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सत्रहवाँ अध्याय

 

सत्रहवाँ अध्याय

मुख्य द्वार

( १ ) वास्तुचक्रकी चारों दिशाओंमें कुल बत्तीस देवता स्थित हैं । किस देवताके स्थानमें मुख्य द्वार बनानेसे क्या शुभाशुभ फल होता है, इसे बताया जाता है -

पूर्व

१. शिखी - इस स्थानपर द्वार बनानेसे दुःख, हानि और आग्निसे भय होता है ।

२. पर्जन्य - इस स्थानपर द्वार बनानेसे परिवारमें कन्याओंकी वृद्धि, निर्धनता तथा शोक होता है ।

३. जयन्त - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धनकी प्राप्ति होती है ।

४. इन्द्र - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धन प्राप्त होता है ।

५. सूर्य - इस स्थानपर द्वार बनानेसे क्रोधकी अधिकता होती है । )

६. सत्य - इस स्थानपर द्वार बनानेसे चोरी, कन्याओंका जन्म तथा असत्यभाषणकी अधिकता होती है ।

७. भृश - इस स्थानपर द्वार बनानेसे क्रूरता, अति क्रोध तथा अपुत्रता होती है ।

८. अन्तरिक्ष - इस स्थानपर द्वार बनानेसे चोरीका भय तथा हानि होती है ।

दक्षिण

९. अनिल - इस स्थानपर द्वार बनानेसे सन्तानकी कमी तथा मृत्यु होती है ।

१०. पूषा - इस स्थानपर द्वार बनानेसे दासत्व तथा बन्धनकी प्राप्ति होती है ।

११. वितथ - इस स्थानपर द्वार बनानेसे नीचता तथा भयकी प्राप्ति होती है ।

१२. बृहत्क्षत - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धन तथा पुत्रकी प्राप्ति होती है ।

१३. यम - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धनकी वृद्धि होती है । ( मतान्तरसे इस स्थानपर द्वार बनानेसे भयंकरता होती है । )

१४. गन्धर्व - इस स्थानपर द्वार बनानेसे कृतघ्रना होती है । )

१५. भृंगराज - इस स्थानपर द्वार बनानेसे निर्धनता, चोरभय तथा व्याधिभय प्राप्त होता है ।

१६. मृग - इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्रके बलका नाश, निर्बलता तथा रोगभय होता है ।

पश्चिम

१७. पिता - इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्रहानि, निर्धनता तथा शत्रुओंकी वृद्धि होती है ।

१८. दौवारिक - इस स्थानपर द्वार बनानेसे स्त्रीदुःख तथा शत्रुवृद्धि होती है ।

१९. सुग्रीव - इस स्थानपर द्वार बनानेसे लक्ष्मीप्राप्ति होती है ।

२०. पुष्पदन्त - इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्र तथा धनकी प्राप्ति होती है ।

२१. वरुण - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धन तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है ।

२२. असुर - इस स्थानपर द्वार बनानेसे राजभय तथा दुर्भाग्य प्राप्त होता है । ( मतान्तरसे इस स्थानपर द्वार बनानेसे धनलाभ होता है । )

२३. शोष - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धनका नाश एवं दुःखोंकी प्राप्ति होती है ।

२४. पापयक्ष्मा - इस स्थानपर द्वार बनानेसे रोग तथा शोककी प्राप्ति होती है ।

उत्तर

२५. रोग - इस स्थानपर द्वार बनानेसे मृत्यु, बन्धन, स्त्रीहानि, शत्रुवृद्धि तथा निर्धनता होती हैं ।

२६. नाग - इस स्थानपर द्वार बनानेसे शत्रुवृद्धि, निर्बलता, दुःख तथा स्त्रीदोष होता है ।

२७. मुख्य - इस स्थानपर द्वार बनानेसे हानि होती है । ( मनान्तरसे इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्र - धन - लाभ होता है । )

२८. भल्लाट - इस स्थानपर द्वार बनानेसे धन - धान्य तथा सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ।

२९. सोम - इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्र, धन तथा सुखकी प्राप्ति होती है ।

