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विश्लेषण

शेली ने अपने उपन्यास की एक विवेचना का खुद प्रसंगवश उल्लेख किया है, जब वह अपने पिता विलियम गॉडविन की अतिवादी राजनीति का हवाला देती है।

The giant now awoke. The mind, never torpid, but never rouzed to its full energies, received the spark which lit it into an unextinguishable flame. Who can now tell the feelings of liberal men on the first outbreak of the French Revolution. In but too short a time afterwards it became tarnished by the vices of Orléans — dimmed by the want of talent of the Girondists — deformed and blood-stained by the Jacobins.

शेली के उपन्यास में एक जगह दैत्य और विक्टर एक हिमनद पर आमने-सामने आते हैं। दैत्य अकेलेपन और बहिष्कृत होने की अपनी भावनाओं का वर्णन करता है। विक्टर फिर भी नहीं देख पाता है कि उसने ही इस दैत्य का बहिष्कार किया था और यह उसका दायित्व बनता था कि वह उस दैत्य को प्यार करे और उसको अपना कुछ समय दे, जैसा कि बचपन में उसके माता-पिता ने उसके लिए किया था। विक्टर को इतना अलगाव क्यों है? वह खुद को एक पिता की तरह क्यों नहीं देखता? द नाइटमेअर ऑफ रोमांटिक आईडियलिसम नामक निबंध में लेखक कहता है, "जब फ्रैंकनस्टाइन बाप बनता है […], वह बच्चों के प्रति अपने कर्तव्य को आसानी से भूल जाता है […], एक सृजनकर्ता होते हुए भी उसमें एक गुण की कमी है और वह गुण वह है उसके लिए वह अपने माता-पिता की प्रशंसा करता है: उन्हें इस बात का बोध था कि जिसे उन्होंने जन्म दिया है उसके प्रति उनका दायित्व बनता है।.." (शेली 391) यह लेखक यह भी कहता है कि "(फ्रैंकनस्टाइन द्वारा) जिंदगी में […] एक व्यस्क की भूमिका को स्वीकार करने से इनकार करके […]वह सृजन की शक्ति को कायम रखता है। लेकिन उसी के साथ-साथ वह बिल्कुल गैर-ज़िम्मेदार भी है […] और उसमें अपने कर्मों के परिणामों को झेलने की हिम्मत नहीं है।"(शेली 391) यह वाक्य अपनी रचना के प्रति विक्टर की मानसिक्ता का वर्णन करते हैं। दुर्भाग्यवश, फ्रैंकनस्टाइन का कोमल बचपन उसे असली दुनिया के लिए तैयार नहीं कर पाया। उसे बढ़ा होकर अपने कर्मों की ज़िम्मदारी उठाने की कभी ज़रूरत नहीं पड़ी. फ्रैंकनस्टाइन सृजनकर्ता और सृजन के बीच के रिश्तों को ढूंढने की कोशिश करता है और साथ ही परिजनों और समाज के प्यार और स्वीकृति की वैश्विक ज़रूरत को भी बयां करता है। विक्टर द्वारा अपनी रचना का बहिष्कार करना दैत्य को बहिष्कृत अनुभव कराता है और उस दैत्य के अंदर गुस्से और खेद की भावना को जन्म देता है और हिंसक प्रतिक्रिया में वह उन लोगों को मार डालता है जो विक्टर के बहुत करीबी थे, यह सिलसिलता अंत तक चलता है जब विक्टर खुद मर जाता है और दैत्य खुद को नष्ट करने के लिए चला जाता है।

