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दिन अँधेरा-मेघ झरते - रबीन्द्रनाथ टैगोर

यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ अग्रवाल की रचना के रूप में प्रकाशित  किया है लेकिन केदारनाथ अग्रवाल जी ने स्वयं अपनी पुस्तक 'देश-देश की कविताएँ' के पृष्ठ 215 पर नीचे इस विषय में टिप्पणी दी है।

 

दिन अँधेरा-मेघ झरते,
खल पवन के, आक्रमण से
वन दुखी बाहें उठाए
रोर हाहाकार करता
चपल चपला जलद पट को
छिन्न करके झाँकती है
हास बंकिम हृदयभेदी
शून्य से भू पर बरसता।

 

 

 

कथासरित्सागर

संकलित
Chapters
वररुचि की कथा
गुणाढ्य की कथा
राजा विक्रम और दो ब्राह्मणों की कथा
शूरसेन और सुषेणा की कथा
कैवर्तककुमार की कथा
काबुलीवाला
अनमोल वचन - रबीन्द्रनाथ टैगोर
दिन अँधेरा-मेघ झरते - रबीन्द्रनाथ टैगोर
चल तू अकेला! - रबीन्द्रनाथ टैगोर
विपदाओं से रक्षा करो, यह न मेरी प्रार्थना - रबीन्द्रनाथ टैगोर
ओ मेरे देश की मिट्टी-रबीन्द्रनाथ टैगोर
राजा का महल-रबीन्द्रनाथ टैगोर
पूस की रात - मुंशी प्रेमचंद
मिट्ठू - मुंशी प्रेमचंद
दो बैलों की कथा - मुंशी प्रेमचंद
वैराग्य - मुंशी प्रेमचंद
यह भी नशा, वह भी नशा - मुंशी प्रेमचंद
राष्ट्र का सेवक - मुंशी प्रेमचंद
परीक्षा - मुंशी प्रेमचंद
कितनी जमीन? - लियो टोल्स्टोय