३०. भुजग - इस स्थानपर द्वार बनानेसे पुत्रोंसे शत्रुता तथा दुःखोंकी प्राप्ति होती है । ( मतान्तरसे इस स्थानपर द्वार बनानेसे सुख - सम्पत्तिकी वृद्धि होती है । )

३१. अदिति - इस स्थानपर द्वार बनानेसे स्त्रियोंमें दोष, शत्रुओंसे बाधा तथा भय एवं शोककी प्राप्ति होती है ।

३२. दिति - इस स्थानपर द्वार बनानेसे निर्धनता, रोग, दुःख तथा विघ्र - बाधा होती है ।

मुख्य द्वारका स्थान

मुख्य द्वारकी ठीक स्थिति जाननेकी अन्य विधियाँ इस प्रकार हैं -

( क )

जिस दिशामें द्वार बनाना हो, उस ओर मकानकी लम्बाईको बराबर नी भागोंमें बाँटकर पाँच भाग दायें और तीन भाग बायें छोड़कर शेष ( बायीं ओरसे चौथे ) भागमें द्वार बनाना चाहिये ।

दायाँ और बायाँ भाग उसको मानना चाहिये, जो घरसे बाहर निकलते समय हो ।

( ख )

शुक्रनीतिमें आया है कि मकानकी लम्बाईके आठ भाग करके बीचके दो भागोंमें द्वार बनाना चाहिये । ऐसा द्वार धन तथा पुत्र देनेवाला होता है ( शुक्रनीति १। २३१) ।

( ग )

घरकी लम्बाईके नौ भाग करके पूर्व दिशामें घरकी बायीं ओरसे तीसरे भागमें, दक्षिण दिशामें छठे भागमें, पश्चिम दिशामें पाँचवें भागमें और उत्तर दिशामें पाँचवें भागमें द्वार बनाना चाहिये ( मुहूर्त्तमार्त्तण्ड ६।१७)।

( २ ) उत्संग द्वार -

यदि बाहरी और भीतरी द्वार एक ही दिशामें हों अर्थात् घरका द्वार बाहरी प्रवेश द्वारके सम्मुख हो तो उसे ' उत्संग द्वार ' कहते है । उत्संग द्वारसे सौभाग्यकी वृद्धि, सन्तानकी वृद्धि, विजय तथा धन - धान्यकी प्राप्ति होती है ।

सव्य द्वार -

यदि बाहरी द्वारसे प्रवेश करनेके बाद भीतरी ( दूसरा ) द्वार दायीं तरफ पड़े तो उसे ' सव्य द्वार ' कहते है । सव्य द्वारसे सुख, धन - धान्य तथा पुत्र - पौत्रकी वृद्धि होती है ।

अपसव्य द्वार -

यदि बाहरी द्वारसे प्रवेश करनेके बाद भीतरी द्वार बायीं तरफ पड़े तो उसे ' अपसव्य द्वार ' कहते है । अपसव्य द्वारसे धनकी कमी, बन्धु - बान्धवोंकी कमी, स्त्रीकी दासता तथा अनेक रोगोंकी उत्पत्ति होती है ।

वास्तुशास्त्रकी दृष्टिसे अपसव्य ( वामावर्त ) सदा विनाशकारक और सव्य ( दक्षिणावर्त या प्रदक्षिण - क्रम ) सदा कल्याणकारक होता है -

विनाशहेतुः कथितोऽपसव्यः सव्यः प्रशस्तो भवनेऽखिलेऽसौ ॥

( वास्तुराज० १।३१ )

' सव्यावर्तः प्रशस्यते', ' अपसव्यो विनाशाय'

( मत्स्यपुराण २५६। ३-४ )

पृष्ठभंग द्वार -

यदि भीतरी द्वार बाहरी द्वारसे विपरीत दिशामें हो अर्थात् घरके पीछेसे प्रवेश्य हो तो उसे पृष्ठभंग द्वार कहते हैं । इसका वही अशुभ फल होता है, जो अपसव्य द्वारका होता है ।

( ३ )

