्रकार का स्वर सुनकर
‘सखि प्रियंवदे! मुझे लग रहा अतिथि निवेदन जैसा स्वर’
प्रियंवदा ने कहा ‘कुटी पर सखि शकुन्तला है स्थित
किन्तु, लगी थी मुझे आज वह पुनः हृदय से अनुपस्थित’
अनुसूया ने कहा रोंककर उस पूजा का कार्य-विधान
‘तो इन पुष्पों को रहने दो’ और किया दोनों प्रस्थान
दोनों वैसा ही विचारकर ज्यों कुटिया की ओर चली
सुना शब्द यह ‘अरी, अतिथि का तिरस्कार करने वाली!
जिसको करती हुई स्मरण तू अनन्य मानस प्रियमान
यहॉं उपस्थित मुझ तपसी का ऐसा नहीं किया है ज्ञान,
तुझे स्मरण नहीं करेगा वह, बोधित करने पर भी
ज्यों स्मरण नहीं करता है पूर्व बात उन्मत्त कभी’
प्रियंवदा ने कहा ‘अहो धिक्! यह तो हुआ अनर्थ अगाध
शून्य ॉदय वाली सखि ने की किसी पूज्य के प्रति अपराध’
कहा सामने अवलोकन कर ‘नहीं व्यक्ति साधारण सा,
सहज कोप करने वाले ही यह तो हैं ऋषि दुर्वासा,
देकर शाप वेग बल से युत दुर्वारण गति से आसन्न
लौट जा रहे हैं वह देखो, अन्य अग्नि के दाहक कौन?’
अनुसूया मत ‘जा चरणों में, अर्पण कर प्रणाम आचार,
लौटा ले इनको, तब तक मैं अर्धोदक का करूँ विचार’

इस मत पर सहमत प्रियंवदा बोली ‘यह है उचित विधान,
जाकर ऐसा ही करती हूँ’ कहकर शीघ्र किया प्रस्थान
उसे भेजने चली उधर ज्यों यह लड़खड़ा गई वैसा,
गिरती हुई पदान्तर पर ही अनुसूया बोली ऐसा-
‘अहो! वेग होने के कारण लुढ़क गई मैं यह, जिससे
पुष्प-पात्र गिर गया हाथ के अग्र भाग से यह ऐसे’
उठकर चयन किया पुष्पों को बैठ गयी ले आश, उदास
कुछ क्षण के पश्चात् लौटकर आयी प्रियंवदा के पास
आते ही बोली प्रियंवदा अनुसूया से यह सुखमय
‘सखि! स्वभाव से कुटिल, ग्रहण वह करता है किसका अनुनय?
पुनरपि मेरा यही कथन कि किया गया वह क्रोध रहित’
‘उससे यह भी बहुत कहो सखि’ बोली अनुसूया प्रफुलित
तब प्रियंवदा कही वार्ता ‘सुन सखि, जब वह कुटिलमना
नहीं लौटने की इच्छा की तब मैंने की प्रार्थना
‘‘भगवन्! तप प्रभाव अज्ञानी इस प्रकार की मूढ़तमा
दुहितजनों के प्रथम पाप को कर देना चाहिए क्षमा’
‘तब क्या हुआ?’ कही अनुसूया, प्रियंवदा ने कहा वही
‘इस पर मेरा वचन अन्यथा होने के है योग्य नहीं,
किन्तु, ज्ञात आभरण देखकर शाप निर्वतन संभव मान’
ऐसा कहते हुए वहीं ऋषि स्वयं हो गये अन्तर्धान’
इस प्रकार सुनकर अनुसूया लगी धैर्यता से कहने
‘अब आश्वासित हो सकते हैं क्योंकि स्वयं अधिप ही ने
मिलते समय पूर्व अपने उस, अंकित जिस पर उनका नाम
स्मृति रूप अॅंगूठी उसको पहनाया था मन-अभिराम,

शकुन्तला उसके उपाय में होगी शाप मुक्ति को प्राप्त’
बोली प्रियंवदा ‘सखि! आओ, तब तक पूजन करें समाप्त’
पर्णकुटी के निकट पहुँचकर प्रियंवदा अवलोकन कर
बोली ‘अनुसूये! देखो तो किस प्रकार है दशा उधर,
रखे हुए मुख वाम हाथ पर सखि है जैसी चित्रलिखित
पति चिन्तन में रमी हुई यह अपने से भी है विस्मृत,
आने वाले को जानेगी यह कैसे? बतला मुझको
इस प्रकार की मनोदशा रख भूल गयी जब अपने को’
अनुसूया बोली ‘निश्चय ही मुख मे ही रख यह वृत्तान्त,
प्रिय, स्वथाव से कोमल सखि की रक्षा करना धर्म नितान्त’
‘कौन उष्ण जल से करता है नव मालिका वृक्ष सिंचन?’
प्रियंवदा के यह कहने पर निज निज गृह को किया गमन
इसी रात्रि में सोकर जागा एक शिष्य आश्रम ही का
लगा सोचने तत्खण उठकर चिन्तित अन्तर था जिसका
‘गत प्रवास से आश्रम आये भगवन काश्यप से समुचित
समय सुनिश्चिय हेतु अभी मैं इस रजनी हूँ आदेशित,
तब तक मैं प्रकाश में आकर देखूँ अभी और कितनी
अब अवशिष्ट रह गई होगी यह व्यतीत होती रजनी’
चारों ओर घूमकर वैसा अवलोकन कर गतिमय रात
कुछ अनुमान लगाया, तब फिर कहा ‘अहो! हो गया प्रभात
क्योंकि एक ओर औषधिपति चला जा रहा अस्ताचल
सूर्य दूसरी ओर अरुण को आगे करके रहा निकल
एक साथ दो तेजों वाले एक साथ हो अस्त उदित
मानों जग को निज दुख सुख की दशा कर रहे उपदेशित,

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5