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पंचम सर्ग : भाग-2

किस्सा गौतमी

चलत यों सब जाय पहुँचे एक सरिता तीर।
मिली तरुणी एक खंजननयन धारे नीर।
लगी प्रभु सों कहन यों कर जोरि करत प्रणाम
"तुम्हैं चीन्हति हौं प्रभु! तुम सोइ करुणाधाम

जो धारायो धीर मोको वा कुटी में जाय
जहाँ इकली शिशु लिए मैं रही दिनन बिताय।
रह्यो फूलन बीच घूमत एक दिन सो बाल,
रह्यो ढिग नहिं कोउ, लिपटयो आय कर सों व्याल।
 
लग्यो खेलन ताहि लै सो मारि बहु किलकार,
काढ़ि दुहरी जीभ विषधर उठ्यो दै फुफकार।
हाय! पीरो परो वाको अंग सब छन माहिं,
गयो हिलिबो डोलिबो, थन धारयो मुख में नाहिं
 
कहन लाग्यो कोउ याको विष गयो अब छाय,
कोउ बोल्यो 'सकल याको नाहिं कोउ बचाय।'
किंतु कैसे बनै खोवत प्राणधन निज, हाय!
झाड़ फूँक कराय, देवन थकी सकल मनाय।
 
किए जतन अनेक खोलै ऑंखि सो शिशु फेरि,
मुदित 'माय' पुकारि बोलै कछुक मो तन हेरि।
गुन्यो मैं नहिं सर्प को है दंश अधिक कराल,
नाहिं अप्रिय काहु को है नेकु मेरो लाल।
 
ठानि यासों बैर काहे साँप लैहै प्रान?
खेल में क्यों याहि डसिहै, जानि बाल अजान?
कह्यो कोउ 'बसत गिरि पै सिद्ध एक महान,
जाय ता ढिग देखु तौ करि सकैं कछु कल्यान।'
 
सुनत धाई पास, प्रभु! तव विकल कंपितगात,
दिव्य दर्शन पाय परस्यो पुलकि पद जलजात।
बिलखि शिशु तहँ डारि, दीनो तासु मुखपट टारि,
'करिय कछु उपचार' प्रभु! यों विनय कीनी हारि।
 
करी मोपै दया भगवन्! नाहिं टारयो मोहिं
परसि शिशु भरी नीर नयनन कह्यो मो तन जोहिं
 
'हे भगिनि! जानत जतन जो मैं देत तोहि सुनाय,
उपचार तेरो और तेरे शिशुहु को ह्नै जाय,
पै सके जो तू लाय जो मैं देत तोहि बताय,
है कहत जो कछु वैद्य रोगी देत ताहि जुटाय।
 
माँगि घर सों काहु के दे लाल सरसों लाय,
ध्यान रखि या बात को तू जहाँ माँगन जाय
लेय वा घर सों न तू जहँ मरो कोऊ होय-
पिता, माता, बहिन, बालक पुरुष अथवा जोय।
 
देय सरसों लाय ऐसी उठै तो तव बाल,
कहीं मोसों रही प्रभुवर बात यह वा काल'
कह्यो मृदु मुसुकाय प्रभु 'हे किसा गोतमि! तोहि
कही मैंने रही ऐसी बात, सुधि है मोहि।

मिली सरसों तोहि ऐसी कतहुँ देय बताय।'
बिलखि बोली नारि सो भगवान के गहि पाय
 
मरे शिशुहि गर बाँधि फिरी मैं सकल ग्राम वन,
द्वार द्वार पै माँगी सरसों धीर धारि मन।
माँगति जासों जाय देत सो मोहिं बुलाई।
दीनन पै तो दया दीन जन की चलि आई।

पै जब पूछति 'मरयो कबहुँ कोऊ तुम्हारे घर-
मातु, पिता, पति, पुत्र, बंधु, भगिनी वा देवर?'
कहत चकित ह्नै 'बहिन! कहा यह कहति अजानी,
मरे न जाने किते, जियत तो थोरे प्रानी।'

सरसों तिनकी फेरि जाय जाँचति पुनि औरन,
पै सब याही रूप कहत कछु उदासीन मन
'सरसों तो है किन्तु मरो है मेरो भाई।'
'सरसों है पै पति दीनो चलि मोहिं बिहाई।'

'सरसों है पै बोयो जाने सो है नाहीं।
काटन को जब समय, गयो चलि सुरपुर माहीं।'
मिल्यो न ऐसो मोहिं कोउ घर, हे प्रभु ज्ञानी!
कबहुँ न होवै मरो जहाँ पै कोऊ प्रानी।

नदी किनारे नरकट के वा झापस माहीं
दीनो मैं शिशु डारि हँसत बोलत जो नाहीं।
तव पाँयन ढिग फेरि, प्रभो! बिनवति हौं आईं,
सरसों मिलिहै कहाँ देहु, प्रभु, यहौ बताई।'
 
बोले प्रभु 'जो मिलत न तो तू हेरति हारी,
पै हेरत में लहि एक कटु औषध भारी।
काली लख्यो निज शिशुहि महानिद्रा में सोवत,
देखति है तू आज सबै सोई दु:ख रोवत।

सब पै जो दु:ख परत लगत हरुओ जग माहीं,
बहुतन में बँटी लगत एक को गरुओ नाहीं।
थमै तिहारी ऑंसु देहुँ तो रक्तहिं गारी,
पै नहिं जानत मर्म मृत्यु को कोउ नर नारी,

प्रेममाधुरी बीच देति जो कटु विष घोरी,
जो नित बलि के हेतु नरन लै जात बटोरी
फूलन सों लहलही वाटिका बीच निकारत-
मूक पशुन इन लिए जात ज्यों, लखौ, हँकारत!

खोजत हौं मैं सोइ रहस्य, भगिनी मेरी!
लै अपनो शिशु जाय क्रिया करु तू वा केरी।'