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चतुर्थ सर्ग : भाग 2

और चन्द्र के अन्तर्हित पर स्मरणीय शोभा वाली
वही कुमुदिनी मेरे दृग को नहीं रह गई सुख वाली,
प्रियजन के प्रवास से पैदा अबलाओं के दुख निश्चित
होते ही हैं असहनीय अति विरह काल से अभिप्रेरित,
यह भी कि प्रभात की संध्या बेर झाड़ियों के ऊपर
स्थित तुहिन कणों को रक्तिम वर्ण दे रही है घुलकर,
जागा हुआ मोर कुश-निर्मित कुटिया की छत को त्यागा
यह भी इस क्षण देख रहा हूँ अभी अभी उठकर भागा,
उठा हुआ यह वेदि प्रान्त के, खुर से खोदे, थल से मृग
है उठ रहा पृष्ठ भागों से फैलाता अपने प्रति अंग’
अनुसूया भी सोकर उठकर आयी इसी शिष्य के पास
मन में, वह आक्रोश भाव में बोली मन को किए उदास
‘यद्यपि विषयपरांगमुखीजन मुझको यह कुछ नहीं विदित
फिर भी उस नृप ने सखि के प्रति है आचरण किया अनुचित’
कहा शिष्य ने ‘यज्ञ समय का, जाकर गुरु से, अनुसूया,
करता हूँ मैं अभी निवेदन’ ऐसा कहकर गमन किया
तब अनुसूया व्याकुल मन से करने लगी विविध चिन्ता
‘जगी हुई भी अभी क्या करूँ?, मुझे लग रहा सब रीता,
नहीं चल रहे हाथ पॉंव भी उचित कार्य में भी अपने
पूर्ण मनोरथ वाले हों अब कामदेव भगवन, जिसने
उस असत्य प्रण वाले जन में करवाया सखि का विश्वास
अथवा दुर्वासा का कोपन है कर रहा विकार विकास?
कैसे वह राजर्षि अन्यथा वैसी बातों को कहकर
लेख पत्र भी नहीं भेजता यहॉं अभी तक, पुर जाकर

अतः स्मरण चिह्न अॅंगूठी उसके पास यहॉं से अब
शीघ्र भेजते हैं जिससे कि उसे स्मरण हो यह सब
प्रार्थनीय है कौन तपस्वी कष्टपूर्ण जीवन वाले?
निश्चय दोष पक्षगामी है सखि शकुन्तला को पहले,
उद्यत होकर भी समर्थ मैं नहीं पा रही अपने को
कि दुष्यन्त विवाहित एवं गर्भ स्थापित प्रिय सखि को
जा प्रवास से आश्रम आये तात काश्यप के सम्मुख
करूँ निवेदन साहस करके बतला दूँ उसका सब दुःख,
ऐसी प्राप्त परिस्थिति में अब क्या करना चाहिए हमें?’
आ पहुँची प्रियंवदा, जब यह अनुसूया भी मतिभ्रम में
अनुसूया से तत्क्षण बोली प्रियंवदा हर्षित होकर
‘शकुन्तला के विदा कार्य को सखी शीघ्र चल पूरा कर’
अनुसूया बोली ‘सखि कैसे?’ थी प्रसन्नचित अब दोनों
गत प्रसंग को अवगत करती प्रियंवदा ने कहा ‘सुनो,
विगत रात्रि में शकुन्तला का हुआ सुखशयन, करने ज्ञात
जब मैं उसके पास गई थी तभी आ गये काश्यप तात,
लज्जा से अवनत मुख वाली शकुन्तला ने किया नमन
तत्क्षण तात काश्यप बोले करके उसका आलिंगन
‘धूम्र व्यग्र यजमान-हाथ से गिरी अग्नि में ही आहुति,
पुत्री! तुम अशोचनीया हो योग्य शिष्य की विद्या भॉंति,
ऋषि रक्षित कर तुम्हें आज ही पति के पास भेज दूँगा
तेरे पति को तुझे सौंपकर अहोधन्य हो जाऊॅंगा’
अनुसूया ने पूँछा उससे हो प्रसन्नचित, मन कर शान्त
‘किसने तात काश्यप को सखि बतलाया है यह वृत्तान्त?’

