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द्वितीय सर्ग: भाग-3

शस्त्रपरीक्षा

बोल्यो भूपति बिहँसि "वस्तु हमने सो पाई
रखि लैहै जो अवसि हमारो कुँवर फँसाई।
पठै दूत अब माँगौ सो कन्या सुकुमारी,
सुप्रबुद्ध सों कहौ जाय यह बात हमारी।"

रही रीति पै शाक्यगणन में जो न सकै टरि,
बड़े घरन की बरन चहै जो कन्या सुंदरी
शस्त्राकला में परै निपुणता ताहि दिखावन
तिन सब सों बढ़ि जो जो चाहैं ताको पावन।

नृपगण हू विपरीत रीति नहिं सकैं चलाई
कह्यो कुँवरि को पिता "नृपति सौं बोलौ जाई।
दूर दूर के राजकुँवर हैं चाहत याको,
सब सों जो बढ़ि सकै कुँवर तो दैहों ताको।

ए शे हयचालन में यदि सो बढ़ि जैहै,
वासों बढ़ि कै और कहाँ बर कोऊ पै है?
पै देखत हौं ढीले ढंगन को वाके जब
कैसे आशा करौं होयहै वासों यह सब?"

भयो भूप अति दुखी लग्यो सोचन मन माहीं-
'चहत कुँवर है यशोधरा को, संशय नाहीं।
कौन धनुर्धर नागदत्त सों पै बढ़ि मरिहै?
हय चालन में अर्जुन सम्मुख कौन ठहरिहै?

खंग युद्ध में वीर नंद सों बढ़ि काकी गति?"
सोचि सोचि महिपाल भयो मन में उदास अति।
देखि दशा यह विहँसि कुँवर बोल्यो सुखकारी
'सुनो तात! ये सकल कला हैं सिखी हमारी।

करौ घोषणा तुरत भिडै, मो सों जो चाहै
इन सब खेलन माहिं सोच की बात कहाँ है?
नेह विफल करि कुँवरि हाथ सों जान न दैहौं।

ऐसी छोटी बातन कारन ताहि गवैंहौं?'
भयो 'घोष सिद्धार्थ कुँवर हैं करत निमंत्रित।
आय सातवें दिवस दिखावैं रणकौशल इत।
राजकुँवर सों जो चाहै सो होड़ लगावै,
जो जीतै सो यशोधरा को बरि लै जावै।"

रंगभूमि लखाति जाको दूर लौं विस्तार।
सातवें दिन आय पहुँचे सकल शाक्यकुमार।
कुँवरि को लै चली शिविका सजी नाना रंग।
चलीं मंगल गीत गावति सुंदरी बहु संग।

सुंदरी को बरन को अभिलाष मन में लाय
राजकुल को नागदत्त कुमार पहुँच्यो आय।
और आए नंद अर्जुन, दोउ परम कुलीन,
सकल युवकन के शिरोमणि समरकला प्रवीन।

अंत कंथक नाम चपल तुरंग पै असवार,
लखि अपरिचित भी जो हिहनात बारंबार,
आय पहुँच्यो चट तहाँ सिद्धार्थ राजकुमार
चकित चख सों प्रजागण दिशि लखत, करत विचार-

भूपतिन सों भिन्न इनको खान पान निवास,
दु:ख सुख में करत एक समान रोदन हास।
अंत मंजु यशोधरा की ओर हेरि कुमार,
विहँसि खैंची पाट की बागडोर सहित संभार,

कूदि कंथक पीठ तें आयो अवनि पै फेरि,
भुज उठाय विशाल या विधि कह्यो सब को टेरि-
'योग्य नहिं या रत्न के जो योग्य सब सों नाहिं।
आय ठाढ़ो हौं बरन की चाह धारि मन माहिं।

कियो अनुचित आज साहस व्यर्थ हम यह धाय
सिद्ध याको करै अब प्रतिपक्षिगण सब आय।'
धनुर्विद्या की परीक्षा हित प्रचारयो नंद।
जाय राख्यौ लक्ष्य षट् गो दूर पै सानंद।

वीर अर्जुन ने धारयो निज लक्ष्य षट् गो दूर,
नागदत्त सगर्व बढ़िगो आठ गो भरपूर।
पै कुँवर सिद्धार्थ ने आदेश दियो सुनाय-
'धारो मेरो लक्ष्य दस गो दूर ह्याँ ते जाय।'

गयो एती दूर पै धरि लक्ष्य सो जब जाय
दर्शकन को एक कौड़ी सो परयो दरसाय।
खैंचि शर तब छाँड़ि बेध्यो लक्ष्य नंद संभारि
वीर अर्जुन हू निसानो लियो अपनो मारि।

नागदत्त अचूक शर सों लक्ष्य कीनो पार।
चकित जनसमुदाय कीनी 'धन्य धन्य' पुकार।
पै कुमारि यशोधरा यह लखि लियो मन मारि,
चकित नयनन पै लियो निज ऐंचि अंचल डारि

लखै जामें नाहिं सो तिन लोचनन सों और
विफल अपने कुँवर को शर होत कहुँ तिहि ठौर।
जाय तिनको धनुष लीनो हाथ राजकुमार,
कसी जामें ताँत, चाँदी की बँधयो दृढ़ तार,

सकत जाको तानि आंगुर चार सोई वीर
जासु बाहु विशाल में अति होय बल गंभीर।
बिहँसि तीर चढ़ाय खैंचि डोर कुँवर प्रवीन
मिलीं धनु की कोटि दोउ औ मूठ कर की पीन।

दियो यों कहि फेकि वाको दूर कुँवर उठाय-
'खेलिबे को धनुष यह तो दियो मोहिं थमाय।
प्रेम परखन योग्य नहिं यह, लखत सकल समाज।
शाक्य अधिपति योग्य धनुष न कहा कोउ पै आज?

