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विपदा से मेरी रक्षा करना

विपदा से मेरी रक्षा करना
मेरी यह प्रार्थना नहीं,
विपदा से मैं डरूँ नहीं, इतना ही करना।

दुख-ताप से व्यथित चित्त को
भले न दे सको सान्त्वना
मैं दुख पर पा सकूँ जय।

भले मेरी सहायता न जुटे
अपना बल कभी न टूटे,
जग में उठाता रहा क्षति
और पाई सिर्फ़ वंचना
तो भी मन में कभी न मानूँ क्षय।

तुम मेरी रक्षा करना
यह मेरी नहीं प्रार्थना,
पार हो सकूँ बस इतनी शक्ति चाहूँ।

मेरा भार हल्का कर
भले न दे सको सान्त्वना
बोझ वहन कर सकूँ, चाहूँ इतना ही।

सुख भरे दिनों में सिर झुकाए
तुम्हारा मुख मैं पहचान लूंगा,
दुखभरी रातों में समस्त धरा
जिस दिन करे वंचना
कभी ना करूँ, मैं तुम पर संशय।

गीतांजलि

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
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मेरा मस्तक अपनी चरणधूल तले नत कर दो
मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
कितने अनजानों से तुमने करा दिया मेरा परिचय
विपदा से मेरी रक्षा करना
अंतर मम विकसित करो
प्रेम में प्राण में गान में गंध में
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ
कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला
मुझे झुका दो, मुझे झुका दो
आज द्वार पर आ पहुँचा है जीवंत बसंत
अपने सिंहासन से उतर कर
तुम अब तो मुझे स्वीकारो नाथ
जीवन जब सूख जाए
अपने इस वाचाल कवि को
विश्व है जब नींद में मगन
वह तो तुम्हारे पास बैठा था
तुम लोगों ने सुनी नहीं क्या
मान ली, मान गयी मैं हार
एक-एक कर
गाते-गाते गान तुम्हारा
प्रेम तुम्हारा वहन कर सकूँ
हे सुंदर आए थे तुम आज प्रात
जब तुम्हारे साथ मेरा खेल हुआ करता था