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सप्तम सर्ग : भाग-1

कपिलवस्तुगमन

इन बहु वर्षन बीच बसत नरपति शुद्धोदन
पुत्र विरह में शाक्य नायकन बीच खिन्न मन।
पियवियोग में यशोधरा दु:ख के दिन पूरति,
छाँड़ि सकल सुख भोग सोग में परी बिसूरति।

ढोर लिए जो कंजर थल थल डोलनहारे,
लाभ हेतु जो देश देश घूमत बनिजारे
तिनसों काहू यती विरागी की सुधि पावत
नरपति दूत अनेक तहाँ तुरतहि दौरावत।

ते फिरि आवत, कहत बात बहु साधुन केरी।
जो तजि कै घरबार बसत निर्जन थल हेरी।
पै लायो संवाद नाहिं कोउ ताकी प्यारो
कपिलवस्तु के राजवंश को जो उजियारो,

भूपति की सारी आशा को एक सहारो,
यशोधरा के प्राणन को धन सर्वस प्यारो,
कहाँ कहाँ जो भूलो भटको घूमत ह्नै है
 
भयो और को और, चीन्हि नहिं कोऊ पैहै।
देखो यह बासर वसंत को, रसाल फूलि
       अंग न समात मंजु मंजरीन सों भरे।
सारी धारा साजे ऋतुराज राज सोहति है,
       सुमन सहित पात चीकने हरे हरे।
कुँवरि उदास बैठी वाटिका के बीच जाय
       कंजपुट कलित सरिततीर झाँवरे।
दर्पण सी धार में बिलोके बहु बार जहाँ
       ओठन पै ओठ, पाणिपाश कंठ में परे।
ऑंसुन पलक भारी, कोमल कपोल छीन,
       बिरह की पीर अधारान पै लखाति है।
चपि रही चीकने चिकुर की चमक चारु,
       बेणी बीच बँधि नेकु नाहिं बगराति है।
आभरनहीन पीरी देह पै है सेत सारी,
       खचित न जापै कहूँ हेमनगपाँति है।
पाय पिय बोल गति हरति जो हंसन की
       चरन धारत सोइ आज थहराति है।
 
स्नेहदीप सरिस नवल जिन नैनन की
       कालिमा सों फूटति रही है द्युति अभिराम-
शर्वरी के शांतिपट बीच ह्नै जगति मनो
       दिवस की ज्योति कमनीय याही सुखधाम-
ज्योतिहीन, लक्ष्यहीन आज सोइ घूमत हैं,
       लखत न नेकु ऋतुराज की छटा ललाम।
पलकैं रही हैं ढरि, उघरत नाहिं पूरी,
       अधाखुली पूतरी पै बरुनी परी हैं श्याम।
 
एक कर माँहिं मोतीजरो कटिबंधा सोइ
       जाहि तजि कुँवर निकसि गयो रैन वहि।
हाय! विकराल सोइ जामिनि जननि भई
       केते दु:खभरे दिवसन की, न जात कहि।
गाढ़ो प्रेम एतो नाहिं निठुर कबहुँ भयौ
       साँचे प्रेम प्रति ऐसे कहुँ जग बीच यहि।
एक बात भई यासों, जीवन लौं, याही बँधि
       मिति यहि प्रेम की हमारे नाहिं गई रहि।
 
दूजे कर बीच कर सुंदर परम निज
       बालक को, जासु नाम राहुल धारो गयो,
थाती रूप छाँड़ि कै कुमार चलि गयो जाहि,
       बढ़ि कै जो आज सात वर्ष एक को भयो।
चंचल स्वभावबस डोलन लग्यो है घूमि
       जननी के पास इत उत मोद सों छयो।
विभव विकास पुष्पहास कुसुमाकर को
       हेरि हेरि होत है हुलास चित्त में नयो।
 
नलिनमय वा पुलिन पै दोउ रहे बसि कछु काल।
हँसत फेकत जात मीनन ओर मोदक बाल।
बैठि दुखिया जननि निरखति उड़त हंसन ओर,
करति विनय उसास भरि, धारि नीर दृग की कोर-
 
'हे गगनचर! होय जहँ पिय कढ़ौ जो तहँ जाय,
दीजियो संदेश मेरो ताहि नेकु सुनाय।
दरस हित औ परस हित अति तरसि बहु दुखपाय
दीन हीन यशोधरा अब मरन ढिग गई आय।'
 
