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पहला अध्याय

 

पहला अध्याय

लम्बोदरं परमसुन्दमेकदन्तं रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम्

उद्याद्दिवाकरनिभोज्ज्वलकान्तिकान्तं विघ्रेश्वरं सकलविघ्रहरं नमामि ॥

स्त्रुक् तुण्ड सामस्वरधीरनाद प्राग्वंशकायाखिलसत्रसन्धे ।

पूर्तेष्टधर्मश्रवणोऽसि देव सनातनात्मन्भगवन्प्रसीद ॥

वास्तुपुरुषका प्रादुर्भाव और वास्तुशास्त्रके उपदेष्टा

भगवान् शङ्करने जिस समय अन्धकासुरका वध किया, उस समय उनके ललाटसे पृथ्वीपर पसीनेकी बुँदे गिरी । उनसे एक विकराल मुखवाला प्राणी उत्पन्न हुआ । उस प्राणीने पृथ्वीपर गिरे हुए अन्धकोंके रक्तका पान कर लिया । फिर भी जब वह तृप्त नहीं हुआ, तब वह भगवान् शङके सम्मुख घोर तपस्या करने लगा । उसकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान शङ्करने उससे कहा कि तुम्हारी जो कामना हो, वह माँग लो । उसने वर माँगा कि मैं तीनों लोकोंको ग्रसनेमें समर्थ होना चाहता हुँ । वर प्राप्त करनेके बाद वह अपने विशाल शरीरसे तीनों लोकोंको अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वीपर आ गिरा । तब भयभीत देवताओंने उसको अधोमुख करके वहीं स्तम्भित कर दिया । जिस देवताने उसको जहाँ दबा रखा था, वह देवता उसके उसी अंगपर निवास करने लगा । सभी देवताओंके निवास करनेके कारण वह ' वास्तु ' नामसे प्रसिद्ध हुआ ।

भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्र्च विश्वकर्मा मयस्तथा ।

नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥

ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च ।

वासुदेवोऽनिरुद्धश्र्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥

अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः ।

( मत्स्यपुराण २५२ । २-४ )

' भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नाजित्, भगवान् शङ्कर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, भगवान् वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति - ये अठारह वास्तुशास्त्रके उपदेष्टा माने गये हैं ।'

जब मनुष्य अपने निवासके लिये ईंट, पत्थर आदिसे गृहका निर्माण करता हैं, तब उस गृहमें वास्तुशास्त्रके नियम लागू हो जाते हैं । वास्तुशास्त्रके नियम ईंट, पत्थर आदिकी दीवारके भीतर ही लागू होते हैं । तारबंदी आदिके भीतर, जिसमेंसे वायु "आर - पार होती हो, वास्तुशास्त्रके नियम लागू नहीं होते ।

वास्तुशास्त्रमें दिशाओंका बहुत महत्त्व है । सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनमें जानेपर उत्तर और दक्षिण तो वही रहते हैं , पर पूर्व और पश्चिममें अन्तर पड़ जाता है । इसलिये ठीक दिशाका ज्ञान करनेके लिये दिग्दर्शकयन्त्र ( कम्पास ) - की सहायता लेनी चाहिये । इस यन्त्रमें तीन सौ साठ डिग्री रहती है, जिसमें ( आठों दिशाओंमें ) प्रत्येक दिशाकी पैंतालीस डिग्री रहती है । अतः दिशाका ठीक ज्ञान करनेके लिये डिग्रीको देखना बहुत आवश्यक है ।

दिशाओंके देवता एवं ग्रह

पूर्व - देवता - इंद्र, ग्रह - सूर्य

पश्चिम

- देवता - वरुण, ग्रह - शनि

दक्षिण

- देवता - यम, ग्रह - मंगल

उत्तर

- देवता - कुबेर तथा चंद्र, ग्रह - बुध

आग्नेय

- देवता - अग्निदेव, ग्रह - शुक्र

नैऋत्य

- देवता - राक्षस, ग्रह - राहु व केतु

वायव्य

- देवता - वायुदेव, ग्रह - चंद्र

ईशान

- देवता - शंकर, ग्रह - बृहस्पति