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द्वितीय सर्ग: भाग-4

विवाह

सुप्रबुद्ध अति है प्रसन्न लखि कौतुक सारे
बोले 'तुम, हे कुँवर! रहे हम सब को प्यारे
सब सों बढ़ि तुम कढ़ौ रही यह चाह हमारी।
कौन शक्ति लहि कियो आज यह अचरज भारी?

कहत सबै तुम रहत रंग में भूले अपने,
फूलन पै फैलाय पाँव देखत हौ सपने।
यह अद्भुत पुरुषार्थ कहाँ तें तुम में आयो
तिनसों बढ़ि जो अपनो सारो समय बितायो

रणखेतन के बीच और आखेट वनन में,
सकल जगत् के व्यवहारन में कुशल जनन में?'
पिता को निदेश पाय सुंदरी कुमारी उठी,
लीने जयमाल दोउ हाथ में सजाय कै।

कंचनकलित पाटसारी खैंचि आनन पै,
घूँघट बढ़ाय चली मंद पग नाय कै।
डोलति समाज बीच पहुँची ता ठौर जहाँ,
सोहत सिद्धार्थ छटा दिव्य छहराय कै।

ठाढ़ो है समीप जाके अश्व चुपचाप सब
चौकड़ी भुलाय, कारे कंठहि नवाय कै।
कुँवर के पास जाय आनन उघारयो वाने
जापै अनुराग के उमंग की प्रभा छई।

कंठ बीच डारी जयमाल झुकि छुयो पद,
पुलकित गात बोली भाव सो भरी भई।
'फेरो मेरी ओर दीठि नेकु तो, कुमार प्यारे!
मैं तो सब भाँति सों तिहारी आज ह्नै गई'।

प्रमुदित लोग भए देखि उन दोउन को
जात कर बीच कर धारे प्रीति सों नईड्ड
बहुत दिनन में भए बुद्ध सिद्धार्थ कुँवर जब
विनती करि यह मर्म जाय तिनसों बूझयो सब-

कनकखचित सो चित्रित सारी क्यों कुमारि धारि
चली हृदय में गर्व औ अनुराग इतो भरि?
बोले जगदाराधय 'विदित तब पूरो नाहीं
रह्यो हमें यह, रही धारणा कछु मन माहीं।

जन्म मरण को चक्र रहत है नाहिं कबहुँ थिर,
विगत वस्तु औ भाव, भूत जीवन प्रगटत फिर।
आवति अब सुधा मोंहि वर्ष बीते हैं लाखन
रह्यो बाघ मैं हिमगिरि के इक विपिन बीच घन।

क्षुधित स्ववर्गिन संग फिरौं मैं बन बन धावत।
कुश के झापस बीच बैठि नित घात लगावत
गैयन पै तिन जे कारे दृग चौंकि उठावैं,
मृत्यु निकट जो चरत चलि आपहि आवैं।

कबहुँ तारकित गगन तरे खोजौं भख उत इत।
सूँघत घूमौं पंथ मनुज मृग गंधा लहन हित।
संगी मेरे मिलै मोहिं जो बन के भीतर
अथवा निचुलन सों छाए मृदु सरित पुलिन पर

तिनमें बाघिनि एक वर्ग में सब सों सुंदरि,
ताहि लहन हित बन के सारे बाघ गए लरि।
चामीकर सो चर्म तासु जापै बहु धारी,
- कछु वैसोई जैसी गोपा की सो सारी।

भयो युद्ध घमसान दंत नख सों वा वन में,
घावन सों बहि चल्यो रक्त तब सबके तन में।
खड़ी नीम तर सुंदरि बाघिनि सो सब निरखति
विकट प्रणय हित जासु मच्यो सो क्रूर कांड अति।

बड़ी चाह सों आई कूदति मरे नेरे,
रुचि सों लगी चाटन हाँफत तन को मेरे।
चली संग लै मोहिं गर्व सों सो पुनि गरजति
तिन सब बाघन बीच कढ़ति जिनको मारयो हति।

यों मेरे संग प्रेमगर्व सों वनहिं सिधाई।
जन्म मरण को चक्र रहत घूमत या, भाई!'
या भाँति सुंदरी कुँवरि को लहि कुँवर मन आनंद छायो,
शुभ लग्न उत्तम धारि गई जब मेष को दिनकर भयो।

सब ब्याह के सुप्रबुद्ध के घर साज बाज रचे गए,
छायो गयो मंडप कलित, तोरण रुचिर बंधिगे नए।
अब द्वार पै सब होत मंगलचार नाना भाँति हैं,
दरसति भीर अपार औ गज बाजि की बहु पाँति हैं।

लै खील फेंकति हैं अटारिन पै चढ़ी पुर नागरी,
कल कंठ सों जिनके कढ़ै धुनि परम कोमल रस भरी।

मन मुदित वर कन्या वरासन पै विराजत आय हैं
मधुपर्क, कंगन आदि की सब रीति जाति पुराय हैं।
औ ग्रंथिबंधन भाँवरी के होत पूर्ण विधन हैं
ऋषि मंत्र बैठे पढ़त हैं, सब विप्र पावत दान हैं।

जब ह्नै गई सब रीति कन्या को पिता तब आय कै
भरि नीर नयनन में कह्यो 'हे कुँवर! हित चित लायकै।
टुक राखियो यापै दया जो अब तिहारी है भई'
दुलहिन विदा ह्नै अंत सज्जित राजमंदिर में गई।