फ्रैंकनस्टाइन की एक प्रचलित विषय-वस्तु अकेलापन और मनुष्य पर होने वाले अकेलेपन के प्रभाव हैं। यह विषय-वस्तु, उपन्यास के तीन मुख्य पात्रों: वॉल्टन, फ्रैंकनस्टाइन और दैत्य, के विचारों और अनुभवों के ज़रिए दर्शाई गई है। कहानी की शुरूआत में वॉल्टन के पत्र उसकी अकेलेपन की भावनाओं से भरे हैं क्योंकि वह जिस साहसिक अभियान पर निकला था उसमें कुछ रोचक नहीं रह गया था। विक्टर पूरी किताब में डर और बेचैनी का अनुभव करता है। कहानी की शुरुआत में विक्टर का कार्य उसे उसके परिवार से अलग कर देता है। वह कई वर्ष अकेलेपन में बिताता है। कहानी में आगे चलकर जब उसके परिजन और दोस्त मरने लगते हैं तो उसके अनुभव और भी कड़वे जाते हैं। उसने कहा है "यह मनोदशा मेरे उस स्वास्थ्य को खा गई है, जो पहले झटके से बचने के बाद पूरी तरह ठीक हो गया था। मैंने इंसान के चेहरे से किनारा कर लिया था; खुशी से भरी हर एक आवाज़ मुझे काटती थी; एकांतवास ही मेरा इकलौता सहारा था- घनघोर अंधेरा— मौत की तरह सन्नाटा". फ्रैंकनस्टाइन ने इसी तरह की भावनाओं को फिर व्यक्त किया जब उसने कहा "दुनिया के एक सबसे घिनौने काम में लिप्त, मैं अकेलेपन में डूब गया था, जहां कोई भी एक पल के लिए मेरा ध्यान भटका नहीं सकता था, मेरी इच्छाएं मर चुकीं थीं, मैं बैचेन और घबराने लगा था।" दैत्य बताता है कि किस तरह उसके अकेलापन ने उसे बदल दिया जब वह कहता है "मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि मैं वही हूं जिसके विचार कभी श्रेष्ठ और उत्तम सुंदरता और अच्छाई से भरे पड़े थे। लेकिन ऐसा भी है, कि एक पतित फरिश्ता एक विद्वेशपूर्ण शैतान बन जाता है। फिर भी उसके सूनेपन में भगवान और इंसान के उस दुशमन के दोस्त थे; लेकिन मैं फिर भी अकेला हूं". शेली स्पष्ट रूप से इस विष्य-वस्तु का अन्वेशण कर रही थी क्योंकि अकेलापन उसके मुख्य चरित्रों की महत्वपूर्ण प्रेरणा है।

नाइटमेअर: बर्थ ऑफ हॉरर में क्रिस्टोफर फ्रेलिंग इस विष्य-वस्तु की चर्चा उपन्यास में अभिव्यक्त जीवच्छेदन के विपरीत करते हैं, क्योंकि शेली शाकाहारी थीं। तीसरे अध्याय में विक्टर लिखते हैं कि उन्होंने "अजीव मिट्टी में जान फूंकने के लिए जीवित प्राणी को यातना दी." और दैत्य कहता है: "मेरा भोजन मनुष्य नहीं है; मैं अपने पेट के लिए मेमने और बच्चे को नहीं मारता."

एक अल्पसंख्क विचार को रखते हुए, आर्थर बेलेफेंट ने अपनी किताब फ्रैंकनस्टाइन, द मैन एंड द मॉन्स्टर (1999,ISBN 0-9629555-8-2) में दावा करते हैं कि मेरी शेली की मंशा थी कि पाठक यह समझे कि दैत्य कभी विद्यमान ही नहीं था और यह कि विक्टर फ्रैंकनस्टाइन ने ही तीनों हत्याएं की थीं। उनकी इस विवेचना में, यह कहानी विक्टर के नैतिक पतन का अध्य्यन है और इस कहानी में वैज्ञानिक परिकल्पना के पहलू विक्टर की कल्पना हैं।

एक और अल्पमत साहित्यिक आलोचक जॉन लौरिस्टन की 2007 की किताब "द मैन हू रोट फ्रैंकनस्टाइन " में किया गया दावा है, जिसमें वह कहते हैं कि मेरी के पति, पर्सी बायशी शेली, उपन्यास के लेखक थे। मेरी शेली के प्रमुख विद्वान इस अनुमान को ज्यादा त्वज्जो नहीं देते हैं, हालांकि आलोचक कैमिली पागलिया ने इसकी उत्साहपूर्वक प्रशंसा की है और जर्मेन ग्रीर ने इसकी तीखी आलोचना की है।

डेलावेयर विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर चार्लस ई रॉबिन्सन ने 2008 में प्रकाशित फ्रैंकनस्टाइन के अपने संस्करण में इस विवादित लेखन को कुछ हद तक समर्थन दिया है, रॉबिन्सन ने फ्रैंग्कंस्टीन की हस्तलिपियों को दोबारा पढ़ा और उनमें पर्सी शेली द्वारा की गई मदद को मान्यता दी.