बिहँसि बोलीं अनुचरी बहु आय एते माहिं
'देवि! अब लौं सुन्यो यह संवाद कैधों नाहिं?
त्रापुष, भल्लिक नाम के द्वै सेठ माल लदाय
आज दक्षिण नगरतोरण पास उतरे आय।
 
दूर देशन फिरत सागरकंठ लौं जे जात
लिए नाना वस्तु जो हैं संग में दरसात-
स्वर्णखचित अमोल अंबर, रत्नजटित कटार,
पात्र चित्र विचित्र, मृगमद, अगर कुंकुमभार।
 
किंतु ये सब वस्तु जाके सामने कछु नाहिं,
परम प्रिय संवाद लाए आज जो पुर माहिं।
दोउ देखे चले आवत शाक्य राजकुमार,
प्राणपति जीवन तिहारे, देश के आधार।
 
कहत हम साक्षात् दर्शन कियो तिनको जाय,
दंडवत करि करी पूजा भक्तिभेंट चढ़ाय!
कह्यो बुधाजन रह्यो जो सो भए पूर्ण प्रकार,
परम दुर्लभ ज्ञान ज्ञानिन को सिखावनहार।

भए जगदाराधय प्रभु, अति शुद्ध बुद्ध महान,
करत नर निस्तार औ उद्धार दै शुभ ज्ञान
मधुर वाणी सों, दयासों जासु ओर न छोर।
कहत दोऊ सेठ प्रभु हैं चले याही ओर'
 
सुनत शुभ संवाद उमड़यो हृदय माहिं उछाह,
ज्यों हिमाचल सों उमगि कै कढ़त गंगप्रवाह।
कुँवरि उठि कै भई ठाढ़ी हर्ष पुलकित गात
ढारि दृग सों बूँद मोती सरिस, बोली बात-
 
'तुरत लाओ जाय सेठन को हमारे पास,
पान हित संवाद के शुभ श्रवण को अति प्यास,
जाव, तिनको तुरत लाओ संग माहिं लिवाय।
कतहुँ जो संवाद तिनको निकसि साँचो जाय!
 
निकसिहै संवाद जो यह सत्य, कहियो जाय,
अवसि फाँड़न माहिं दैहौं स्वर्ण रत्न भराय।
और तुमहूँ आइयो सँग लेन को उपहार-
ह्नै सकै पै नाहिं सो आनंद के अनुसार।'
 
चले दोउ बणिक दासिन संग, आज्ञा पाय
कुँवर के वा रंगभवन प्रवेश कीनो जाय।
चलत कंचनकलित पथ पै धारत धीमे पाँव
राजवैभव निरखि लोचन चकित हैं सब ठाँव।
 
कनकचित्रित पट परे जँह दोउ पहुँचे जाय।
क्षीण, कंपित, मधुर स्वर यह परयो कानन आय-
'सेठ! आवत दूर तें हौं, कतहुँ राजकुमार
परे तुमको देखि, ये सब कहति बारंबार।
 
करी पूजा तासु तुमने, त्यागि जो भवभार
शुद्ध बुद्ध त्रिलोकपूजित ह्नै करत उद्धार।
सुन्यो अब या ओर आवत, कहौ, यदि यह होय
परम प्रिय या राजकुल के होयहौ तुम दोय।'

बोल्यो सीस नवाय त्रापुष 'हे देवि, हमारी!
आवत हैं इन नयनन सों हम प्रभुहि निहारी।
पाँयन पै हम परे, रह्यो जो कुँवर हिरायो
सब राजन महराजन सों बढ़ि वाको पायो।

बोधिद्रुम तर फल्गु किनारे आसन लाई
जासों जग उद्धरै सिद्धि सो वाने पाई।
सब को साँचो सखा, सकल जीवनपति प्यारो
पै सब सों कहुँ बढ़िकै है सो, देवि! तिहारो,

जाके साँचे ऑंसुन ही को मोल कहैहै
जो अनुपम सुख प्रभु के वचनन सों जग पैहै।
'कुशल क्षेम सों हैं' कहिबो यह है विडंबना
सब तापन सों परे, तिन्हैं दु:ख परसि सकत ना।