एक बोल्यो 'सिंहहनु को धनुष है पृथु एक,
धारो मंदिर माहि कब सों कोउ न जानत नेक,
सकत नाहिं चढ़ाय जाकी कोउ पतिंचा तानि,
जो चढ़ै तो सकत वाको नाहिं कोउ संधानि।

'वेगि लाओ ताहि' बोल्यो कुँवर तब हरषाय
लोग लाए जाय सो प्राचीन धनुष उठाय।
वज्रनिर्मित, कनकबेलिनखचित, अति गुरुभार
चापि घुटनन पै लियो बल ऑंकि तासु कुमार।

कह्यो पुनि 'लै याहि बेध्यो लक्ष्य तो टुक जाय'।
पै सक्यो लै ताहि कोऊ नेकु नाहिं नवाय।
कुँवर उठि तब सहज झुकी को दंड दियो लचाय,
डोर की लै फाँस दीनी कोटि बीच चढ़ाय,

शिंजिनी पुनि खैंचि कीनी अति कठिन टंकार
भयो कंपित पवन, पूज्यो घोर रवपुर पार।
हहरि निर्बल लोग पूछयो 'शब्द यह किहि ओर?'
कह्यो सब 'यह सिंहहनु के धनुष को रव घोर।

हैं चढ़ायो जाहि अबहीं भूप को सुत धीर,
जात है अब लक्ष्य बेधन, लगी है अति भीर'।
साधि शर संधानि छाँड़यो जबै राजकुमार
पवन चीरत चल्यो, कीनो भेदि लक्ष्यहिं पार।

थम्यो नहिं शर गयो सनसन बढ़त आगे दूर
दृष्टि काहू की नहीं पहुँची जहाँ भरपूर।
नागदत्त पुनि खंग चलावन की ठहराई।
तालदु्रम दस ऑंगुर मोटो दियो गिराई।

अर्जुन खंभो द्वादश ऑंगुर मोटो बरु जब
पंद्रह ऑंगुर विटप छिन्न करि दिया नंद तब।
रहे तहाँ द्वै विटप खड़े ऐसे जुरि संगहि।
चमकायो करवाल कुँवर कर में अपने गहि।

दोऊ यों बेलाग उड़े एकहि प्रहार लहि
ज्यों के त्यों ते खड़े जहाँ के तहाँ गए रहि।
हरषि पुकारयो नंद 'धार बहँकी कुमार की'।
काँपी मन में कुँवरि देखि यह बात हार की।

मरुत देव यह चरित रहे अवलोकत वा छन।
दक्षिण दिशि सों प्रेरि बहायो मंद समीरन।
हरे भरे ते ऊँचे दोऊ ताल मनोहर
तुरत गिरे अरराय आय नीचे धारती पर।

फेरि तीखे तुरग चारों ने बढ़ाए जोर,
तीन फेरो कियो वा मैदान के सब ओर।
गयो कंथक दूर बढ़ि पाछे सबन को नाय
वेग ऐसो तासु जौ लौं फेन मुँह सों आय।

गिरै धारती पै, उड़ै सो बीस लट्ठ प्रमान।
नंद बोल्यो 'हमहुँ जीतैं पाय अश्व समान।
बिना फेरो तुरग कोऊ छोरि लायो जाय,
फेरि देखौ कौन वाको सकै वश में लाय'

सीकड़न सों बंधों लाए एक अश्व विशाल,
जो निशीथ समान कारो, नयन जासु कराल,
झारि केसर रह्यो जो फरकाय नथुने दोउ
पीठ सों नहिं जासु कबहूँ लगन पायो कोउ।

चढ़यौ वापै नंद कैसहु गयो सो जब छेंकि
दोउ पग सों भयो ठाढ़ो दियो वाको फेंकि
रह्यो अर्जुन ही जम्यो कछु काल आसन मारि,
दियो चाबुक पीठ पै कसि बाग को झटकारि।

रोष औ भय सों भड़कि भाग्यो तुरग झुकि झुकि,
बहँकि कै फेरो लगायो खेत में वा घूमि।
किंतु खीस निकासि सहसा फिरयो काँधी मारि,
एड़ सों अर्जुन दबायो, दियो ताकि ढारि।

अश्वपाल अनेक एते माहिं पहुँचे आय,
बाँधि लीनो वाहि तुरतै लोह सीकड़ नाय।
कह्यो सब 'या भूत ढिग नहिं उचित कुँवरहिं जान,
हृदय ऑंधी सरिस जाको रुधिर अनल समान।'

कह्यो किंतु कुमार 'खोलौ अबै सीकड़ जाय,
देहु केसर तासु मेरे हाथ नेकु थमाय'।
थामि केसर कुँवर पुनि कछु मंद शब्द उचारि
दियो माथे पै तुरग के दाहिनो कर धारि।

कंठ को गहि पानि फेरयो पीठ लौं लै जाय।
चकित भे सब लोग लखि जब अश्व सीस नवाय
भयो ठाढ़ो सहमि के चुपचाप तहँ बस मानि,
मनो बंदन करन लाग्यो परम प्रभु पहिचानि।

नाहिं डोल्यो हिल्यो जा छन कुँवर भो असवार
चल्यो सीधो एड़ औ बगडोर के अनुसार।
उठे लोग पुकारि 'बस, अब! इन कुमारन माहिं
है कुँवर सिद्धार्थ सब सों श्रेष्ठ संशय नाहिं'।