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समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का

 

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का

गर शैख़-ओ-बहरमन[1] सुनें अफ़साना किसी का
माबद[2] न रहे काबा-ओ-बुतख़ाना[3] किसी का

अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चाँद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना[4] किसी का

अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़[5] नींद के साहब
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का

इशरत[6] जो नहीं आती मेरे दिल में, न आए
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का

करने जो नहीं देते बयां हालत-ए-दिल को
सुनिएगा लब-ए-ग़ौर[7] से अफ़साना किसी का

कोई न हुआ रूह का साथी दम-ए-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का

हम जान से बेज़ार[8] रहा करते हैं 'अकबर'
जब से दिल-ए-बेताब है दीवाना किसी का

 

अकबर इलाहाबादी की शायरी

अकबर इलाहाबादी
Chapters
गांधीनामा
हंगामा है क्यूँ बरपा
कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
बहसें फ़ुजूल थीं यह खुला हाल देर से
दिल मेरा जिस से बहलता
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते
पिंजरे में मुनिया
उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है
एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते
जो यूं ही लहज़ा लहज़ा दाग़-ए-हसरत की तरक़्क़ी है
फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी
कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्किल है
किस किस अदा से तूने जलवा दिखा के मारा
कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा
दम लबों पर था दिलेज़ार के घबराने से
जान ही लेने की हिकमत में तरक़्क़ी देखी
ख़ुशी है सब को कि आप्रेशन में ख़ूब नश्तर चल रहा है
आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह
बिठाई जाएंगी पर्दे में बीबियाँ कब तक
हस्ती के शजर में जो यह चाहो कि चमक जाओ
तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब
सूप का शायक़ हूँ यख़नी होगी क्या
चश्मे-जहाँ से हालते अस्ली छिपी नहीं
हास्य-रस -एक
हास्य-रस -दो
हास्य-रस -तीन
हास्य-रस -चार
हास्य-रस -पाँच
हास्य-रस -छ:
हास्य-रस -सात
ख़ुदा के बाब में
मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो
जिस बात को मुफ़ीद समझते हो
गाँधी तो हमारा भोला है
मुझे भी दीजिए अख़बार
शेर कहता है
बहार आई
आबे ज़मज़म से कहा मैंने
शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे
हाले दिल सुना नहीं सकता
हो न रंगीन तबीयत
मौत आई इश्क़ में
काम कोई मुझे बाकी नहीं
तहज़ीब के ख़िलाफ़ है
हम कब शरीक होते हैं
मुँह देखते हैं हज़रत
अफ़्सोस है
ग़म क्या
उससे तो इस सदी में
ख़ैर उनको कुछ न आए
जो हस्रते दिल है
मायूस कर रहा है
वो हवा न रही वो चमन न रहा
सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ
जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श
जहाँ में हाल मेरा
हूँ मैं परवाना मगर
ग़म्ज़ा नहीं होता के
चर्ख़ से कुछ उम्मीद थी ही नहीं
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए