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रौद्र सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन

श्रीपराशरजी बोले-

हे महामुने ! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्रसर्गका वर्णण करता हूँ, सो सुनो ॥१॥

कल्पके आदिमे अपने समान पुत्र उप्तन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ ॥२॥

हे द्विजोत्तम ! जन्मके अनन्तर ही वह जोरजोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा । उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा - 'तू क्यों रोता है ? ' ॥३॥

उसने कहा - "मेरा नाम रखो ।" तब ब्रह्माजी बोले- ' हे देव ! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो धैर्य धारण कर । ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया ॥४॥

तब भगवान् ब्रह्माजीने उसके सात नाम और रखेः तथा उन आठोंके स्थान, स्त्री और पुत्र भी निश्चित किये ॥५॥

हे द्विज ! प्रजापतिने उसे भव, शर्व , ईशान, पशुपति , भमि, उग्र और महादेव कहकर सम्बोधन किया ॥६॥

यही उसके नाम रखे और इनके स्थान भी निश्चित किये । सूर्य, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश, ( यज्ञमें ) दीक्षित ब्राह्मण और चन्द्रमा - ये क्रमशः उनकी मूर्तियाँ हैं ॥७॥

हे द्विजश्रेष्ठ ! रुद्र आदि नामोंके साथ उन सूर्य आदि मूर्तियोंकी क्रमशः सुवर्चला, ऊषा विकेशी, अपरा , शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा और रोहिणी नामकी पत्नियाँ हैं । हे महाभाग ! अब उनके पुत्रोंके नाम सुनो; उन्हीके पुत्र पौत्रादिकोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है ॥८-१०॥

शनैश्चर, शुक्र, लोहिताड्ग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान और बुध - ये क्रमशः उनके पुत्र हैं ॥११॥

ऐसे भगवान् रुद्रने प्रजापति दक्षकी अनिन्दिता पुत्रीं सतीको अपनी भार्यारूपसे ग्रहण किया ॥१२॥

हे द्विजसत्तम ! उस सतीने दक्षपर कुपित होनेके कारण अपना शरीर त्याग दिया था । फिर वह मेनाके गर्भसे हिमाचलकी पुत्री ( उमा ) हुई । भगवान् शंकरने उस अनन्यपरायणा उमासे फिर भी विवाह किया ॥१३-१४॥

भृगुके द्वारा ख्यातिने धाता और विधातानामक दो देवताओंको तथा लक्ष्मीजीको जन्म दिया जो भगवान विष्णुकी पत्नी हुई ॥१५॥

श्रीमैत्रेयजी बोले - भगवान् ! सुना जाता है कि लक्ष्मीजी तो अमृत मन्थनके समय क्षीर सागरसे उप्तन्न हुई थीं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि वे भॄगुके द्वारा ख्यातिसे उप्तन्न हुई ॥१६॥

श्रीपराशरजी बोले

-

हे द्विजोत्तम ! भगवानका कभी संग न छोड़नेवाली जगज्जननी लक्ष्मीजी तो नित्य ही है और जिस प्रकार श्रीविष्णुभगवान सर्वव्यापक है वैसे ही ये भी हैं ॥१७॥

विष्णु अर्थ हैं और ये वाणी हैं, हरि नियम हैं और ये नीति हैं, भगवान विष्णु बोध हैं और ये बुद्धि हैं तथा वे धर्म हैं और ये सत्क्रिया हैं ॥१८॥

हे मैत्रेय ! भगवान जगत्‌के स्त्रष्टा हैं और लक्ष्मीजी सृष्टि हैं, श्रीहरि भूधर ( पर्वत अथवा राजा ) हैं और लक्ष्मीजी भूमि हैं तथा भगवान सन्तोष हैं और लक्ष्मीजी नित्य-तुष्टि हैं ॥१९॥

भगवान काम हैं और लक्ष्मीजी इच्छा हैं, वे यज्ञ है और ये दक्षिणा हैं, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं और देवी लक्ष्मीजी आज्याहुति ( घृतकी आहुति ) है ॥२०॥

हे मुने ! मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं, श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं तथा भगवान कुशा हैं और लक्ष्मीजी इध्मा हैं ॥२१॥

भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं, जगत्पति भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी स्वाहा हैं ॥२२॥

हे द्विजोत्तम ! भगवान् विष्णु शंकर हैं और श्रीलक्ष्मीजी गौरी हैं तथा हे मैत्रेय ! श्रीकेशव सूर्य हैं और कमलवासिनी श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रभा हैं ॥२३॥

श्रीविष्णु पितृगण हैं और श्रीकमलका नित्य पुष्टिदायिनी स्वधा हैं, विष्णु अति विस्तीर्ण सर्वात्मक अवकाश हैं और लक्ष्मीजी स्वर्गलोग हैं ॥२४॥

