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मान ली, मान गयी मैं हार

मान ली, हार मान गई.
जितना ही तुमको दूर ढकेला
उतनी ही मैं दूर भई.

मेरे चित्‍ताकाश से
तुम्‍हे जो कोई दूर रखे
कैसे भी यह सह्य नहीं
हर बार ही जान गई.

अतीत जीवन की छाया बन
चलता पीछे-पीछे,
अनगिन माया बजाकर वंशी
व्‍यर्थ ही पुकारें मुझे.

सब छूटे, पाकर साथ तुम्‍हारा
अब हाथों में डोर तुम्‍हारे
जो है मेरा इस जीवन में
लेकर आई द्वार तुम्‍हारे.

गीतांजलि

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Chapters
मेरा मस्तक अपनी चरणधूल तले नत कर दो
मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
कितने अनजानों से तुमने करा दिया मेरा परिचय
विपदा से मेरी रक्षा करना
अंतर मम विकसित करो
प्रेम में प्राण में गान में गंध में
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ
कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला
मुझे झुका दो, मुझे झुका दो
आज द्वार पर आ पहुँचा है जीवंत बसंत
अपने सिंहासन से उतर कर
तुम अब तो मुझे स्वीकारो नाथ
जीवन जब सूख जाए
अपने इस वाचाल कवि को
विश्व है जब नींद में मगन
वह तो तुम्हारे पास बैठा था
तुम लोगों ने सुनी नहीं क्या
मान ली, मान गयी मैं हार
एक-एक कर
गाते-गाते गान तुम्हारा
प्रेम तुम्हारा वहन कर सकूँ
हे सुंदर आए थे तुम आज प्रात
जब तुम्हारे साथ मेरा खेल हुआ करता था