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कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला

कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला
विरहानल से इसे जला लो।
दीपक है, पर दीप्ति नहीं है;
क्या कपाल में लिखा यही है ?
उससे तो मरना अच्छा है;
विरहानल से इसे जला लो।।
व्यथा-दूतिका गाती-प्राण !
जगें तुम्हारे हित भगवान।
सघन तिमिर में आधी रात
तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार-
करने, रखें दुःख से मान।
जगें तुम्हारे हित भगवान।’
मेघाच्छादित आसमान है;
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
किस कारण इसे घोर निशा में
सहसा मेरे प्राण जगे हैं ?
क्यों होते विह्वल इतने हैं ?
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
जानें, कितनी दूर, कहाँ है-
गूँजा गीत गम्भीर राग में।
ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?
विरहानल से इसे जला लो।
घन पुकारता, पवन बुलाता,
समय बीतने पर क्या जाना !
निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं;
प्रेम-दीप से प्राण जला लो।।

गीतांजलि

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Chapters
मेरा मस्तक अपनी चरणधूल तले नत कर दो
मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
कितने अनजानों से तुमने करा दिया मेरा परिचय
विपदा से मेरी रक्षा करना
अंतर मम विकसित करो
प्रेम में प्राण में गान में गंध में
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ
कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला
मुझे झुका दो, मुझे झुका दो
आज द्वार पर आ पहुँचा है जीवंत बसंत
अपने सिंहासन से उतर कर
तुम अब तो मुझे स्वीकारो नाथ
जीवन जब सूख जाए
अपने इस वाचाल कवि को
विश्व है जब नींद में मगन
वह तो तुम्हारे पास बैठा था
तुम लोगों ने सुनी नहीं क्या
मान ली, मान गयी मैं हार
एक-एक कर
गाते-गाते गान तुम्हारा
प्रेम तुम्हारा वहन कर सकूँ
हे सुंदर आए थे तुम आज प्रात
जब तुम्हारे साथ मेरा खेल हुआ करता था