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श्री लंका मेटीओराईट फॉसिल

जो एक सामान्य सा उल्का लग रहा था वह मानवता के इतिहास में दुसरे गृह के जीवों को समझने का एक मात्र साक्ष्य हो सकता है | कैसे ? ये कहानी शुरू हुई २९ दिसम्बर २०१२ में जब श्री लंका के पोलोंनारुवा शहर में एक उल्का के टुकड़े आकर गिरे | स्थानीय पुलिस अधिकारीयों ने तुरंत उन टुकड़ों को देश के चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ,जो की श्री लंकन स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाया जा रहा था, को भेज दिए | इन टुकड़ों को इसके बाद कार्डिफ विश्वविद्यालय भेजा गया जहाँ उनका विस्तृत रूप से दुबारा अध्ययन किया गया | 
पहली क्षोध का नेतृत्व प्रोफ़ेसर चन्द्र विक्क्रमसिंघे कर रहे थे  (ब्रह्मांड विज्ञान के जर्नल में प्रकाशित) , और क्षोध में मिश्रण की सम्भावना जताई गयी – एक सोच जो कहती है की दुसरे गृह के जीवांश पूरे ब्रह्माण्ड में फैले हुए हैं , और उन्हें उल्का और श्रुदग्रहों के द्वारा कहीं भी ले जाया जा सकता हैं | इसी सन्दर्भ में इन पत्थर के टुकड़ों में सूक्ष्म जीवाश्म डायटम मोजूद पाए गए जो वैज्ञानिक तौर पर एल्गाए का मूल रूप माना जाता है | 
कार्डिफ के गणित विद्यालय में की गयी दूसरी क्षोध ने भी इस शुरुआती खोज के नतीजों को पुख्ता किया |क्षोध्कर्ताओं के मुताबिक इन नमूनों में “विलुप्त समुद्री एल्गाए के प्राचीन अवशेष” मोजूद थे और ये अवशेष पत्थर का ही हिस्सा हैं | दुसरे शब्दों में ये उल्का धरती के जीवाणुओं से प्रभावित नहीं हुआ था क्यूंकि उसमें नाइट्रोजन का स्तर बहुत कम था | लेकिन कई शक्कियों ने इन सनसनीखेज़ खुलासों का विरोध किया है | उनमें से एक के हिसाब से ये नतीजे जल्दी में लिए गए थे , जबकि मूल पत्थर के नमूनों की सही से जांच नहीं हो पाई थी |