Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

हे सुंदर आए थे तुम आज प्रात

हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज
लेकर हाथों में अरुणवर्णी पारिजात.

सोई थी नगरी, पथिक नहीं थे पथ पर,
चले गए अकेले, अपने सोने के रथ पर-
ठिठक कर एक बार मेरे वातायन की ओर
किया था तुमने अपना करुण दृष्‍टिपात.
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज.

स्‍वप्‍न मेरा किस गंध से हुआ सुवासित,
किस आनंद से कॉंप उठा घर का अँधेरा,
धूल में पड़ी नीरव मेरी वीणा
बज उठी अनाहत, पाकर कौन-सा आघात.

कितनी ही बार सोचा मैंने--उठ पड़ूँ,
आलस त्‍याग पथ पर जा दौड़ूँ,
उठी जब, तब तुम थे चले गए--
अब तो शायद न होगा तुमसे साक्षात्
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज.

गीतांजलि

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Chapters
मेरा मस्तक अपनी चरणधूल तले नत कर दो
मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
कितने अनजानों से तुमने करा दिया मेरा परिचय
विपदा से मेरी रक्षा करना
अंतर मम विकसित करो
प्रेम में प्राण में गान में गंध में
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ
कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला
मुझे झुका दो, मुझे झुका दो
आज द्वार पर आ पहुँचा है जीवंत बसंत
अपने सिंहासन से उतर कर
तुम अब तो मुझे स्वीकारो नाथ
जीवन जब सूख जाए
अपने इस वाचाल कवि को
विश्व है जब नींद में मगन
वह तो तुम्हारे पास बैठा था
तुम लोगों ने सुनी नहीं क्या
मान ली, मान गयी मैं हार
एक-एक कर
गाते-गाते गान तुम्हारा
प्रेम तुम्हारा वहन कर सकूँ
हे सुंदर आए थे तुम आज प्रात
जब तुम्हारे साथ मेरा खेल हुआ करता था