मुख्य द्वारकी चौखट पञ्चमी, सप्तमी, अष्टमी और नवमीको लगानी चाहिये । प्रतिपदाको लगानेसे दुःखकी प्राप्ति, द्वितीयाको लगानेसे धन, पशु व पुत्रका विनाश, तृतीयाको लगानेसे रोग, चतुर्थीको लगानेसे विघ्र एवं विनाश, पञ्चमीको लगानेसे धनलाभ, षष्ठीको लगानेसे कुलनाश, सप्तमी, अष्टमी और नवमीको लगानेसे शुभ फलकी प्राप्ति, दशमीको लगानेसे धननाश और पूर्णिमा व अमावस्याको लगानेसे वैर उत्पन्न होता है ।

( ४)

कुम्भ राशिका सूर्य रहते फाल्गुनमासमें घर बनाये, कर्क व सिंह राशिका सूर्य रहते श्रावणमासमें घर बनाये और मकर राशिका सूर्य रहते पौषमासमें घर बनाये - ऐसे समय ' पूर्व ' या ' पश्चिम ' में द्वार शुभ होता है ।

मेष व वृष राशिका सूर्य रहते वैशाखमासमें घर बनाये, और तुला व वृश्चिक राशिका सूर्य रहते मार्गशीर्षमासमें घर बनाये - ऐसे समय ' उत्तर ' या ' दक्षिणा ' में द्वार शुभ होता है ।

उपर्युक्त विधिके अनुसार न करनेसे रोग, शोक और धननाश होता है ।

( ५ )

पूर्णिमासे कृष्णपक्षकी अष्टमीपर्यन्त ' पूर्व ' में द्वार नहीं बनाना चाहिये । कृष्णपक्षकी नवमीसे चतुर्दशीपर्यन्त ' उत्तर ' में द्वार नहीं बनाना चाहिये । अमावस्यासे शुक्लपक्षकी अष्टमीपर्यन्त ' पश्चिम ' में द्वार नहीं बनाना चाहिये । शुक्लपक्षकी नवमीसे शुक्लपक्षकी चतुर्दशीपर्यन्त ' दक्षिण ' में द्वार नहीं बनाना चाहिये ।

तात्पर्य है कि कृष्ण ९ से शुक्ल १४ पर्यन्त ' पूर्व ' में द्वार बनाये, अमावस्यासे कृष्ण ८ पर्यन्त ' दक्षिण ' में द्वार बनाये, शुक्ल ९ से कृष्ण १४ पर्यन्त ' पश्चिम ' में द्वार बनाये, और पूर्णिमासे शुक्ल ८ पर्यन्त ' उत्तर ' में द्वार बनाये ।

( ६ )

भाद्रपद आदि तीन - तीन मासोंमें क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंकी ओर मस्तक करके बायीं करवटसे सोया हुआ महासर्पस्वरुप ' चर ' नामक पुरुष प्रदक्षिण - क्रमसे विचरण करता रहता है * । जिस समय जिस दिशामें उस पुरुषका मस्तक हो, उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा बनाना चाहिये । मुखसे विपरीत दिशामें दरवाजा बनानेसे दुःख, रोग, शोक तथा भय होते हैं । यदि घरकी चारों दिशाओंमें दरवाजा हो तो यह दोष नहीं लगाता ।

( ७ )

ब्राह्मण राशि ( कर्क, वृश्चिक, मीन ) - वालोंके लिये ' पूर्व ' में द्वार बनाना उत्तम है । क्षत्रिय राशि ( मेष, सिंह, धनु ) - वालोंके लिये ' उत्तर ' में द्वार बनाना उत्तम है । वैश्य राशि ( वृष, कन्या, मकर ) - वालोंके लिये ' दक्षिण ' में द्वार बनाना उत्तम है । शूद्र राशि ( मिथुन, तुला, कुम्भ ) - वालोंके लिये ' पश्चिम ' में द्वार बनाना उत्तम है ।

( ८ )

सामान्यरुपसे पूर्वादि दिशाओंमे स्थापित मुख्य द्वारका फल इस प्रकार है । -

पूर्व

में स्थित द्वार ' विजयद्वार ' कहलाता है, जो सर्वत्र विजय करनेवाला, सुखदायक एवं शुभ फल देनेवाला है ।

