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षष्ठ सर्ग : भाग 3

अनुपमेय इस चित्रलेख के ऊॅंचे-नीचे भागों में
दृष्टि स्खलन होने जैसा होता है आभास हमें’
सानुमती ने कहा आत्मगत ‘है राजर्षि निपुणता धन्य,
मानों कि मेरे समक्ष यह खड़ी हुई है सखी अनन्य’
चित्रफलक का अवलोकन कर नृप ने कहा विदूषक से
‘जो जो ठीक नहीं चित्रण में करता हॅूं मैं ठीक उसे
तो भी उस सर्वांगसुन्दरी शकुन्तला का सुन्दर रूप
रेखाओं के द्वारा कुछ ही ठीक हुआ उसके अनुरूप’
राजन के इस उद्बोधन पर सानुमती का था मन्तव्य
‘पछतावा से बढ़े प्रेम, वा, निरभिमान सा है वक्तव्य’
कहा विदूषक ने ‘है सम्प्रति तीन देवियॉं चित्रण में
और सभी सुन्दर है तो फिर कौन शकुन्तला है इनमें?’
सानुमती ने सोचा ‘इसकी दृष्टि प्राप्त है भ्रम आसक्ति
जो ऐसे सौन्दर्य बोध से है अनभिज्ञ लग रहा व्यक्ति’
नृप बोले ‘तो इनमें किसको समझ रहे हो शकुन्तला?’
प्रस्तुत करता तर्क विदूषक नृप से इस प्रकार बोला
‘चित्रफलक का अवलोकन कर मेरा है विचार निष्भ्रम
जिसके शिथिल केशबन्धन से ढ़ीले हो गिर गसे कुसुम
ऐसे केशपाश वाली जो, यह प्रतिकृति, जिसके मुख पर
स्वेद विन्दुएं झिलमिल झिलमिल हैं हो रही दृष्टिगोचर,
जिस देवी की दोनों बॉंहें है विशेषतः झुके हुए
और स्निग्ध सिंचन से एवं नव पल्लव परिपूर्ण हुए
आम्र वृक्ष के पास थकी सी जो चित्रित वह शकुन्तला
तथा अन्य दोनों सखियॉं हैं, बोलें कैसा ज्ञान चला?’

तभी विदूषक को विलोक कर नृप बोले ‘हैं आप निपुण,
इससे मेरे भाव चिह्न का किया गया है आरोपण,
यह देखो रेखा प्रान्तों पर करते समय इसे चित्रित
स्वेदयुक्त अॅंगुली रखने से मलिन चिह्न है परिलक्षित,
और, चित्रगत शकुन्तला के इक कपोल पर पड़ा हुआ
अभी हो रहा परिलक्षित यह रंग यथा स्फीत हुआ,
अरी चतुरिके! है अपूर्ण सी मुझको यह विनोद की वस्तु
जाओ, मेरे द्वारा वांछित लाओ अभी वर्तिका अस्तु’
कहने लगी विदूषक से वह ‘अहो! पकड़ लो चित्रफलक
जाकर मैं अतिशीघ्र वर्तिका लेकर आती हूँ जब तक’
राजन बोले ‘चित्रफलक को मैं ही करता हूँ धारण’
दे दी उसने चित्रफलक को सुनकर नृप का उच्चारण
शीघ्र चतुरिका गमन कर गई चित्रपट्ट नृप को देकर
और विदूषक से बोले तब नृप वियोग बोझिल होकर
‘सखे! पूर्व साक्षात उपस्थित अपनी प्रिया शकुन्तला को
अपने से अति दूर छोड़कर पुनः चित्र स्थित इसको
बहुत मानता हुआ हृदय से हूँ वैसा, जैसे पथ में
जल से पूर्ण नदी वंचित कर हूँ प्रेमी मृगतृष्णा में’
कहने लगा विदूषक मन में ‘यह श्रीमान नदी को त्याग
है प्रवेश अब किए जा रहे मृगतृष्णा में रख अनुराग’
नृप से बोला ‘श्रीमन्! इसमें अब क्या करना है चित्रित?’
सानुमती के यह सुनने पर मन में हुआ विचार उदित
‘मेरी प्रिय सखि शकुन्तला को जो स्थल है प्रिय अत्यन्त
है उनको चित्रित करने को उत्सुक यह राजन दुष्यन्त’