भगवान श्रीधर चन्द्रमा हैं और श्रीलक्ष्मीजी उनकी अक्षय कान्ति हैं, हरि सर्वगामी वायु हैं और लक्ष्मीजी जगच्चेष्टा ( जगत्‌की गति ) और धृति ( आधार ) हैं ॥२५॥

हे महामुने ! श्रीगोविन्द समुद्र हैं और हे द्विज ! लक्ष्मीजी उसकी तरंग हैं, भगवान् मधुसूदन देवराज इन्द्र हैं और लक्ष्मीजे इन्द्राणी हैं ॥२६॥

चक्रपाणि भगवान् यम हैं और श्रीकमला यमपत्नी धूमोर्णा हैं, देवाधिदेव श्रीविष्णु कुबेर हैं और श्रीलक्ष्मीजी साक्षात् ऋद्धि हैं ॥२७॥

श्रीकेशव स्वयं वरूण हैं और महाभाग लक्ष्मीजी गौरी हैं, हे द्विजराज ! श्रीहरि देवसेनापति स्वामिकार्तिकेय हैं और श्रीलक्ष्मीजी देवसेना हैं ॥२८॥

हे द्विजोत्तम ! भगवान गदाधर आश्रय हैं और लक्ष्मीजी शक्ति हैं, भगवान निमेष हैं और लक्ष्मीजी काष्ठा हैं, वे मुहूर्त हैं और ये कला हैं ॥२९॥

सर्वेश्वर सर्वरूप श्रीहरि दीपक हैं और श्रीलक्ष्मीजी ज्योति हैं श्रीविष्णु वृक्षरूप हैं और जगन्माता श्रीलक्ष्मीजी लता हैं ॥३०॥

चक्रगदाधरदेव श्रीविष्णु दिन हैं और पद्मनिवासिनी रात्रि हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा हैं और पद्मानिवासिनी श्रीलक्ष्मीजी वधू हैं ॥३१॥

भगवान नद हैं और श्रीजी नदी हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा हैं और कमलालया लक्ष्मीजी पताका हैं ॥३२॥

जगदीश्वर परमात्मा नारायण लोभ हैं और लक्ष्मीजी तृष्णा हैं तथा हे मैत्रेय ! रति और राग भी साक्षात् श्रीलक्ष्मी और गोविन्दरूप ही है ॥३३॥

अधिक क्या कहा जाय ? संक्षेपमें, यह कहना चाहिये कि देव, तिर्यक और मनुष्य आदिमें पुरुषवाची भगवान् हरि हैं और स्त्रीवाची श्रीलक्ष्मीजी, इनके परे और कोई नहीं है ॥३४-३५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥८॥

श्रीविष्णुपुराण

संकलित साहित्य
Chapters
अध्याय १
चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्‌के उप्तत्ति क्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा
ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप
ब्रह्माजीकी उप्तत्ति वराहभगवानद्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक रचना
अविद्यादि विविध सर्गोका वर्णन
चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पात्तिका वर्णन
मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन
रौद्र सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन
देवता और दैत्योंका समुद्र मन्थन
भृगु, अग्नि और अग्निष्वात्तादि पितरोंकी सन्तानका वर्णन
ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट
ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्‌का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान
राजा वेन और पृथुका चरित्र
प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओंका भगवदाराधन
प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन
नृसिंहावतारविषयक प्रश्न
हिरण्यकशिपूका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित
प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग
प्रह्लादकृत भगवत्-गुण वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्‌का सुदर्शनचक्रको भेजना
प्रह्लादकृत भगवत् - स्तृति और भगवान्‌का आविर्भाव
कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उप्तत्तिका वर्णन
विष्णुभगवान्‌की विभूति और जगत्‌की व्यवस्थाका वर्णन
प्रियव्रतके वंशका वर्णन
भूगोलका विवरण
भारतादि नौ खण्डोंका विभाग
प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन
सात पाताललोकोंका वर्णन
भिन्न - भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन
भूर्भुवः आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त
सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन
ज्योतिश्चक्र और शुशुमारचक्र
द्वादश सूर्योंके नाम एवं अधिकारियोंका वर्णन
सूर्यशक्ति एवं वैष्णवी शक्तिका वर्णन
नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार
भरत-चरित्र
जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद
ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश
ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना
वैवस्वतमनुके वंशका विवरण
इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र
मान्धाताकी सन्तति, त्रिशुंकका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उप्तत्ति और विजय
सगर, सौदास, खट्‍वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन
निमि-चरित्र और निमिवंशका वर्णन
सोमवंशका वर्णनः चन्द्रमा, बुध और पुरुरवाका चरित्र
जह्नुका गंगापान तथा जगदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति
काश्यवंशका वर्णन
महाराज रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र
ययातिका चरित्र
यदुवंशका वर्णन और सहस्त्रार्जुनका चरित्र
यदुपुत्र क्रोष्टुका वंश
सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा