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द्वितीय सर्ग : भाग-5

रंगभवन विहार

रहत प्रेमहिं छायो नवल दंपति माहिं
प्रेम ही पै पै भरोसो कियो भूपति नाहिं।
दई आज्ञा रचन की इक प्रेम कारागार
अति मनोहर दिव्य औ रमणीय रुचिर अपार।

कुँवर को विश्रामवन सो बन्यो अति अभिराम
नाहिं वसुधा बीच और विचित्र वैसो धाम।
हर्म्य सीमा बीच सोहत हरो भरो पहार,
बहति जाके तरे निर्मल रोहिणी की धार।

उतरि कलकल सहित सरि हिमशैलतट सों आय
जाति है निज भेंट गंगतरंग दिशि लै धाय।
लसत दक्षिण ओर हैं वट सघन, साल रसाल
झपसि जिनपै रह्यो कुसुमित मालती को जाल।

धाम को वा रहत न्यारे किए ते बिलगाय
जगत् सों सब जहाँ एती हाय हाय सुनाय।
कबहुँ आवत नगर कलकल करत सीमा पार,
दूर सों पै लगत प्रिय सों ज्यों भ्रमरगुंजार।

खड़ो उत्तर ओर हिमगिरि को अमल प्राकार
नील नभ के बीच निखरो धावल मालाकार।
विदित वसुधा बीच जो अद्भुत अगम्य अपार,
जासु विपुल अधित्यका और उठे विकट कगार,

शृंग तुंग तुषार मंडित, वक्ष विशद विशाल,
लहलहे अति ढार औ बहु दरी, खोह कराल
जात मानव ध्यान लै ऊँचे चढ़ाय चढ़ाय
अमर धाम तकाय राखत सुरन बीच रमाय!

निर्झरन सों खचित औ घन आवरण सा छाय
श्वेत हिम तर रही काननराजि कहुँ लहराय।
परत नीचे चीड़ अर्जुन, देवदार अपार।
गरज चीतन की परै सुनि, करिन को चिक्कार।

कहुँ चटानन पै चढ़े वनमेष हैं मिमियात।
मारि कै किलकार ऊपर गरुड़ हैं मँड़रात।
और नीचे हरो पटपर दूर लौं दरसाय,
देववेदिन तर बिछायो मनौ आसन लाय।

सोधि इनके सामने समथल पहाड़ी एक
स्थापकन मिलि दिव्य मंडप खड़े किए अनेक।
उठत ऊँचे धौरहर नहिं नेकु लागी बेर।
और प्रशस्त अलिंद सुंदर खिंचि गए चौफेर।

खचित चकरी धारन पै हैं चरित बहु प्राचीन।
कतहुँ राधाकृष्ण विहरत गोपिकन में लीन।
द्रौपदी को चीर खैंचत कहुँ दुशासन राय।
कहुँ रहे हनुमान सिय सों पिय सँदेश सुनाय।

मुख्य तोरणद्वार ऊपर वक्त्राटुँडही साजि
रहै वैभव बुद्धिदायक श्रीगणेश विराजि।
जाय प्रांगण और उपवन बीच पथ के पार।
विमल बादर1 को मिलै इक और भीतर द्वार।

1. एक प्रकार का संगमरमर जिस पर बादल की सी धारियाँ पड़ी होती हैं।

लसत मर्मर चौखटे पर नील प्रस्तर भार।
लगे चंदन के सुचित्रित अति विचित्र किवार।
मिलैं आगे बृहत् मंडप, कुंज शीतल धाम।
बनीं सीढ़ी, गली, जाली कटी अति अभिराम।

खड़े अगणित खंभ, चित्रित छत रही छवि छाय।
फटिक कुंडन सों फुहारे छुटत झरी लगाय।
लसत इंदीवर तथा अरविंदजाल प्रसार,
हरित, रक्त, सुवर्णमय जहँ मीन करत विहार।

कहूँ अनेक विशालदृग मृग बसि निकुंजन माहिं।
टुँगत पाटल के कुसुमदल, करत कछु भय नाहिं।
कतहूँ ऊँचे ताड़ ऊपर फरफरात विहंग,
इंद्रधनु सम पंख जिनके दिव्य रंग विरंग।

नील धूम कपोत छज्जन तर सुनहरे जाय।
अति सुरक्षित सुघर अपने नीड़ लिए बनाय।
शुचि खडंज़न पै फिरैं कहूँ मोर पूँछ पसारि।
बैठि उज्ज्वल छीर सम बक रहे तिन्हैं निहारि।

एक फल सों दूसरे पै जाय झूलत कीर।
फिरैं मुनियाँ चुहचुहाती खिले फूलन तीर।
शांति औ सुख सों बसैं सब जीव मिलि वा धाम।
लेति जाली बीच निर्भय छिपकली बसि घाम।

हाथ सों लै जाति भोजन गिलहरी झटकारि।
केतकी तर बसत कारो नाग फेंटी मारि।
कतहुँ बसि कस्तूरि मृग हैं करत विविध विहार।
वायसन की बोल पै कपि करत कहँ किलकार।

रहत सुंदरि सहचरिन सों भरो सो रसधाम।
लसति सुखमा बीच आनन की छटा अभिराम।
बोलि मधुरै बैन सेवा में रहैं सब लीन,
सजैं सुख के साज छनछन सुरुचि सहित नवीन।

कुँवर को सुख लखि सखी ते, मुदित मोद निहारि।
गर्व बस आदेश पालन को सकैं जिय धारि।
विविध सुख के बीज जीवन यों बिहात लखाय
पुष्पहास विलास के बिच रमति ज्यों सरि जाय।