नृप बोले ‘हैं जिसके तट पर प्रमुदित हंस-मिथुन स्थित
ऐसी ही मालिनी नदी को करना चाहॅूंगा चित्रित,
उसके दोनों ओर जहॉं पर बैठे मृग हों परिलक्षित
उन्हीं हिमालय के पावनमय पर्वत करने हैं निर्मित,
और सुनो प्रिय, शाखाओं पर लटके हैं वल्कल जिसके
ऐसे ही पादप के नीचे एक कृष्णसार मृग के
श्रृंग भाग पर वाम नयन का घर्षण करती हुई मृगी
चित्रित करने की अभिलाषा है मेरे अब हृदय जगी’
कहा विदूषक ने मन में ‘यह जैसा कि अब देखेंगे
चित्रफलक को दाढ़ी वाले तपस्वियों से भर देंगे’
बोले पुनः विदूषक से नृप चित्रफलक का कर संकेत
‘अब करना है शकुन्तला को हमें प्रसाधन से अभिप्रेत’
कहा विदूषक ने ‘वह कैसे?’ सानुमती ने किया विचार
‘जो वनवासी सौकुमार्य वा विनयभाव के हों अनुसार’
नृप बोले ‘वयस्य! कर्णों में फॅंसा हुआ डण्ठल जिसका
और कपोलों पर भी इसके फैला है पराग जिसका
ऐसे ही शिरीष पुष्पों को अभी बनाया गया नहीं
इसके भी अतिरिक्त यहॉं पर मेरे द्वारा और न ही
स्तनद्वय के मध्य भाग में शरदचन्द्र के किरण समान
अति सुकुमार मृणाल सूत्र की रचना का था कोई ध्यान’
कहा विदूषक ने ‘यह देवी, रक्त कमलदल सम शोभित
अग्र हस्त से मुख ढ़ॅंककर क्यों है स्थित अत्यन्त चकित?’
पुनः देखकर कहा ‘अरे यह नीच, पराग-चोर मधुकर
है कर रहा आक्रमण आकर आदरणीया के मुख पर’

भ्रमर उपस्थित हुआ देखकर राजन को तब लगा अशिष्ट
कहने लगे विदूषक से ‘तो शीघ्र हटा दो तुम यह धृष्ट’
नृप के इस आग्रह पर उसने बोला ‘मैं तो हूँ असमर्थ,
इसे हटाने में, दुष्टों के शासक, प्रिय! हैं आप समर्थ’
सुनकर बोले अधिप ‘ठीक है, कुसुमलता के अतिथि विशिष्ट!
उसके चारों ओर भ्रमण का आप कर रहे हो क्यों कष्ट?
तुझमें ही अनुरागवती हो यह समक्ष मधुकरी अभी
बैठी हुई पुष्प के ऊपर, सत्य, पिपासित होकर भी
है कर रही प्रतीक्षा तेरी, अरे भ्रमर! हो तुझको ज्ञान,
तेरे बिना वियोगभाव में नहीं कर रही मधुरस पान’
सानुमती ने कहा आत्मगत सुनकर नृप स्वर विनयोचित
‘अभी किया इसने मधुकर को बड़ी शिष्टता से वर्जित’
कहा विदूषक ने राजन से ‘प्रियवर! यह हे ऐसी जाति
कि रोंके जाने पर भी यह चलती है उलटों की भॉंति’
आत्म उपेक्षा पर राजन में जागी दण्डनीति की धुन
बोले ‘तू मे शासन को नहीं मानता तो अब सुन
अरे भ्रमर! अशुष्क एवं नव तरु पल्लव सा खिले हुए
मेरे द्वारा रतिक्रीड़ा में दयापूर्वक पिये गए
शकुन्तला के बिम्बाधर को छूने का यदि किए प्रयास
तो मैं तुझको कमलोदर का दे ही दूँगा कारावास’
राजन के इस क्रोधित स्वर पर कहा विदूषक ने उनसे
‘तीक्ष्ण दण्ड देने वाले, यह नहीं डरेगा क्यों तुमसे?’
हॅंसकर कहने लगा आत्मगत ‘यह तो हुए पूण उन्मत्त
मैं भी इसका साथ पकड़कर इसी वर्ण में हूँ संवृत्त’