प्रियंवदा ने कहा ‘छन्दमय वाणी के द्वारा, जिससे,
कायारहित अग्निशाला में होने पर प्रविष्ट, ऐसे-
‘हे ब्रह्मन्! दुष्यन्त सुरोपित वीर्य शक्ति को, वह जिसको,
धरिणी के कल्याण हेतु में धारण करती पुत्री को
समझो ऐसे शमी वृक्ष सा जिसके गर्भ पल रही आग’
प्रियंवदा से ऐसा सुनकर अनुसूया भरकर अनुराग
बोली ‘अयि सखि! मुझको प्रिय है यह सुखमय प्रसंग अभिनव
पर, शकुन्तला आज जा रही, है विषादमय सुख अनुभव’
इस प्रकार वचनों को सुनकर प्रियंवदा ने कहा ‘सखी!
दुःख सह लेंगे हम दोनों, पर, वह तपस्विनी रहे सुखी’
अनुसूया बोली ‘तब तो सखि! इसी आम्र की शाखा में
अवलम्बित नारियल पिटारी जो समक्ष है यह, इसमें
बहुत काल तक रहने वाली केसर पुष्पों की माला
इस निमित्त के लिए रखी हूँ, इसे अभी तू जाकर ला,
मैं तब तक उसके निमित्त ही तीर्थ-मृत्तिका, मृग-रोचन,
दूर्वा घास और किसलय कुछ मंगल वस्तु ला रही चुन’
प्रियंवदा बोली ‘ऐसा ही’ अनुसूया भी गई अन्यत्र
प्रियंवदा उपवन में जाकर करने लगी पुष्प एकत्र
तभी एक स्वर हुआ ‘गौतमी! शारंगरव इत्यादि अभी
शकुन्तला को लेकर जायें, दे दें यह आदेश अभी’
पियंवदा ने यह स्वर सुनकर अनुसूया को दी संदेश
‘सखी! हस्तिनापुर गामी ऋषि दिये जा रहे हैं आदेश’
हाथ लिए मंगल सामग्री बोली उससे अनुसूया
‘सखी! चलें हम दोनों भी अब’ ऐसा कहकर गमन किया

देख उधर बोली प्रियंवदा ‘मुख को अवनत किए हुए
यह शकुन्तला सूर्योदय ही चोटी से स्नान किए
हाथों में नीवार ग्रहण कर करती हुई स्वस्ति वाचन
बैठी है तापस अभिनन्दित, चलो उधर ही करें गमन’
तत्पश्चात् गई वे दोनों एक साथ मिल शीघ्र उधर
जहॉं शकुन्तला थी तब स्थित इस प्रकार से आसन पर
एक तपस्विनी शकुन्तला से बोली ‘पुत्री! सुख हो व्याप्त,
पति के अतिशय आदरसूचक महादेवि पद को कर प्राप्त’
बोली अन्य तपस्विनी उससे ‘वत्से! वीर प्रसविनी हो’
और तीसरी तपस्विनी ने ‘वत्से! पति की स्नेही हो’
रही गौतमी, चली गई सब देकर यह आशीष वचन
दोनों सखियॉं निकट पहुँच तब शकुन्तला से किया कथन
‘सखि शकुन्तले! सुखदायक हो तुझे तुम्हारा शिख स्नान’
शकुन्तला ने ‘स्वागत सखियों! बैठो’ बोली ससम्मान
मंगल पात्रों को लेकर तब बैठ गयीं दोनों सखियॉं
बोली ‘सखि! सज लो, तब तक हम करें पूर्ण मंगल विधियॉं’
रुँधे कण्ठ बोली शकुन्तला ‘मानों यही बहुत होना,
अब मेरा सखियों के द्वारा दुर्लभ है सज्जित होना’
यह कहते प्रारम्भ हो गया अविरल ऑंसू का बहना
बोली सखियॉं ‘मंगल क्षण में उचित नहीं है सखि रोना’
ऐसा कहकर शकुन्तला से लगीं पोछने अश्रु विकल
तत्पश्चात् प्रसाधन लेकर लगी सजाने वे उस पल
‘आभरणों के योग्य रूप को देख रही हूँ यथा विपन्न
आश्रम सुलभ प्रसाधन से तो है विकार सा ही उत्पन्न’

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5