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स्वर्णलता मिश्रा

जब वह सिर्फ ३ साल की थीं ओ अपने पिता के साथ अपने घर से करीब  100 मील दूर अचानक उन्होनें अपने पिता से ‘अपने घर’ की तरफ गाडी मोड़ने को कहा | इसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें अपने कटनी के रूप में जन्म की सब बाते याद आ गयीं |उन्होनें बताया उनका नाम बिया पाठक था और उनके दो बेटे थे | उन्होनें अपने घर का भी ज़िक्र किया : वह सफ़ेद रंग का था और उसके दरवाज़े काले थे , उसके चार कमरे पक्के थे पर बाकी अभी बनने बाकी थे |

उन्होनें अपने घर को ज्हुर्कुटिया के एक जिले में पाया , उनके घर के पीछे एक लड़कियों का विद्यालय था | स्वर्णलता ने बताया की बिया “गले में दर्द” की वजह से मरी थी और उसका इलाज जबलपुर के डॉक्टर एस सी भाबरत ने किया था |जब स्वर्णलता १० साल की थीं तो इस मामले की जांच करने स्टीवेंसन के साथी श्रीमान एच एन बनर्जी उससे मिलने पहुंचे | उन्होनें उसके पिता द्वारा लिखित जानकारी को लेकर सच की पुष्टि करने की कोशिश की | उन्हें वह घर मिला हांलाकि १९३९ में जब बिया की मौत हुई तब से वह काफी बड़ा बन चुका था | वह पाठक नाम के परिवार का निवास था जो की एक समृद्ध व्यवसायी परिवार था | लड़कियों का विद्यालय पाठकों के निवास के 100 गज पीछे था |उन्होनें परिवार से बात की और सब सच सामने आ गया | बिया पाठक की मौत १९३९ में हुई थी और वह अपने पीछे अपने पति, दो छोटे बेटे और कई छोटे भाइयों को शोकाकुल छोड़ गयी थी | 

१९५९ में बिया के पति , बेटा और बड़ा भाई बिना बताये स्वर्णलता से मिलने पहुंचे ताकि सच सामने आ सके | स्वर्णलता ने झट ही अपने भाई को पहचान उसके उपनाम बाबु से बुलाया | १० साल की स्वर्णलता ने एक एक करके कमरे में हर जाने पहचाने आदमी की पहचान की (क्यूंकि वहां कुछ अजनबी भी थे)| अंत में वह बिया के  पति चिंतामणि पाण्डेय के पास पहुंची और उन्हें देख शर्माने लगी |कुछ हफ़्तों बाद स्वर्णलता के पिता उसे लेकर कटनी पहुंचे जहाँ बिया रहती थी | वहां पहुँचने पर उसने घर में हुई बदलाव की बात की |उसने घर से हटाये गए बरामदे और नीम के पेड़ का भी ज़िक्र किया | उसने बिया के कमरे की पहचान की जहाँ उसकी मौत हुई थी | उसके साथ उसने बिया के सभी रिश्तेदारों को भी सही से पहचान लिया | 

आने वाले सालों में स्वर्णलता ने कई बार पाठक परिवार से मुलाकात की | उसका उस परिवार और उसके सदस्यों के साथ बेहद प्यार भरा सम्बन्ध था | उन सबने उसे बिया का पुनर्जन्म मान लिया था | पाठक भाई और स्वर्णलता राखी का त्यौहार भी मनाते थे | एक बार ऐसे ही त्यौहार पर ना पहुँचने पर पाठक भाई स्वर्णलता से नाराज़ हो गए क्यूंकि उन्हें ऐसा लगता था की उनका हक़ स्वर्णलता पर मिश्र परिवार से ज्यादा था |स्वर्णलता के पिता ने भी इस सच को कबूल कर लिया और मान लिया की उनकी बेटी ही बिया है | सालों बाद जब स्वर्णलता के लिए वर तलाशने की बात उठी तो उसके पिता ने पाठक भाइयों से उनकी मर्ज़ी भी पूछी | 

बाद में बिया ने बॉटनी में उच्च स्नातक हासिल की और उसकी शादी हो गयी | वह बताती थी की कभी जब उसे अपने कटनी के जीवन की याद आती थी तो उसका मन करता था की वह अपने बिया के जीवन में वापस चली जाए | पर मिश्रा परिवार के लिए उसकी वफ़ा अतुल्य थी और कटनी की नियमित यात्राओं के इलावा वह एक खूबसूरत लड़की में परिवर्तित हो गयी जिसे अपनी हकीक़त का पूर्ण रूप से ज्ञान था |