पुनः प्रकट स्वर में वह बोला ‘अरे मित्र! यह तो है चित्र’
फिर नृप विस्मय स्वर में पूछे ‘अहो मित्र! क्या यह है चित्र’
सानुमती ने सोचा ‘मैं भी अब यथार्थ से हूँ अवगत
यथा चित्र अनुभव करते इस राजन से है हृदय द्रवित’
कुछ क्षण के पश्चात क्रोध में नृप दुष्यन्त लगे कहने
‘मित्र! मुझे आभास दिलाकर क्यों धृष्टता किया तुमने?
अति तल्लीन हृदय से मानों साक्षात उसको पाकर
दर्शन सुख के अनुभव में रत मुझको स्मृति में लाकर
तुमने मेरी कान्ता को फिर चित्र लिखित सा बना दिया’
पश्चाताप हृदय से नृप ने ऐसा कहकर रुदन किया
सानुमती ने सोचा नृप का अवलोकन कर प्रबल विरह
पूर्वापर का प्रबल विरोधी है अपूर्व वियोग पथ यह’
पुनः विदूषक से नृप बोले ज्यों धारण कर क्षीण विभव
‘क्यों मैं इस प्रकार करता हूँ अविश्रान्त दुख का अनुभव?’
मित्र! निशा जागृति के कारण स्वप्न समागम है अवरुद्ध
और चित्रगत उसका दर्शन ऑंसू ने कर दिया निरुद्ध’
सानुमती नृप को विलोककर ऐसा मन में किया विचार
‘शकुन्तला के परित्याग के दुःख का तुम कर लिए निवार’
‘महाराज की जय हो’ कहकर कहा चतुरिका ने आकर
कूँची की पेटी को लेकर जैसे ही मैं चली इधर’
मध्य प्रश्न राजन का ‘फिर क्या?’ आगे कहने लगी ‘उसे,
जिनके साथ तरलिका थी, उन देवि वसुमती ने मुझसे
छीन लिया यह कहकर तत्क्षण बलवत करती हुई प्रयास
कि पेटी को ले जाऊॅंगी मैं ही आर्यपुत्र के पास’

तभी चतुरिका को विलोककर उसे विदूषक धिक्कारा
उससे बोला ‘अहा! भाग्य से तुम्हें मिल गया छुटकारा’
बोली पुनः ‘वृक्ष में अटके देवी का पल्लू बढ़कर
जभी छुड़ाने लगी तरलिका तभी आ गई मैं बचकर’
तत्पश्चात विदूषक से नृप व्यक्त किए चिन्ता अपनी
कुछ ही क्षण में यहॉं उपस्थित होंगी अभी महारानी,
वह देवी अत्यन्त गर्व से, निश्चय समझो, है गर्वित
यह शकुन्तला की प्रतिकृति अब तेरे द्वारा हो रक्षित’
‘अरे बचाओ अभी स्वयं को, यह बोलो’ ऐसा कहकर
चित्रफलक को तत्क्षण लेकर कहा विदूषक ने उठकर
‘अन्तःपुर के कालकूट से आप मुक्त जब हो जाना
तभी मेघप्रतिछन्द महल पर मुझे पुकार लगा देना’
इस प्रकार कहकर राजन से प्रतिकृति किए हुए आदान
द्रुतगति में अविलम्ब वहॉं से किया विदूषक ने प्रस्थान
सानुमती ने सोचा ‘यद्यपि किसी अन्य पर हो आसक्त
शिथिल प्रेम वाला यह अब भी पूर्व प्रेम में है अनुरक्त’
‘महाराज की जय हो, जय हो’ प्रतिहारी कहकर सादर
हुई उपस्थित नृप के सम्मुख कर में एक पत्र लेकर
वेत्रवती का अवलोकन कर उससे यह पूछा नृप ने
‘देखा नहीं अभी क्या पथ में देवि वसुमती को तुमने?’
प्रतिहारी उनको सूचित की ‘हॉं, अवश्य कुछ पग आयीं
किन्तु पत्र यह लिए हाथ में मुझे देखकर लौट गयीं’
नृप ने कहा देवि वसुमति को है कार्यों का महती बोध
अतः हमारे किसी कार्य में नहीं डालती हैं अवरोध’