दक्षिण

में स्थित द्वार ' यमद्वार ' कहलाता है, जो संघर्ष करानेवाला तथा विशेषरुपसे स्त्रियोंके लिये दुःखदायी है ।

पश्चिम

में स्थित द्वार ' मकरद्वार ' कहलाता है, जो आलस्यप्रद तथा विशेष प्रयत्न करनेपर सिद्धि देनेवाला है ।

उत्तर

में स्थित द्वार ' कुबेरद्वार ' कहलाता है, जो सुख - समृद्धि देनेवाला तथा शुभ फल देनेवाला है ।

( ९ )

मुख्य द्वारका अन्य द्वारोंसे निकृष्ट होना बहुत बडा़ दोष है । मुख्य द्वारकी अपेक्षा अन्य द्वारोंका बडा़ होना अशुभ है ।

( १० )

द्वारकी चौडा़ईसे दुगुनी द्वारकी ऊँचाई होनी चाहिये ।

( ११ )

त्रिकोण द्वार होनेसे स्त्रीको पीडा़ होती है । शकटाकार द्वार होनेसे गृहस्वामीको भय होता है । सूपाकार द्वार होनेसे धनका नाश होता है । धनुषाकार द्वार होनेसे कलह होती है । मृदङाकार द्वार होनेसे धनका नाश होता है । वृताकार ( गोल ) द्वार होनेसे कन्या - जन्म होता है ।

( १२ )

यदि द्वार घरके भीतर झुका हो तो गृहस्वामीकी मृत्यु होती है । यदि द्वार घरके बाहर झुका हो तो गृहस्वामीका विदेशवास होता है । यदि द्वार ऊफरके भागमें आगे झुका हो तो वह सन्तानाशक होता है । द्वार ( किवाड़ ) - में छिद्र होनेसे क्षय होता है ।

द्वारके टेढे़ होनेपर कुलको पीड़ा, बाहर निकल जानेपर पराभव, आध्मात ( फूला हुआ ) होनेपर अत्यन्त दरिद्रता और मध्यभागमें कृश होनेपर रोग होता है ।

द्वारके फूले हुए होनेपर क्षुधाका भय तथा टेढे़ होनेपर कुलनाश होता है । टूटा हुआ द्वार पीडा़ करनेवाला, झुका हुआ द्वार क्षय करनेवाला, बाहर झुका हुआ द्वार प्रवासकारक और दिग्भ्रान्त द्वार डाकुओंसे भय देनेवाला होता है ।

निम्र द्वारसे गृहस्वामी स्त्रीजित् होता है । उन्नत द्वारसे दुर्जनकी स्थिति होती है । सम्मुख द्वारसे सुतपीड़ा होती है । पृष्ठाभिमुख द्वारसे स्त्रियोंकी चपलता होती है । वामावर्त द्वारसे धननाश होता है । अग्रतर द्वारसे प्रभुताका नाश होता है ।

( समराङ्रण० ३८। ६७ - ६९ )

( १३ )

द्वारका अपने - आप खुलना या बन्द होना भयदायक है । द्वारके अपने - आप खुलनेसे उन्माद ( पागलपन ) होता है और अपने - अप बन्द होनेसे कुलका विनाश होता है ।

अपने - आप खुलनेवाला द्वार उच्चाटनकारी होता है । वह धनक्षय, बन्धुओंसे वैर या कलह करनेवाला होता है । अपने - आप बन्द होनेवाला द्वार बड़ा दुःखदायी होता है । आवाजके साथ बन्द होनेवाला द्वार भयकारक और गर्भपात करनेवाला होता है ।

( १४ )

दूसरे घरके पिछले भागपर स्थित द्वारवाला घर दोनीं गृहस्वामियोंमें परस्पर विरोध उत्पन्न करता है ।

( १५ )

मुख्य द्वार ईशानमें होनेसे धनकी प्राप्ति तो होती है, पर सन्तानके लिये यह शुभ नहीं है । पिता - पुत्रमें तनाव, खटपट भी रहती है ।

( १६ )

अधिकतर दक्षिण दिशावाले मकान ही बेचे जाते हैं ।

( १७ )

वायव्य दिशावाले मकानमें गृहस्वामी बहुत कम रह पाता है ।