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षष्ठम सर्ग : भाग-3

सुजाता

बसत रह्यो तहँ एक नदीतट पै भूस्वामी
धर्मवान्, धनधन्यपूर्ण, सुकृति औ नामी,
ढोर सहेन मूँड़ जाहि, जो न्यायी नायक,
आसपास के दीन दुखिन को परम सहायक।

'सेन' तासु कुलनाम, ग्राम हू 'सेन' हि बोलत
बसि सुख सों जहँ सो भरि भरि नित मूठी खोलत।
रही सुजाता नारि तासु रुचि राखनहारी,
रूपवती, गुणवती, सती, भोरी, सुकुमारी।

मति गति गौरवभरी, दया दु:ख लखि दरसावति।
सब सों मीठो बचन बोलि परितोष बढ़ावति।
आनन पै आनंद, चाह चितवन में सोहति।
नारिन में सो रत्न, शील सों जनमन मोहति।

शांति सहित सुखधाम बीच बितवत दिन दोऊ,
दु:ख यदि कोऊ रह्यो, यहै संतति नहिं कोऊ।
करी सुजाता लक्ष्मी की पूजा बहु भाँती,
नित्य सूर्य्य के मंदिर में सो उठि कै जाती।

करि प्रदिक्षणा बार बार निज विनय सुनावति।
धूप, गंधा दै फूल औ नैवेद्य चढ़ावति।
एक बार बन बीच जाय कर जोरि मनायो-
"ह्नै है यदि, वनदेव! कहूँ मेरो मनभायौ

यो या तरुवर आय फेरि निज सीस नवैहौं,
कनक कटोरे माहिँ खीर अनमोल चढ़ैहौं।"
 
सफल कामना भई, भयो इक बालक सुन्दर।
तीन मास को होत ताहि निकसी लै बाहर।
चली मंद गति, भक्ति भरी, सामग्री साजे
निर्जन वन की ओर जहाँ वनदेव विराजे।

एक हाथ सों थामे सारी के अंचल तर
बड़ी साध को प्यारो अपनो शिशु सो सुन्दर,
दूजो कर मुरि उठयो सीस लौं, रह्यो सँभारी
कनक कटोरिन सजी खीर जामें सो थारी।
 
दासी राधा गई रही पहिले सों वा थल
वेदी झारि बहारि लीपि करिबे को निर्मल।
दौरति आई लगी कहन "है स्वामिनि मोरी!
प्रगट भए वनदेव लेन पूजा यह तेरी।

साक्षात् तहँ आय विराजत आसन मारे,
ध्यान लाय, दोउ हाथ जानु के ऊपर धारे।
दिव्य ज्योति दृग माहिं, अलौकिक तेज भाल पर
भव्य भाव युत लसत सौम्य शुचि मूर्ति मनोहर।

हे स्वामिनि! कलिकाल माहिं यों सम्मुख आई
बड़े भाग्य सों देत देव प्रत्यक्ष दिखाई।"
गुनि ताको वनदेव दूर सों करि बहु फेरे,
काँपति काँपति गई सुजाता ताके नेरे।

करति दंडवत भूमि चूमि बोली यह बानी-
'हे वन के रखवार! देव, अति शुभ फल दानी!
दर्शन दै ज्यों दया करी दासी पै भारी,
पत्र पुष्प करि ग्रहण करौ प्रभु! मोहिं सुखारी'

तव निमित्ता बहु जतनन सों यह खीर बनाई,
दधि कपूर सम श्वेत आज प्रभु सम्मुख लाई।'
कनक कटोरे माहिं खीर प्रभु ढिग सरकाई
चंदन गंधा चढ़ाय, फूलमाला पहिराई।

खान लगे भगवान् बचन मुख पै नहिं लाए,
खड़ी सुजाता दूर भक्ति सों सीस नवाए।
ऐसो गुण कछु रह्यो खीर में, खातहि वाके
गई शक्ति प्रभु की बहुरी, वे सुख सों छाके।

पूरो बल तन माहिं गयो पुनि ऐसो आई
व्रत औ तप के दिवस स्वप्न से परे जनाई।
तन में जब बल परयो चित्त हू लाग्यो फरकन,
बढ़ि बहु विषयन ओर लग्यो छानत हित सरकन,

जैसे पंछी थको मरुस्थल की रज छानत
गिरत परत जल तीर आय सहसा बल आनत।
ज्यों ज्यों प्रभु मुख कांति मनोहर बढ़ति जाति अति।
त्यों त्यों औरहु खड़ी सुजाता है आराधाति।

