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रावण और शिव

रामायण का प्रतिपक्षी रावण असल में शिव का परम भक्त , विद्वान , उत्कृष्ट शासक और वीणा का कलाकार था | रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए नर्मदा के तट पर तपस्या की | उन्हें खुश करने के लिए वह बार बार अपना सर काटता गया | हर बार जब वह ऐसा करता था तो उसका सर फिर वापस स्थापित हो जाता था | ऐसा १० बार हुआ और अंत में शिव प्रसन्न हो गए | शिव ने वो दस सर रावण को भेंट कर दिए  |ये १० सर प्रतीक हैं उन ६ शास्त्रों और ४ वेदों के जिनकी महारथ रावण ने हासिल की थी |   

लंका जीतने के बाद रावण फिर शिव से मिलने कैलाश पहुंचा जहाँ उसे नंदी ने अन्दर आने से रोक दिया | गुस्से में रावण ने नंदी का मजाक बनाया तो नंदी ने उन्हें श्राप दिया की उसकी लंका एक बंदर के हाथों नष्ट होगी ! अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए रावण ने कैलाश उठाने की कोशिश की | गुस्से में शिव ने पर्वत पर अपना पैर का अंगूठा रख दिया और रावण का हाथ दब गया | उसकी चीख से सारी दुनिया  हिल गयी | शिव को खुश करने के लिए रावण ने अपनी नसें निकाल  शिव के गीत गाने शुरू किये जिस पर शिव ने उसे जाने दिया और उसे एक तलवार भेंट कर दी और नाम दिया रावण जिसका मतलब है “भयानक दहाड़ वाला” |

जब राम और उनकी सेना ने समुद्र को पार करने के लिए पुल बना लिया , हवन करने के लिए उन्होनें जिस पंडित को बुलाया वह था रावण | हांलाकि उसे मालूम था राम ने किस मकसद से ये पुल बनाया था उसने फिर भी श्री राम को अपना आशीर्वाद दिया |