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हिमाला

 


ऐ हिमाला[1] ऐ फ़सीले किश्वरे-हिन्दोस्ताँ[2]
चूमता है तेरी पेशानी[3] को झुककर आसमाँ

तुझमें कुछ पैदा नहीं देरीना-रोज़ी[4] के निशाँ
तू जवाँ है गर्दिशे-शामो-सहर के दरमियाँ[5]

एक जल्वा था कलीमे-तूरे-सीना के लिए
तू तजल्ली [6] है सरापा[7] चश्मे-बीना [8] के लिए

इम्तिहाने-दीदा-ए-ज़ाहिर[9] में कोहिस्ताँ है तू
पासबाँ[10] अपना है तू दीवारे-हिन्दोस्ताँ है तू

मतला-ए-अव्वल फ़लक़ जिसको हो, वो दीवाँ[11] है तू
सू-ए-ख़िलवतगाहे-दिल [12] दामनकशे-इंसाँ है तू

बर्फ़ ने बाँधी है दस्तारे-फ़ज़ीलत[13] तेरे सर
ख़न्दाज़न[14] है जो कुलाहे-मेहरे-आलम ताब पर

तेरी उम्रे-रफ़्ता[15] की इक आन है अहदे-कुहन[16]
वादियों में हैं तेरी काली घटाएँ खेमाज़न

चोटियाँ तेरी सुरैया[17] से हैं सरगर्मे-सुख़न[18]
तू ज़मीं पर और पहना-ए-फ़लक़ तेरा वतन

चश्म-ए-दामन तेरा आईना-ए-सैयाल[19] है
दामने मौजे-हवा जिसके लिए रूमाल है

अब्र[20] के हाथों में रहवारे -हवा के वास्ते
ताज़ियाना[21] दे दिया बर्क़े-सरे-कुहसार[22] ने

ऐ हिमाला! कोई बाज़ी-गाह[23] है जिसके लिए
दस्ते-क़ुदरत[24] ने ने बनाया है अनासिर[25] के लिए

हाय क्या फ़र्ते-तरब में झूमता जाता है अब्र
फ़ीले-बेज़ंजीर[26] की सूरत उड़ा जाता है दिल

जुंबिशे-मौजे-नसीमे-सुबह[27] गहवारा[28] बनी
झूमती है नश्शा-ए-हस्ती[29] में हर गुल की कली

यों ज़बाने-बर्ग से गोया है उसकी ख़ामुशी
दस्ते-गुलचीं[30] की झटक मैंने नहीं देखी कभी

कह रही है मेरी ख़ामोशी यह अफ़साना मिरा
कुंजे-ख़िलवत, ख़ाना-ए-क़ुदरत [31]है काशना[32] मिरा

आती है नदी फ़रोज़े-कोह[33] से गाती हुई
कौसरो-तस्नीम[34] की मौजों को शर्माती हुई

आईना-सा शाहिदे-क़ुदरत[35] को दिखलाती हुई
संगे-रह से गाह[36] बचती, गाह टकराती हुई

छेड़ती जा इस इराक़े-दिलनशीं के राज़ को
ऐ मुसाफ़िर! दिल समझता है तेरी आवाज़ को

लैली-ए-शब खोलती है आ के जब ज़ुल्फ़े -रसा[37]
दामने-दिल खींचती है आबशारों[38] की सदा

वो ख़मोशी शाम की जिस पर तकल्लुम हो फ़िदा
वो दरख़्तों पर पर तफ़क्कुर का समाँ छाया हुआ

काँपता फिरता है क्या रंगे-शफ़क़[39] कोहसार[40] पर
ख़ुशनुमा लगता है ये ग़ाज़ा तेरे रुख़सार[41] पर

ऐ हिमाला ! दास्ताँ उस वक़्त की कोई सुना
मस्कने-आबा-ए-इन्साँ जब बना दामन तिरा

कुछ बता उस सीधी -सादी ज़िन्दगी का माजरा
दाग़ जिसपर ग़ाज़ा-ए-रंगे-तक़ल्लुफ़[42] का न था

हाँ दिखा दे ऐ! तसव्वुर[43] फिर वो सुबहो-शाम तू
दौड़ पीछे की तरफ़ ऐ गर्दिशे-अयाम[44] तू

 

मोहम्मद इक़बाल की शायरी

मोहम्मद इक़बाल
Chapters
तराना-ए-हिन्दी (सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा)
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त
जवाब-ए-शिकवा
आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है
हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
एक आरज़ू
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
है कलेजा फ़िग़ार होने को
अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा
नसीहत
ख़ुदी में डूबने वालों
लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने
सफ़र कर न सका
हिमाला
ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे
फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन
न आते हमें इसमें तकरार क्या थी
आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना
अजब वाइज़ की दींदारी है या रब
गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख
कभी ऐ हक़ीक़त-ए- मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
गेसू-ए- ताबदार को और भी ताबदार कर
हम मश्रिक़ के मुसलमानों का दिल
जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं
ख़ुदा का फ़रमान
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
चमक तेरी अयाँ बिजली में आतिश में शरारे में
ख़िरदमंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही
क्या कहूँ अपने चमन से मैं जुदा क्योंकर हुआ
अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं
मजनूँ ने शहर छोड़ा है सहरा भी छोड़ दे
मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी
नया शिवाला
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
तू अभी रहगुज़र में है
ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है
हकी़क़ते-हुस्न
साक़ी
परवाना और जुगनू
जमहूरियत
राम
बच्चों की दुआ
जुगनू
गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख
तिरे इश्क की इंतहा चाहता हूँ
सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर
मुझे आहो-फ़ुगाने-नीमशब का
ये पयाम दे गई है मुझे
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया
जुदाई
मेरी निगाह में है मोजज़ात की दुनिया
लहू
अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा
दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर
हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़लाक में है
ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं
मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है
मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी
मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में
न तख़्त ओ ताज में ने लश्कर ओ सिपाह
परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं
वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ
ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी
मेरा वतन वही है