मोहनी सी रहति मायाभवन में वा छाय,
रहत भूलो मन, परत दिन राति नाहिं जाय।

लसत गुप्तगृह इन भवनन के भीतर जाई,
मनमोहन हित शिल्प जहाँ सब शक्ति लगाई।
प्रांगण विस्तृत परत प्रथम मर्मर को सुंदर
ऊपर नीलो गगन, मध्य में लसत विमल सर।

मर्मर के सोपान सुभग चारों दिशि सोहत
पच्चीकारी रंग रंग की लखि मन मोहत।
जहाँ ग्रीष्म में जातहि ऐसो ताप जात हरि
परसे निर्मल ज्यों तुषार पै पाँव रहे परि।

नित्य गवाक्षन सों ह्नै कै मृदु रविकर आवैं,
ढारि स्वर्ण की धार रुचिर आभा फैलावें।
जब वा रुचिर विलासभवन के भीतर आवै
प्रखर दिवस हू प्रेम छाकि संध्या ह्नै जावै

रंगभवन सो परत द्वार के भीतर सुंदर,
सकल जगत् के अचरज को आगार मनोहर।
अगरघटित दीपक सुंगधामय बरत सुहावै,
जासु अमल मृदु ज्योति झरोखन सो कढ़ि आवै।

तनी चाँदनी के बूटे चमकैं मनभावन
परे कनक पर्यंक बीच गुलगुले बिछावन।
कनक कलित पट सुंदर द्वारन पै लटकाए,
सुमुखिन भीतर लेन हेतु जो जात उठाए।

उज्ज्वलता, मृदुता प्रभात संध्या की सब छिन
छाई तहँ लखि परति, जानि नहिं जात राति दिन।

लगे रहत पकवान विविध, नित कढ़ति बीन धुनि।
कंद मूल फल धारे रहत डलियन में चुनि चुनि।
हिम सों शीतल किए मधुर रस धारे सजाई।
कठिन युक्ति सों बनी रसीली सजी मिठाई।

नित रहति सेवा में लगी तहँ सहचरी बहु कामिनी,
सुकुमारि कारी भौंहवारी, काम की सहगामिनी।
जब नींद में झपि नयन लागत कुँवर के अलसाय कै,
निहराय बीजन करति कोमल कर सरोज हिलाय कै।

जगि जात जब पुनि तासु मनहिं रिझाय कै बिलमावती।
मुसुकाय, रस के गीत मधुरे गाय नाच दिखावती।
झनकाय घुँघरि बैठि बाहु उठाय भाव बतावतीं।
वीणा मृदंग उठाय कोउ चुपचाप साज मिलावतीं।

नित अगर, धूप कपूर सों उठि धूम छावत घनो।
बगराय केशकलाप बासति कामिनी तहँ आपनो
मृदु अंग लाय उशीर चंदन उत्तरीय सजाय कै,
रसबस कुमार यशोधरा के संग बैठत आय कै।

जरा, मरण, दु:ख, रोग, क्लेश को वा थल माहीं
कोऊ कबहूँ नाम लेन पावत है नाहीं।
यदि कोऊ वा रस समाज में होय खिन्न मन,
परै नृत्य में मंद चरण वा धीमी चितवन

तुरतहि सो वा स्वर्गधाम सों जाय निकारी,
जासों दु:ख लखि तासु न होवै कुँवर दुखारी।
नियत नारि बहु दंड देन हित तिनको हेरी
जो कोउ चर्चा करै कतहुँ दुखमय जग केरी,

जहाँ रोग, भय, शोक और पीड़ा हैं छाई,
बहु विलाप सुनि परत चिता दहकति धुधुआई।
गनो जात अपराधार् नत्ताकिन को यह भारी।
वेणीबंधन छूटि परै जो केश बिगारी।

नित उठि तोरे जात कुसुम कुम्हिलाने सारे,
औ सब सूखे पात जात करि चुनि चुनि न्यारे।
या प्रकार सब बुरे दृश्य नित जात दुराए।
बार बार यों कहत भूप मन आस बँधाए-

'तिन बातन सों दूर कुँवर यदि युवा बितावैं
उदासीनता मानुस के मन में जो लावैं,
कर्मरेख की खोटी छाया अवसिहि टरिहैं,
राजश्री धारि सकल भूमि सो शासन करिहैं,

ताहि देखिहौं सकल भूपतिन सों मैं भारी
छावत अपनी विमल कीर्ति बसुधा में सारी।
प्रेम पाहरू जहाँ, भोग के बंधन भारी,
तिन सुख कारागारन के चहुँ ओर अगारी

उठवाई नृप ऊँची चकरी चारदिवारी।
जामें फाटक लग्यो एक पीतर को भारी।
मनुज पचासक लगैं सकैं तो ताहि फिराई,
आधो योजन शब्द खुलन को परै सुनाई

ताके भीतर और लगे फाटक द्वै दृढ़तर।
लाँघै तीनौं द्वार होय तब कोऊ बाहर।
बेड़े सीकल लगे फाटकन माँहि भिड़ाई।
एक एक पै गई कड़ी चौकी बैठाई।

कह्यो रक्षकन सों 'नृप हम आदेश देत अब,
ह्नैहै जो प्रतिकूल प्राण खोवौगे तुम सब।
देखौ कोऊ फाटक बाहर होन न पावै
चाहै होवै कुँवर, सोउ नहिं कहुँ कढ़ि जावै'।