बोले प्रभु 'यह कौन पदारथ मो पै लाई?
बोली सुनि यह बात सुजाता सीस नवाई-
'सौ गैयन को दूध प्रथम दुहवाय मँगायो,
लै पचास धौरी गैयन को ताहि खवायो,

तिनको लै मैं दूध खवायो पुनि पचीस चुनि,
तिन पचीस को पय बारह को मैं दीनो पुनि,
तिन बारह को दूध दियो पुनि सब गुन आँकी
छ: गैयन को बीछि, रहीं जो सब में बाँकी।

दुहि तिनको सो छीर ऑंच पै मृदु औटाई,
तज, कपूर औ केसर सों विधि सहित बसाई,
नए खेत सों बासमती चावर मँगवाई,
एक एक कन बीनि धोय यह खीर बनाई।

भक्ति भाव सों साँचे, प्रभु! मैं कीनो यह सब।
करी मनौती रही होयहै मोहिं पुत्र जब
तब या तरु तर आय चढ़ैहौं पूजा तेरी,
नाथ दया सों सकल कामना पूजी मेरी।'
 
भुवन उबारनहार हाथ धारि शिशु के सिर पर
बोले प्रभु 'सुख बढ़त तिहारो जाय निरंतर।
परै न यह भवभार जानि या जीवन माहीं,
सेवा तुमने करी, देव मैं कोऊ नाहीं।

मैं हूँ भाई एक और जैसे सब तेरे,
पहले राजकुमार रह्यो, अब डारत फेरे।
निशि दिन खोजत फिरौं ज्योति जो कतहूँ जागति
लहै कोउ जो ताहि, मिटै जग अंधकार अति।

पैहौं मैं सो ज्योति होत आभास घनेरो,
तू ने तन मन गिरत सँभारयो भगिनी! मेरो।
अति पुनीत संजीवन पायस तू यह लाई,
अपने जतनन ऐसी जीवनशक्ति जुटाई,

बहु जीवन बिच होति गई जो बटुरति, बाढ़ति,
लहत जन्म बहु गहत जात ज्यों जीव उच्च गति।
जीवन में आनंद कहा साँचहु तू पावति?
गृहसुख में जिन मग्न और कछु मनहिं न लावति?'
 
सुनि सुजाता दियो उत्तर 'सुनौ, हे भगवान्!
नारि को यह हृदय छोटो, नाहिं जानत आन।
नाहिं भीजति भूमि जेतो मेंह थोरो पाय
नलिनपुट भरि जात है, लिखि उठत है लहराय

चहौं बस सौभाग्यरवि की रहौं आभा हेरि
अमल पतिमुख कमल में, मुसकान में शिशु केरि।
यहै जीवन को हमारे, नाथ! है मधुकाल,
मगन राखत मोहिं तो घरबार को जंजाल।
 
सुमिरि देवन उठति हौं नित उवत दिन, भगवान्!
न्हाय धोय कराय पूजन देति हौं कछु दान।
काज में लगि आप दासिन देति सकल लगाय।
जात यों मधयाह्न ह्नै, पतिदेव मेरे आय
 
सीस मेरी जानु पै धारि परत पाँव पसारि,
करौं बीजन पास बसि मुखचंद्र तासु निहारि।
आय जब घर माहिं भोजन करन बैठत राति
ठाढ़ि परसति ताहि व्यंजन लाय नाना भाँति।
 
रसप्रसंग उठाय बहु कछु बेर लौं बतराय
फेरि सुख की नींद सोवति शिशुहि अंक बसाय।
और सुख अब कौन चहिए मोहिं या जग माहिं?
रही प्रभु की दया सों कछु कमी मोको नाहिं।
 
पुत्र दै निज पतिहिं अब मैं भई पूरनकाम,
जासु कर को पिंड लहि सो भोगिहै सुरधाम।
धर्मशास्त्र पुराण भाखत, हरत जे परपीर,
पथिक छाया हित लगावत पेड़ जे पथतीर,
 
जे खनावत कूप, छाँड़त पुत्र जे कुल माहिं
सुगति लहि ते जात उत्तम लोक, संशय नाहिं
कह्यो ग्रंथन माहिं जो जो चलति हौं सो मानि,
सकौं मैं तिन मुनिन सो बढ़ि बात कैसे जानि
 
होन सम्मुख रहे जिनके देवगण सब आय,
गए जे बहु मंत्र और पुराण शास्त्र बनाय,
धर्म को जे तत्व जानत रहे पूर्ण प्रकार,
शांति को जिन मार्ग खोज्यो त्यागि विषय विकार?
 