भेदि सकल भवजाल गए देवन तें ऊपर,
सत्य धर्म की ज्योति पाय जगमगत भुवन भर।
नगर नगर में ज्यों ज्यों फिरि उपदेश सुनावत
तिन माँगन को जीव शांतिसुख जिनसों पावत,

त्यों त्यों पाछे होत जात तिनके नरनारी-
ज्यों पतझड़ के पात वात के ह्नै अनुसारी।
पास गया के रम्य क्षीरिकाबन में जाई
हम दोउन ने सुने वचन तिनके सिर नाई।
चौमासे के प्रथम अवसि प्रभु इत पधारिहैं,
उपदेशन सों मधुर शोक दु:ख सकल टारिहैं।'
 
यशोधरा को कंठ हर्ष सों गद्गद भारी,
बड़ी बेर में सँभरि वचन यह सकी उचारी-
“हे सुजान जन! भलो होयहै सदा तुम्हारो।
लाए तुम संवाद मोहिं प्राणन तें प्यारो।
जानत जो तुम होहु, मोहिं अब यहौ बताओ
कैसे यह सब बात भई, कहि मोहिं सुनाओ।”
 
भल्लिक ने तब कही बात वा निशि की सारी।
जानत जाको 'गय' पर्वत के सब नरनारी
कैसी घनी ऍंधोरी में छाया दरसानी,
मारकोप सों कँपी धारा, भो खलभल पानी।

कैसो भव्य प्रभात भयो पुनि, भानु संग जब
आशा की नव ज्योति जगी सो जीवन हित सब,
कैसे तब भगवान् मिले वा बोधिविटप तर
धारे तेज आनंद अलौकिक मुख पै सुंदर।

भए आप तो मुक्त बुद्ध संबोधिहि पाई
'कैसे हमसों दु:खी जगत् की होय भलाई'
परे सोच में रहे याहि प्रभु कछु दिन ताईं,
बोझ सरीखो एक हृदय पै परत जनाई।

विषय भोग में लिप्त पापरत जन संसारी,
गहत रहत जो नाना वस्तुन सों भ्रम भारी,
ऑंखिन पर को परदो जो नहिं चाहत टारन,
उरझे जामें तोरि सकत सो इंद्रियजालन,

कैसे ऐसे जीव ग्रहण या ज्ञानहिं करिहैं?
'अष्ट मार्ग' 'द्वादश निदान' कैसे चित धारिहैं।
येई हैं उद्धारद्वार, पै है विचित्र गति!
खग पींजर में पलो लखत नहिं खुले द्वार प्रति।

खोजि मुक्ति को मार्ग ताहि नर हेतु कठिन गुनि
आपै इकले चलते जो भगवान् शाक्य मुनि,
जग में काहुहि जानि तत्व को नहिं अधिकारी
तजते जो प्रभु लहते गति कैसे नरनारी?
 
सब जीवन पै दया रही पै प्रभु के हृदय समानी,
याहि बीच सुनि परी दु:खभरी अतिशय आरत बानी।
जनु 'नश्यामि अहँ भूनश्यति लोक:' भू चिल्लाई।
कछुक बेर लौं शांति रही पुनि धुनि पवनहुँ तें आई-
 
भगवान्! धर्म सुनाइए, भगवान्! धर्म सुनाइए।
भवताप तें हैं जरि रहे अब नेकु बार न लाइए।
दिव्य दृष्टि भगवान् तुरत प्राणिन पै डारी
देख्यो को हैं सुनन योग्य, को नहिं अधिकारी
 
जैसे रवि, जो करत कनकमय अमल कमलसर
लखत कौन हैं, कौन नाहिं कलियाँ बिगसन पर।
बोलि उठे भगवान् 'सुनै जौ जहाँ जहाँ हैं,
अवसि सिखैहौं धर्म, सिखैं जो सीखन चाहैं।'
 
भिक्षु पंचवर्गीय ध्यान में प्रभु के आए।
वाराणसि की ओर तुरत भगवान् सिधाए।
तिन ही को उपदेश प्रथम प्रभु जाय सुनायो,
'धर्मचक्र' को कियो प्र्रवत्तान ज्ञान सिखायो।

मंगलमय 'मध्यमा प्रतिपदा' तिन्हैं बताई
'आर्य्य सत्य' गत दियो 'मार्ग अष्टांग' सुझाई।
जन्म मरण सों छूटि सकत हैं कैसे प्रानी,
पूरो जतन बताय बुद्ध बोले यह बानी-