वह बोली ‘राजन! अमात्य ने किया निवेदन यह विवरण
‘‘धन संग्रह के गणना की ही कार्य बहुलता के कारण
मात्र एक नागरिक कार्य का किया है मैने अंकेक्षण,
लिखा गया है उसे पत्र में, महाराज कर लें प्रेक्षण’’
नृप ने कहा ‘पत्र दिखलायें’ प्रतिहारी ने पत्र दिया
कुछ क्षण में ही पत्र पठनकर महाराज बोले ‘यह क्या?
सूचित है समुद्र व्यापारी धनमित्र नामक वणिक प्रधान
मरा नाव की दुर्घटना में, बेचारा था निःसंतान,
राजसात हे उसकी सम्पत्ति, किया अमात्य ने यह अनुज्ञात,
यह भी तो, संतानहीनता निश्चय ही है दुःख की बात,
वेत्रवती! संभव बहुधनवश वह बहुपत्नी वाला हो,
देखो कि उसकी पत्नी में कोई गर्भवती यदि हो’
प्रतिहारी बोली ‘हे राजन! ऐसा सुना गया है कि
कुछ पहले साकेत नगर के बानिक की पुत्री, जो कि
उस धनमित्र की पत्नी का है किया गया पुंसवन संस्कार’
प्रतिहारी से यह सुनकर नृप बोले उससे नीति विचार
तो गर्भस्थ, पिता के धन को पाने का अधिकारी हो,
वेत्रवती! अमात्य तक जाकर तुम उनसे अब यही कहो’
‘जैसी महाराज की आज्ञा’ कहकर ज्यों कुछ दूर गयी
पुनः अधिप बोले ‘सुनिए तो’ वह बोली ‘मैं यह आयी’
कहा अधिप ने प्रतिहारी से प्रजाजनों का समुचित हित,
इससे क्या, संतान नहीं है, यह विचार ही है अनुचित,
अखिल प्रजा का जो कोई भी जिस जिस अपने ही अत्यन्त
प्रियजन से वियुक्त होता है, पाप छोड़कर, नृप दुष्यन्त

अभिज्ञानशाकुन्तल

कालिदास
Chapters
प्रथम सर्ग : भाग 1
प्रथम सर्ग : भाग 2
प्रथम सर्ग : भाग 3
प्रथम सर्ग : भाग 4
प्रथम सर्ग : भाग 5
द्वितीय सर्ग : भाग 1
द्वितीय सर्ग : भाग 2
द्वितीय सर्ग : भाग 3
द्वितीय सर्ग : भाग 4
द्वितीय सर्ग : भाग 5
तृतीय सर्ग : भाग 1
तृतीय सर्ग : भाग 2
तृतीय सर्ग : भाग 3
तृतीय सर्ग : भाग 4
तृतीय सर्ग : भाग 5
चतुर्थ सर्ग : भाग 1
चतुर्थ सर्ग : भाग 2
चतुर्थ सर्ग : भाग 3
चतुर्थ सर्ग : भाग 4
चतुर्थ सर्ग : भाग 5
पंचम सर्ग : भाग 1
पंचम सर्ग : भाग 2
पंचम सर्ग : भाग 3
पंचम सर्ग : भाग 4
पंचम सर्ग : भाग 5
षष्ठ सर्ग : भाग 1
षष्ठ सर्ग : भाग 2
षष्ठ सर्ग : भाग 3
षष्ठ सर्ग : भाग 4
षष्ठ सर्ग : भाग 5
सप्तम सर्ग : भाग 1
सप्तम सर्ग : भाग 2
सप्तम सर्ग : भाग 3
सप्तम सर्ग : भाग 4
सप्तम सर्ग : भाग 5