बात मैं यह जानती सब काल में सब ठौर
भलो को फल शुभ बुरे को अशुभ है, नहिं और
लहत हैं फल मधुर नीके बीच को सब बोय
औ विषैले बीज को फल अवसि कड़घवो होय।
 
लखत इत ही बैर, उपजत द्वेष सों जा भाँति,
शील सों मृदु मित्राता औ धरौय्य सों शुचि शांति।
जायहैं तन छाँड़ि जब तब कहा ह्नै है नाहिं
भलो वाहू लोक में ज्यों होत है या माहिं?
 
होयहै बढ़ि कै कहूँ- ज्यों परत है जब खेत
धन को कन एक, अंकुर फेंकि सहसन देत।
सकल चंपक को सुनहरो वर्ण औ विस्तार
रहत बिंदी सी कलिन में लुको पूर्ण प्रकार।
 
यहौ जानौं, परति ऐसी आपदा हैं आय,
छूटि जब सब धीरता मुँह मोरि जाति पराय।
जाय जैसे मरि कहूँ मम प्राणप्रिय यह लाल,
दरकि मेरो हियो ह्नै है टूक द्वै तत्काल।
 
चाहिहौं तौ अवसि ही द्वै टूक सो ह्नै जाय,
अंक में शिशु दाबि यह वा लोक जाहुँ सिधाय।
बाट पति की रहौं तब लौं जोहती तहँ जाय
अंत वाकी घरी जब लौं नाहिं पहुँचै आय।

किंतु मेरे सामने परलोक जो पति जाय,
चिता पै मैं चढ़ौं वाकौ सीस अंक बसाय।
फूलि अंग समाहुँ ना जब अनल दहकै घोर,
उठै कुंडल बाँधि, छावै धूम चारों ओर।
 
लिखी है यह बात, जो सहमरण करती वाम
तासु पुण्यप्रभाव सों पति लहत है सुरधाम,
संग ताके करत सुख सों तहाँ विविध विहार
वर्ष एते कोटि ताके सीस जेते बार।
 
रहति मेरे हिये चिंता की न कोऊ बात,
दिवस जीवन के सदा आनंद में चलि जाति।
किंतु सुख में लीन मैं नहिं भूलि तिनको जाति
पतित हैं, जे दीन हैं, दु:ख सहत जे दिन राति।
 
यहै चाहौं दया तिन पै करैं श्री भगवान्,
भलौ जो बनि परत मोसों करति अपनी जान।
चलति हौं मैं धर्म पै, विश्वास यह मन आनि।
होयहै जो कछु भलोई, होयहै नहिं हानि।
 
कहत प्रभु 'सिखि सकल तोसों जो सिखावत आन को,
कथत भोरी बात सों तेरी अधिक जो ज्ञान को।
तू भली जो नाहिं जानति, मगन जीवन में रहै,
धर्म अपनो जानि, बस तू और नहिं जानन चहै।
 
सहित परिजन छाँह में सुख की सदा फूलै फरै!
सत्य की खर ज्योति कोमल पात पै या ना परै।
बढ़त बीरो जाय यह बहु लोक बीच पसार कै!
अंत काहू जन्म में कढ़ि जाय यह भव पार कै।
 
मोहिं पूजन तू चली, मैं तोहि पूजत हौं, अरी!
धन्य तेरी हियो निर्मल! धन्य तव गति मतिभरी!
बुद्धि लहि, अनजाने में शुभ पंथ तू दरसावती,
ज्यों परेई प्रेम के वश नीड़ की दिशी धावती।

होत तोहि विलोकि नर उद्धार की आशा सही,
मूठ जीवन चक्र की लखि परति अपने हाथ ही।
होय तव कल्याण सुख में रहैं तेरे दिन सने!
करौं मैं निज काज पूरो करति ज्यों तू आपने,
 
चहत यह आसीस जाको देव तू जानति रही।'
'काज पूरो होय प्रभु को' सुनि सुजाता ने कही।
शिशु बढ़ाए हाथ प्रभु की ओर हेरत चाव सों।
करत बन्दन है मनो भगवान् को भरि भाव सों।