'है मनुष्य की गति वाही के हाथन माहीं,
पूर्व कर्म को छाड़ि और भावी कछु नाहीं।
नहिं ताके अतिरिक्त नरक है कोऊ, भाई!
आपहिं नर जो लेत आपने हेतु बनाई।
स्वर्ग न ऐसो कोउ जहाँ सो जाय सकत नहिं
जो राखत मन शांत, दमन करि विषय वासनहिं।'
 
पाँच जनन में भयो प्रथम कौंडिन्य सुदीक्षित
'चार सत्य', 'अष्टांग मार्ग' में ह्नै कै शिक्षित,
महानाम, पुनि भद्रक, वासव और अश्वजित
धर्म मार्ग में करि प्रवेश ह्नै गए शांत चित।

'यश' नामक पुनि एक सेठ काशी को भारी
बुद्ध शरण गहि भयो प्रव्रज्या को अधिकारी।
चार मित्रा सुनि तासु भए पुनि भिक्षुक आई।
पुरजन और पचास प्रव्रज्या प्रभु सों पाई।

परी कान में जहाँ जहाँ बानी प्रभु केरी
उपजी तहँ तहँ नवयुग की सी शांति घनेरी,
ज्यों पावस की धार परत जब पटपर ऊपर
नव तृण अंकुर लहलहाय फूटत अति सुंदर।
 
पठयो प्रभु इन साठ भिक्षुकन को प्रचार हित
पाय तिन्हैं संयमी, विरागी और धीर चित।
इसीपत्तान मृगदाव माहिं यह संघ बनाई
गए राजगृह पास यष्टिवन ओर सिधाई।

कछुक दिनन लौं रहे तहाँ उपदेश सुनावत।
बिंबसार नृप, पुरजन परिजन लौं सब यावत्
भए बुद्ध की शरण प्राप्त सब मोह बिहाई
धर्म, शील, संयम, निरोधा की शिक्षा पाई।

कुश लै कै संकल्प दियो करि भूपति ने तब
परम सुहावन रम्य वेणुवन 'संघ' हेतु सब,
जामें सुंदर गुहा सरित, सर, कुंज सुहाए।
शिला तहाँ गड़वाय नृपति ये वाक्य खुदाए-
 
ये धाम्मा हेतुप्पभवा तेसं हेतुं तथागतो आह।
तेसं च यो निरोधो एवं वादी महासमणो।
 
“हेतु तें उत्पन्न जो हैं धर्म- दु:खसमुदाय-
हेतु तिनको कहि तथागत ने दियो सब आय।
और तासु निरोधा हू पुनि महाश्रमण बताय
लियो या बूड़त जगत् को बाहँ देय बचाय।”
 
सोइ उपवन माहिं बैठयो संघ एक महान्
ओजपूर्ण अपूर्व भाख्यो ज्ञान श्रीभगवान्।
सुनत सब पै गयो दिव्य प्रभाव ऐसो छाय,
आय नौ सौ जनन ने लै लियो वस्त्रा कषाय
 
और लागे जाय कै ते करन धर्मप्रचार।
बुद्ध ने यों कहि विसर्जित कियो संघ अपार-
सब्ब पापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसंपदा
सचित्त परियो दवनं एतं बुद्धानुसासनं।
 
'करिबौ पाप न कोउ संचिबो शुभ है जेतो,
करिबो चित्त निरोधा बुद्ध अनुशासन एतो।'
या विधि सेठन ने सारी कहि कथा सुनाई।
यशोधरा ने भारी तिनकी करी बिदाई।

कंचन रत्न भराय थार सम्मुख धारवायो।
चलत चलत यह पूछन हित पुनि तिन्हैं बुलायो
'कौन मार्ग धारि केते दिन में ऐहैं, प्यारे?'
फिरि कै दोऊ सेठ बोलि यह वचन सिधारे-

'या पुर के प्राचीर सों, हे देवि! गुनत हम,
परत राजगृह नगर साठ योजन तें नहिं कम।
आवत तहँ सों सुगम मार्ग करि पार पहारन,
सोन नदी के तीर तीर ह्वै कढ़त कछारन।
चलत शकट के बैल हमारे आठ कोस नित,
एक मास में वाँ सों चलि कै आवत हैं इत।”